13 जुलाई 1931 के शहीदों को फारूक व उमर अब्दुल्ला की श्रद्धांजलि, एनसी को बताया विरासत की सच्ची संरक्षक
सारांश
मुख्य बातें
जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला और पार्टी के उपाध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने 13 जुलाई 1931 के शहीदों को नमन करते हुए उनके बलिदान को जम्मू-कश्मीर में न्याय, मानवीय सम्मान और लोकतांत्रिक अधिकारों के संघर्ष का निर्णायक अध्याय करार दिया। 95वें यौम-ए-शुहदा (शहीद दिवस) की पूर्व संध्या पर 12 जुलाई को जारी संयुक्त संदेश में दोनों नेताओं ने कहा कि वह दिन तत्कालीन रियासत जम्मू-कश्मीर में निरंकुश शासन और दमन के विरुद्ध जन-प्रतिरोध की ऐतिहासिक शुरुआत था।
शहीदों का बलिदान और ऐतिहासिक संदर्भ
डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने अपने संदेश में कहा कि 13 जुलाई 1931 को 21 निहत्थे कश्मीरियों ने बुनियादी नागरिक और राजनीतिक अधिकारों की माँग करते हुए अपने प्राण न्योछावर किए। उनके अनुसार, इस घटना ने शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के नेतृत्व में मानवाधिकार, सम्मान और न्याय के लिए चले दीर्घकालिक जन-आंदोलन की नींव रखी।
फारूक अब्दुल्ला ने कहा, 'सम्मान की भावना को अन्याय से दबाया नहीं जा सकता। 13 जुलाई के शहीदों ने साबित किया कि धैर्य और शांतिपूर्ण संघर्ष की भावना अंततः अत्याचार पर विजय प्राप्त करती है। मैं उन सभी वीर शहीदों को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ और विशेष रूप से युवाओं से अपील करता हूँ कि वे अपने सामूहिक संघर्ष के इतिहास से जुड़े रहें।'
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का संदेश
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि 13 जुलाई के शहीदों का बलिदान सदा मानवता के सम्मान, न्याय और मौलिक अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक बना रहेगा। उन्होंने कहा, 'मैं उन महान शहीदों को श्रद्धांजलि देता हूँ जिन्होंने निरंकुश शासन को चुनौती देते हुए अपने प्राणों की आहुति दी। उनका बलिदान एक ऐसा मोड़ था जिसने आने वाली पीढ़ियों को अन्याय के खिलाफ उठ खड़े होने की प्रेरणा दी। 13 जुलाई हमें हमेशा एकता, करुणा और शांतिपूर्ण प्रतिरोध की ताकत की याद दिलाता रहेगा।'
शेख अब्दुल्ला की विरासत और 'जमीन उसी की' कार्यक्रम
दोनों नेताओं ने उस प्रसंग का उल्लेख किया जिसे उन्होंने 13 जुलाई के एक शहीद की शेख-ए-कश्मीर शेख मोहम्मद अब्दुल्ला से की गई अंतिम इच्छा बताया। उनके अनुसार, शेख अब्दुल्ला ने उस संकल्प को पूरा करते हुए व्यापक सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक सुधार लागू किए। इनमें सबसे प्रमुख 'जमीन उसी की, जो जोते' कार्यक्रम था, जिसने आम जन-जीवन में आमूलचूल परिवर्तन लाया। गौरतलब है कि यह भूमि-सुधार कार्यक्रम स्वतंत्र भारत के शुरुआती दशकों में सबसे साहसी कृषि-सुधारों में गिना जाता है।
एनसी की प्रतिबद्धता और जमीनी श्रद्धांजलि
नेशनल कॉन्फ्रेंस नेतृत्व ने दोहराया कि पार्टी 13 जुलाई के शहीदों की विरासत की सच्ची संरक्षक है और एक न्यायपूर्ण, समृद्ध एवं शांतिपूर्ण जम्मू-कश्मीर के निर्माण के उनके मिशन को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है, जहाँ सम्मान, समानता और सामाजिक न्याय के आदर्श शासन का मार्गदर्शन करते रहें। पार्टी ने बताया कि जम्मू-कश्मीर भर में एनसी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भी 13 जुलाई 1931 के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित कर उनके सर्वोच्च बलिदान को याद किया।
यह ऐसे समय में आया है जब जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार अपनी राजनीतिक पहचान को ऐतिहासिक जन-आंदोलनों से जोड़कर मज़बूत करने की कोशिश कर रही है। आने वाले दिनों में 13 जुलाई को आयोजित होने वाले आधिकारिक कार्यक्रम इस विमर्श को और आकार देंगे।