अटल बिहारी वाजपेयी और गोरखपुर का वो अनोखा रिश्ता — जब बड़े भाई ने कहा 'ससुराल मेरी, मजे तुम्हारे'
सारांश
मुख्य बातें
अटल बिहारी वाजपेयी केवल राजनीति के शिखर पुरुष नहीं थे — वे एक ऐसे इंसान भी थे जिनके भीतर एक कवि की कोमलता, एक वक्ता की धार और एक पारिवारिक इंसान की गर्मजोशी एक साथ बसती थी। उनके सार्वजनिक जीवन की गरिमा जितनी चर्चित रही, उतनी ही दिलचस्प है उनके निजी जीवन की वह झलक जो गोरखपुर से जुड़ी हुई है।
गोरखपुर से जुड़ा पहला नाता
वाजपेयी का गोरखपुर से रिश्ता 1940 में उस समय बना जब वे अपने बड़े भाई प्रेम बिहारी वाजपेयी की शादी में पहली बार यहाँ सहबाला बनकर आए। गोरखपुर के मथुरा प्रसाद दीक्षित की सुपुत्री राजेश्वरी से प्रेम बिहारी का विवाह हुआ था। उसी दिन से अटलजी के लिए गोरखपुर केवल एक शहर नहीं, बल्कि अपनेपन का एक ठिकाना बन गया।
बड़े भाई की वो यादगार चुटकी
करीबी लोगों के अनुसार, अटलजी गोरखपुर आने का कोई न कोई बहाना ढूँढ ही लेते थे। इसी आदत पर एक बार उनके बड़े भाई प्रेम बाजपेयी ने मजाकिया अंदाज में उन्हें टोका था — 'ससुराल मेरी है और मजे तुम उड़ाते हो। दामाद मैं और मौज तुम्हारी।' यह वाकया उनके परिजनों के बीच आज भी हँसी के साथ याद किया जाता है।
खातिरदारी और घरेलू यादें
रिश्ते के साले बृज नारायण दीक्षित ने एक इंटरव्यू में बताया था, 'वे जब भी आते थे, खूब खाते-पीते थे। वे खुद ही ठंडाई बनाने के लिए चीजें पीसते थे और सभी को पिलाते भी थे। वे खूब गप्पें लड़ाते थे।' बृज नारायण, प्रेम बिहारी के साले थे, इस नाते वे अटलजी को भी जीजा कहते थे।
रिश्तेदार सुनील दीक्षित ने बताया कि अटलजी को खाने में कढ़ी-चावल विशेष प्रिय थे। उन्होंने कहा, 'आज भी उनकी जन्मतिथि के अवसर पर हम लोग सह-परिवार कढ़ी-चावल बनाते हैं।' सुनील ने यह भी बताया कि घर की बड़ी बहू, जो बांग्ला जानती थीं, उन्हें वाजपेयी मजाक में 'खालिदा जिया' कहते थे। खाना खाने के बाद वे खुद ही हाथ साफ करते थे — कभी बहू से नहीं धुलवाए।
राजनीति से परे, बस घरेलू बातें
सुनील दीक्षित ने स्मरण करते हुए कहा, 'जिस तरह देश के लोग थे, अटल बिहारी वाजपेयी हम रिश्तेदारों को भी उन्हीं में गिनते थे। जब वे गोरखपुर आते थे तो मिलने के लिए बुला लेते थे। उस समय वे कोई भी बात राजनीतिक तौर पर नहीं करते थे — सिर्फ घरेलू बातें किया करते थे।' बृज नारायण ने भी बताया कि वाजपेयी स्कूली बच्चों को खूब मेहनत से पढ़ने की नसीहत देते और कविताएँ सुनाते थे।
अटल बिहारी वाजपेयी की विरासत
ग्वालियर के एक साधारण परिवार से निकलकर देश के सर्वोच्च पद तक पहुँचे वाजपेयी ने तीन बार भारत के प्रधानमंत्री के रूप में सेवा की। चार दशकों के संसदीय जीवन में वे नौ बार लोकसभा और दो बार राज्यसभा के लिए चुने गए। 1992 में पद्म विभूषण और 2015 में भारत रत्न से सम्मानित वाजपेयी ने प्रधानमंत्री के रूप में राष्ट्रीय राजमार्ग, ग्रामीण सड़कें और दूरसंचार विस्तार को प्राथमिकता दी। 16 अगस्त 2018 को 93 वर्ष की आयु में नई दिल्ली के एम्स में उनका निधन हुआ। उनकी मिलनसार प्रकृति और हास-परिहास की शैली ने विपक्ष के नेताओं को भी उनका प्रशंसक बना दिया था — और गोरखपुर के वे पारिवारिक पल इस बात की सबसे सच्ची गवाही हैं।