बारामूला में 7 एनसी नेता नजरबंद, श्रीनगर में 13 जुलाई पर कड़ी सुरक्षा; इल्तिजा मुफ्ती ने भी लगाया आरोप
सारांश
मुख्य बातें
जम्मू-कश्मीर की नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) ने आरोप लगाया है कि 13 जुलाई को 'मजार-ए-शुहादा' पर श्रद्धांजलि देने से रोकने के लिए बारामूला जिले के कम-से-कम सात वरिष्ठ नेताओं को पुलिस ने नजरबंद कर दिया। श्रीनगर में भी लाल चौक सहित संवेदनशील इलाकों में सुरक्षाबलों की व्यापक तैनाती की गई है।
किन नेताओं को किया गया नजरबंद
नेशनल कॉन्फ्रेंस की आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, उरी के विधायक सज्जाद शफी, बारामूला के विधायक जावेद हसन बेग, सोपोर के विधायक इरशाद रसूल कर, गुलमर्ग के विधायक पीरजादा फारूक अहमद शाह और पट्टन के विधायक जावेद रियाद बेदार को पुलिस ने नजरबंद किया। इनके अलावा पार्टी के बारामूला जिला अध्यक्ष शाहिद अली शाह और महिला विंग की जिला अध्यक्ष नीलोफर मसूद को भी हिरासत में लिए जाने की बात कही गई है।
पार्टी का कहना है कि इन सभी नेताओं की योजना 13 जुलाई को मजार-ए-शुहादा पर पुष्पांजलि अर्पित करने की थी, लेकिन पाबंदियों के चलते वे वहाँ पहुँच नहीं सके। नेताओं ने इस कार्रवाई को शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने की कोशिश बताया है।
श्रीनगर में सुरक्षा का व्यापक बंदोबस्त
श्रीनगर के डाउनटाउन इलाके में स्थित शहीद कब्रिस्तान के आसपास लोगों की आवाजाही पर रोक लगाई गई है और कड़ी निगरानी रखी जा रही है। लाल चौक सहित कई अहम स्थानों पर पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान बड़ी संख्या में तैनात हैं।
अधिकारियों के अनुसार, क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के कब्रिस्तान की ओर जाने की आशंका के मद्देनजर यह सुरक्षा व्यवस्था की गई है। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त बल तैनात किया गया है।
इल्तिजा मुफ्ती का आरोप और एनसी सरकार पर निशाना
इससे एक दिन पहले, रविवार को पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) प्रमुख महबूबा मुफ्ती की बेटी इल्तिजा मुफ्ती ने भी खुद को नजरबंद किए जाने का आरोप लगाया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक वीडियो साझा करते हुए लिखा, 'शहीद दिवस से ठीक पहले हमें नजरबंद कर दिया गया है। इसकी वजह सिर्फ जम्मू-कश्मीर पुलिस ही बेहतर जानती है। क्या यही वह 'सामान्य स्थिति' है, जिसके कश्मीर में बहाल होने का दावा किया जाता है?'
इल्तिजा ने नेशनल कॉन्फ्रेंस नीत स्थानीय सरकार पर भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने लिखा, 'इसमें कोई शक नहीं कि स्थानीय सरकार भी पुलिस के साथ मिलकर सिधरा में घर तोड़ने और अपनी सुविधानुसार विरोधियों को हिरासत में लेने का काम कर रही है।' ये आरोप एनसी और पीडीपी के बीच बढ़ती राजनीतिक खाई को भी उजागर करते हैं।
13 जुलाई का ऐतिहासिक संदर्भ
गौरतलब है कि 13 जुलाई जम्मू-कश्मीर में शहीद दिवस के रूप में जाना जाता है। 1931 में इसी दिन डोगरा शासन के विरुद्ध प्रदर्शन कर रहे 22 कश्मीरियों को गोली मार दी गई थी। यह तारीख कश्मीर की राजनीति में गहरे भावनात्मक और ऐतिहासिक महत्व रखती है, और हर वर्ष इस दिन मजार-ए-शुहादा पर राजनीतिक दलों द्वारा श्रद्धांजलि अर्पित करने की परंपरा रही है। यह पहली बार नहीं है जब इस दिन के आसपास राजनीतिक गतिविधियों पर पाबंदियाँ लगाई गई हों।
आगे की स्थिति
नेशनल कॉन्फ्रेंस ने नजरबंदी की कड़ी आलोचना करते हुए इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बताया है। राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाओं और सुरक्षा बंदोबस्त को देखते हुए 13 जुलाई का दिन जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक बार फिर तनाव का केंद्र बना हुआ है।