11 जुलाई 2026
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महाकालेश्वर मंदिर में आषाढ़ द्वादशी पर भस्म आरती: बेल पत्र, भांग-चंदन, रजत मुकुट और रुद्राक्ष माला से हुआ बाबा का दिव्य शृंगार

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महाकालेश्वर मंदिर में आषाढ़ द्वादशी पर भस्म आरती: बेल पत्र, भांग-चंदन, रजत मुकुट और रुद्राक्ष माला से हुआ बाबा का दिव्य शृंगार

सारांश

उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में आषाढ़ कृष्ण पक्ष द्वादशी पर बाबा महाकाल की भस्म आरती संपन्न हुई। बेल पत्र, भांग-चंदन, रजत मुकुट और रुद्राक्ष की माला से हुए दिव्य शृंगार के दर्शन के लिए श्रद्धालु रात से ही कतार में खड़े रहे।

मुख्य बातें

श्री महाकालेश्वर मंदिर , उज्जैन में 11 जुलाई 2026 को आषाढ़ कृष्ण पक्ष द्वादशी पर भस्म आरती संपन्न हुई।
बाबा महाकाल का बेल पत्र , भांग-चंदन , रजत मुकुट और रुद्राक्ष माला से दिव्य शृंगार किया गया।
अभिषेक में पंचामृत (दूध, दही, घी, शक्कर, फलों का रस) और हरि ओम जल का उपयोग हुआ।
अब भस्म आरती में कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों से तैयार भस्म का उपयोग होता है।
दर्शन के लिए श्रद्धालु बीती रात से कतार में खड़े रहे; मंदिर परिसर में बड़े पैमाने पर पुलिस तैनाती रही।

उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर में 11 जुलाई 2026 को आषाढ़ कृष्ण पक्ष द्वादशी के पावन अवसर पर बाबा महाकाल की विधिवत भस्म आरती संपन्न हुई। इस अलौकिक धार्मिक अनुष्ठान के दर्शन के लिए देश-विदेश से आए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर परिसर में उपस्थित रहे।

कपाट खुलने का क्रम

शनिवार की तड़के भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के बाद ढोल-नगाड़ों की गूँज के साथ बाबा महाकाल के पट खोले गए। जैसे ही श्रद्धालुओं को भगवान के दर्शन हुए, पूरा मंदिर परिसर "जय श्री महाकाल" के जयघोष से गुंजायमान हो उठा। घंटियों की टंकार, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया।

दिव्य अभिषेक और शृंगार

कपाट खुलते ही मंत्रोच्चार के मध्य भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया। इसके पश्चात दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस से निर्मित पंचामृत से अभिषेक संपन्न हुआ। बाबा को हरि ओम का जल अर्पित किया गया। तत्पश्चात बेल पत्र, भांग-चंदन, रजत मुकुट और रुद्राक्ष की माला अर्पित कर भगवान का भव्य शृंगार किया गया। मंदिर के पुजारी ने महाआरती संपन्न कराई।

भस्म आरती की परंपरा और विशेषता

जानकारी के अनुसार, प्राचीन काल में बाबा महाकाल को श्मशान की राख से भस्म आरती की जाती थी, परंतु अब विशेष रूप से कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों से तैयार भस्म का उपयोग किया जाता है। इस अनुष्ठान में भाग लेने वाले पुरुष श्रद्धालुओं के लिए पारंपरिक धोती-सोला और महिलाओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है।

आम जनता और व्यवस्था पर असर

बाबा महाकाल की भस्म आरती की ख्याति देश-विदेश में फैली हुई है। इस दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु बीती रात से ही कतार में खड़े थे। मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में व्यवस्था बनाए रखने के लिए बड़े पैमाने पर पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी।

आगे की आस्था का सफर

महाकालेश्वर मंदिर के ये नियमित धार्मिक अनुष्ठान उज्जैन को देश के प्रमुख तीर्थस्थलों में विशिष्ट स्थान दिलाते हैं। आने वाले सावन माह में श्रद्धालुओं की संख्या में और अधिक वृद्धि की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उज्जैन की सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान का केंद्र बन चुकी है। यह ऐसे समय में और महत्वपूर्ण हो जाती है जब आने वाला सावन माह श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लाएगा और स्थानीय प्रशासन के लिए व्यवस्था एक बड़ी चुनौती होगी। भस्म की परंपरा में बदलाव — श्मशान राख से कपिला गाय के गोबर की भस्म तक — एक सोचे-समझे सुधार को दर्शाता है, जिसे मुख्यधारा की कवरेज अक्सर नज़रअंदाज़ करती है।
RashtraPress
11 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती क्या है?
भस्म आरती श्री महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन का सबसे प्रमुख और प्राचीन धार्मिक अनुष्ठान है, जिसमें भगवान महाकाल को भस्म अर्पित कर आरती की जाती है। वर्तमान में कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों से तैयार भस्म का उपयोग होता है।
11 जुलाई 2026 को भस्म आरती किस अवसर पर हुई?
यह भस्म आरती आषाढ़ कृष्ण पक्ष द्वादशी के पावन अवसर पर संपन्न हुई। इस दिन बाबा महाकाल का बेल पत्र, भांग-चंदन, रजत मुकुट और रुद्राक्ष की माला से विशेष शृंगार किया गया।
भस्म आरती में शामिल होने के लिए क्या नियम हैं?
भस्म आरती में पुरुष श्रद्धालुओं के लिए पारंपरिक धोती-सोला और महिलाओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है। यह नियम मंदिर प्रशासन द्वारा अनुष्ठान की पवित्रता बनाए रखने के लिए लागू किया गया है।
महाकाल की भस्म आरती में भस्म की परंपरा कैसे बदली?
जानकारी के अनुसार, पहले बाबा महाकाल को श्मशान की राख से भस्म आरती होती थी, लेकिन अब विशेष रूप से कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों से तैयार भस्म का उपयोग किया जाता है। यह बदलाव धार्मिक परंपरा में एक सुविचारित सुधार माना जाता है।
महाकालेश्वर मंदिर में दर्शन के लिए कब जाना उचित है?
भस्म आरती तड़के सुबह होती है और इसके लिए श्रद्धालु रात से ही कतार में खड़े हो जाते हैं। आने वाले सावन माह में भीड़ और अधिक बढ़ने की संभावना है, इसलिए पहले से पंजीकरण कराना उचित रहता है।
राष्ट्र प्रेस
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