बच्चों में ये 6 लक्षण दिखें तो हो जाएं सतर्क — एंग्जायटी और डिप्रेशन के हो सकते हैं संकेत
सारांश
मुख्य बातें
नेशनल हेल्थ मिशन (NHM) के अनुसार, बच्चों में एंग्जायटी और डिप्रेशन के शुरुआती संकेत अक्सर गुस्से, चिड़चिड़ेपन या शारीरिक शिकायतों के रूप में सामने आते हैं, जिन्हें माता-पिता प्रायः जिद या शरारत मानकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चे के व्यवहार में अचानक आया बदलाव कभी-कभी उसकी खामोश मदद की पुकार होती है, और समय पर ध्यान न देने पर ये समस्याएँ और गंभीर रूप ले सकती हैं।
बचपन में मानसिक स्वास्थ्य क्यों है ज़रूरी
बचपन एक अत्यंत नाज़ुक और संवेदनशील दौर होता है। इस उम्र में बच्चे अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त करने में असमर्थ होते हैं, इसलिए उनकी परेशानी व्यवहार या शारीरिक लक्षणों के ज़रिए उभरती है। विशेषज्ञों के अनुसार, स्कूल का दबाव, दोस्तों के साथ तनाव, पारिवारिक कलह या अकेलापन — ये सभी कारण बच्चों में मानसिक तनाव पैदा कर सकते हैं। यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक है जब बच्चों पर शैक्षणिक और सामाजिक अपेक्षाओं का बोझ लगातार बढ़ रहा है।
6 लक्षण जो माता-पिता को नज़रअंदाज़ नहीं करने चाहिए
लगातार हताशा: यदि बच्चा बार-बार हताश महसूस करता हो, किसी काम में रुचि न ले या हर गतिविधि से पीछे हटने लगे, तो यह चिंता का विषय हो सकता है।
बिना कारण सिरदर्द व पेट दर्द: किसी स्पष्ट शारीरिक कारण के बिना बार-बार सिर या पेट में दर्द की शिकायत मानसिक तनाव का शारीरिक रूप हो सकती है।
बढ़ता चिड़चिड़ापन: छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ना या असामान्य रूप से संवेदनशील हो जाना।
अचानक मूड बदलना: कुछ ही पलों में खुश से उदास या गुस्सैल हो जाना — बिना किसी स्पष्ट वजह के।
हर बात पर गुस्सा: हर छोटी बात पर क्रोध करना या झगड़ालू व्यवहार प्रदर्शित करना।
सामाजिक अलगाव: दोस्तों और परिवार से दूरी बनाना, खेलने या बाहर जाने से इनकार करना।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, माता-पिता को बच्चों के इन व्यवहारों को केवल शरारत नहीं समझना चाहिए। उनका सुझाव है कि बच्चों के साथ खुलकर और बिना निर्णय के बातचीत करें, उनकी बातों को ध्यान से सुनें। यदि ये लक्षण लगातार बने रहें, तो किसी योग्य बाल मनोवैज्ञानिक या काउंसलर से परामर्श लेने में देरी न करें।
माता-पिता की भूमिका
नेशनल हेल्थ मिशन ने माता-पिता से अपील की है कि वे बच्चों के सबसे पहले और सबसे भरोसेमंद साथी बनें। छोटी-छोटी बातों पर डाँटने की बजाय समझने की कोशिश करें। विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर पहचान और सही सहयोग से बच्चों की कई मानसिक समस्याओं को गंभीर होने से रोका जा सकता है।
आगे क्या करें
यदि ऊपर बताए गए लक्षण किसी बच्चे में लगातार दिख रहे हैं, तो स्कूल काउंसलर, बाल रोग विशेषज्ञ या मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर से तुरंत संपर्क करें। शुरुआती हस्तक्षेप न केवल बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है, बल्कि उसके समग्र विकास और भविष्य पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है।