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आर्टिकल 370 हटने के 7 साल: कुलगाम के युवाओं ने कहा — 'अमन, रोज़गार और विकास का नया अध्याय'

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आर्टिकल 370 हटने के 7 साल: कुलगाम के युवाओं ने कहा — 'अमन, रोज़गार और विकास का नया अध्याय'

सारांश

आर्टिकल 370 हटने की सातवीं वर्षगांठ से पहले कुलगाम के युवाओं ने खुलकर समर्थन जताया। बासित डार, फहीम और शब्बीर अहमद जैसे स्थानीय निवासियों का कहना है कि पत्थरबाज़ी और हड़तालों की जगह अब रात तक खुले बाज़ार, सिनेमा हॉल और महिलाओं की बेखौफ आवाजाही ने ले ली है।

मुख्य बातें

5 अगस्त 2019 को आर्टिकल 370 और 35ए हटाए जाने की सातवीं वर्षगांठ से एक दिन पहले कुलगाम के युवाओं ने फ़ैसले का समर्थन किया।
स्थानीय युवा बासित डार के अनुसार, अब अस्पताल रोड जैसे इलाकों में रात एक बजे तक दुकानें खुली रहती हैं — पत्थरबाज़ी और बंद की घटनाएँ लगभग समाप्त।
युवाओं ने शिक्षा, खेल, रोज़गार और पर्यटन में नए अवसरों, तथा पुलों, मेडिकल संस्थानों और कॉलेजों के निर्माण में तेज़ी का उल्लेख किया।
वर्षों बाद मुहर्रम का जुलूस निकला और लंबे अंतराल के बाद सिनेमा हॉल फिर से खुले।
कुछ राजनीतिक दल 5 अगस्त को 'ब्लैक डे' मनाते हैं; स्थानीय युवाओं ने इसे 'नए युग की शुरुआत' बताया।

कुलगाम (जम्मू-कश्मीर), 4 अगस्तआर्टिकल 370 और 35ए की समाप्ति की सातवीं वर्षगांठ से एक दिन पहले, कुलगाम जिले के कई युवाओं ने इस ऐतिहासिक फ़ैसले का खुलकर समर्थन किया। उनका कहना है कि 5 अगस्त 2019 के बाद से जम्मू-कश्मीर में शांति, सुरक्षा, शिक्षा और बुनियादी ढाँचे के मोर्चे पर उल्लेखनीय बदलाव आए हैं। जहाँ पहले बार-बार हड़ताल, पत्थरबाज़ी और बंद का माहौल रहता था, वहीं अब रात के समय भी बाज़ार गुलज़ार रहते हैं।

ज़मीनी बदलाव: युवाओं की ज़ुबानी

कुलगाम निवासी बासित डार ने कहा कि 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर वास्तव में देश की मुख्यधारा से जुड़ पाया है। उन्होंने बताया कि पहले अक्सर हड़तालों के कारण स्कूल, कॉलेज, सरकारी कार्यालय और बाज़ार बंद रहते थे, लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। उनके अनुसार, वर्षों बाद मुहर्रम का जुलूस निकला, लंबे अंतराल के बाद सिनेमा हॉल फिर से खुले और महिलाएँ अब रात के समय भी बिना किसी भय के सड़कों पर निकलती हैं।

बासित ने दावा किया कि कुलगाम और आसपास के इलाकों में पत्थरबाज़ी और बंद की घटनाएँ लगभग समाप्त हो गई हैं। उन्होंने बताया कि अस्पताल रोड जैसे इलाकों में अब रात एक बजे तक दुकानें संचालित होती हैं, जो आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि का प्रत्यक्ष संकेत है। उन्होंने 5 अगस्त को 'ऐतिहासिक दिवस' बताते हुए उत्सव मनाने की भी अपील की।

शिक्षा, रोज़गार और पर्यटन में नए अवसर

कुलगाम के फहीम ने कहा कि इस फ़ैसले ने जम्मू-कश्मीर को देश के अन्य राज्यों के समान अवसर प्रदान किए। उनके अनुसार, पहले अलग व्यवस्था होने के कारण कई अधिकार और सुविधाएँ सीमित थीं, लेकिन अब युवाओं को शिक्षा, खेल, रोज़गार और अन्य क्षेत्रों में नए अवसर मिल रहे हैं। पर्यटन के विकास, सड़कों के निर्माण और शिक्षा क्षेत्र में सुधार जैसे कई सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं।

फहीम ने यह भी कहा कि अतीत में हिंसा, पथराव और ग्रेनेड हमलों जैसी घटनाओं ने अनेक युवाओं का भविष्य प्रभावित किया था। अब नई पीढ़ी शांति और विकास के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहती है और पुराने दौर की अशांति व हिंसा की वापसी नहीं चाहती।

