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महाकालेश्वर मंदिर उज्जैन: ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी पर बाबा महाकाल का रजत आभूषण, बेलपत्र व रुद्राक्ष से भव्य श्रृंगार

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महाकालेश्वर मंदिर उज्जैन: ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी पर बाबा महाकाल का रजत आभूषण, बेलपत्र व रुद्राक्ष से भव्य श्रृंगार

सारांश

उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी पर बाबा महाकाल का रजत आभूषण, बेलपत्र और रुद्राक्ष माला से भव्य श्रृंगार हुआ। कपिला गाय के गोबर व जड़ी-बूटियों से तैयार भस्म से आरती संपन्न हुई और 'जय श्री महाकाल' के जयघोष से परिसर गूँज उठा।

मुख्य बातें

उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में 13 जून 2026 को ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष त्रयोदशी पर विशेष भस्म आरती हुई।
बाबा महाकाल का रजत आभूषण , बेलपत्र , रजत मुकुट और रुद्राक्ष माला से भव्य श्रृंगार किया गया।
अभिषेक में जल के साथ दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस से बने पंचामृत का उपयोग हुआ।
भस्म आरती में अब कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों से तैयार विशेष भस्म प्रयुक्त होती है।
आरती के दौरान पुरुषों के लिए धोती-सोला और महिलाओं के लिए साड़ी अनिवार्य है।
मंदिर परिसर में बड़े पैमाने पर पुलिस बल की तैनाती से सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन सुनिश्चित किया गया।

उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में शनिवार, 13 जून 2026 को ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष त्रयोदशी के पावन अवसर पर बाबा महाकाल की विशेष भस्म आरती संपन्न हुई। भगवान को बेलपत्र, रुद्राक्ष की माला और रजत आभूषण अर्पित कर दिव्य श्रृंगार किया गया, जिसके दर्शन के लिए देर रात से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग गई थीं।

कपाट खुलने का क्षण और भक्तों का उत्साह

तड़के सवेरे भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने की परंपरा के बाद ढोल-नगाड़ों की गूँज के साथ बाबा महाकाल के कपाट खोले गए। जैसे ही भस्म आरती और दिव्य श्रृंगार के पश्चात श्रद्धालुओं को दर्शन का सौभाग्य मिला, पूरा मंदिर परिसर 'जय श्री महाकाल' के जयघोष से गूँज उठा। घंटियों की टंकार, शंखध्वनि और वैदिक मंत्रोच्चार ने वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।

अभिषेक और श्रृंगार की विधि

मंदिर के कपाट खुलते ही विधिपूर्वक जलाभिषेक किया गया। इसके बाद दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस से निर्मित पंचामृत से भगवान महाकाल का अभिषेक संपन्न हुआ। श्रृंगार में बेलपत्र, रजत मुकुट और रुद्राक्ष की माला अर्पित की गई। मंदिर के पुजारी ने महाआरती संपन्न कराई, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

भस्म आरती की परंपरा और विशेषता

जानकारी के अनुसार, पूर्व में भस्म आरती में श्मशान की राख का उपयोग होता था, किंतु अब कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों से विशेष रूप से तैयार भस्म का प्रयोग किया जाता है। भस्म आरती के दौरान पुरुष श्रद्धालुओं के लिए पारंपरिक धोती-सोला और महिला श्रद्धालुओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है — यह परंपरा मंदिर की धार्मिक गरिमा को अक्षुण्ण रखती है।

आम जनता पर असर और व्यवस्था

बाबा महाकाल की भस्म आरती देश-विदेश में विख्यात है। इसके दर्शन के लिए सामान्य श्रद्धालुओं से लेकर著名 हस्तियाँ तक उज्जैन पहुँचती हैं। मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी ताकि भीड़ प्रबंधन सुचारु रहे और श्रद्धालुओं को किसी असुविधा का सामना न करना पड़े।

आगे की आस्था

गौरतलब है कि महाकालेश्वर मंदिर भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और उज्जैन की धार्मिक पहचान का केंद्र बिंदु है। प्रत्येक पर्व-तिथि पर यहाँ विशेष श्रृंगार की परंपरा सदियों से चली आ रही है, जो इस मंदिर को भारत के सर्वाधिक दर्शनीय धार्मिक स्थलों में अग्रणी बनाती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उज्जैन की सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान का स्तंभ है — प्रत्येक विशेष तिथि पर यहाँ उमड़ने वाली भीड़ स्थानीय पर्यटन और व्यापार को सीधे प्रभावित करती है। भस्म की संरचना में श्मशान राख से कपिला गाय के गोबर और जड़ी-बूटियों की ओर परिवर्तन मंदिर प्रशासन की परंपरा और आधुनिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन की कोशिश दर्शाता है। यह ध्यान देने योग्य है कि 12 ज्योतिर्लिंगों में एकमात्र 'दक्षिणमुखी' शिवलिंग होने के कारण महाकाल की आस्था का विस्तार केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं — यह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय श्रद्धालुओं को भी खींचती है।
RashtraPress
28 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाकालेश्वर मंदिर की भस्म आरती क्या है और यह क्यों खास है?
भस्म आरती उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन तड़के होने वाली विशेष आरती है, जिसमें भगवान शिव को भस्म अर्पित की जाती है। यह 12 ज्योतिर्लिंगों में से एकमात्र ऐसी आरती है जो ब्रह्म मुहूर्त में संपन्न होती है और इसे देखने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं।
भस्म आरती में किस प्रकार की भस्म का उपयोग होता है?
जानकारी के अनुसार, पहले श्मशान की राख का उपयोग होता था, किंतु अब कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों से विशेष रूप से तैयार भस्म का प्रयोग किया जाता है। यह बदलाव मंदिर प्रशासन द्वारा परंपरा और आधुनिक मानकों के अनुरूप किया गया है।
भस्म आरती के दर्शन के लिए क्या पहनावा अनिवार्य है?
भस्म आरती के दौरान पुरुष श्रद्धालुओं के लिए पारंपरिक धोती-सोला और महिला श्रद्धालुओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है। यह नियम मंदिर की धार्मिक गरिमा और पवित्रता बनाए रखने के लिए लागू है।
13 जून 2026 को बाबा महाकाल का श्रृंगार किन वस्तुओं से हुआ?
ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष त्रयोदशी पर बाबा महाकाल को रजत आभूषण , रजत मुकुट , बेलपत्र और रुद्राक्ष की माला अर्पित कर भव्य श्रृंगार किया गया। इसके अतिरिक्त पंचामृत — दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस — से अभिषेक भी संपन्न हुआ।
महाकालेश्वर मंदिर के दर्शन के लिए श्रद्धालु कब से पहुँचते हैं?
भस्म आरती के दर्शन के लिए श्रद्धालु देर रात से ही मंदिर के बाहर कतार में खड़े हो जाते हैं। विशेष पर्व-तिथियों पर भीड़ अधिक होती है, इसलिए मंदिर परिसर में बड़े पैमाने पर पुलिसकर्मियों की तैनाती की जाती है।
राष्ट्र प्रेस
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