बुनियादी ढाँचे में तेज़ी: पुल, मेडिकल संस्थान, कॉलेज

शब्बीर अहमद ने कहा कि 370 का हटना केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि इतिहास की महत्वपूर्ण घटना है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का उल्लेख करते हुए बताया कि इस फ़ैसले के बाद जम्मू-कश्मीर में कई अधूरे विकास कार्य पूरे हुए। पुलों, मेडिकल संस्थानों, कॉलेजों और अन्य बुनियादी परियोजनाओं का विस्तार तेज़ी से हुआ। 2019 के बाद उद्योग, आधारभूत संरचना और अन्य क्षेत्रों में लगातार सुधार देखने को मिले हैं।

शब्बीर ने यह भी कहा कि 370 से आम लोगों को कोई वास्तविक लाभ नहीं मिला था और अब प्रदेश विकास के नए रास्ते पर आगे बढ़ चुका है।

'ब्लैक डे' बनाम 'नए युग का प्रतीक': राजनीतिक मतभेद

कुछ राजनीतिक दलों द्वारा 5 अगस्त को 'ब्लैक डे' के रूप में मनाए जाने पर शब्बीर अहमद ने कहा कि यह दिन जम्मू-कश्मीर के लिए खुशी और नए युग की शुरुआत का प्रतीक है। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्ववर्ती राजनीतिक दलों के शासनकाल में प्रदेश लंबे समय तक अशांति का सामना करता रहा, जबकि अब लोग विकास और स्थिरता को प्राथमिकता दे रहे हैं। यह ऐसे समय में आया है जब जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनावों के बाद नई सरकार सत्ता में है और प्रदेश की राजनीतिक दिशा पर बहस जारी है।

आगे की राह

गौरतलब है कि 5 अगस्त 2019 को संसद में पारित संकल्प के ज़रिए आर्टिकल 370 और 35ए को निरस्त किया गया था और जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों — जम्मू-कश्मीर और लद्दाख — में पुनर्गठित किया गया था। सात वर्षों बाद, कुलगाम के युवाओं की यह आवाज़ संकेत देती है कि ज़मीनी स्तर पर बदलाव की अनुभूति बढ़ रही है — हालाँकि इस फ़ैसले पर राजनीतिक और सामाजिक बहस अभी भी जारी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह एक चुनिंदा नज़रिया है — स्रोत में केवल समर्थक आवाज़ें हैं, जबकि कश्मीर घाटी में राजनीतिक असंतोष और नागरिक स्वतंत्रता पर बहस अभी भी जारी है। ज़मीनी बदलाव — खुले बाज़ार, मुहर्रम जुलूस, सिनेमा हॉल — वास्तविक और सत्यापन-योग्य हैं, लेकिन बेरोज़गारी दर, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और प्रेस स्वतंत्रता जैसे संकेतक इस तस्वीर को और जटिल बनाते हैं। सात साल बाद भी यह सवाल अनुत्तरित है कि विकास के ये लाभ घाटी में कितने समान रूप से वितरित हो रहे हैं।
RashtraPress
5 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आर्टिकल 370 और 35ए कब और कैसे हटाया गया था?
5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने संसद में संकल्प पारित कर आर्टिकल 370 और 35ए को निरस्त किया था। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों — जम्मू-कश्मीर और लद्दाख — में पुनर्गठित किया गया था।
कुलगाम के युवाओं ने 370 हटने के बाद क्या बदलाव महसूस किए?
कुलगाम के युवाओं ने पत्थरबाज़ी और हड़तालों में कमी, रात तक खुले बाज़ार, सिनेमा हॉल का पुनः संचालन, मुहर्रम जुलूस की वापसी और महिलाओं की बेखौफ आवाजाही जैसे बदलावों का उल्लेख किया। शिक्षा, पर्यटन और बुनियादी ढाँचे में भी सुधार की बात कही गई।
5 अगस्त को 'ब्लैक डे' और 'ऐतिहासिक दिवस' — दोनों क्यों कहा जाता है?
कुछ राजनीतिक दल 5 अगस्त को 'ब्लैक डे' के रूप में मनाते हैं, क्योंकि उनके अनुसार इस दिन जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति समाप्त की गई। वहीं, कुलगाम के युवाओं जैसे शब्बीर अहमद ने इसे 'नए युग की शुरुआत' और 'खुशी का दिन' बताया है।
370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में बुनियादी ढाँचे में क्या बदलाव आए?
स्थानीय युवाओं के अनुसार 2019 के बाद पुलों, मेडिकल संस्थानों, कॉलेजों और सड़कों जैसी बुनियादी परियोजनाओं का विस्तार तेज़ी से हुआ। उद्योग और आधारभूत संरचना क्षेत्र में भी लगातार सुधार देखने को मिले हैं।
क्या जम्मू-कश्मीर के सभी लोग 370 हटाने के फ़ैसले से सहमत हैं?
नहीं। स्रोत में उद्धृत कुलगाम के युवाओं ने फ़ैसले का समर्थन किया है, लेकिन कुछ राजनीतिक दल अभी भी इस दिन को 'ब्लैक डे' के रूप में मनाते हैं। इस फ़ैसले पर राजनीतिक और सामाजिक बहस जारी है।
राष्ट्र प्रेस
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