13 जुलाई 2026
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महाकालेश्वर मंदिर में आषाढ़ चतुर्दशी पर राजा स्वरूप में बाबा महाकाल का शृंगार, भस्म आरती में उमड़े श्रद्धालु

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महाकालेश्वर मंदिर में आषाढ़ चतुर्दशी पर राजा स्वरूप में बाबा महाकाल का शृंगार, भस्म आरती में उमड़े श्रद्धालु

सारांश

आषाढ़ कृष्ण पक्ष चतुर्दशी पर उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में बाबा महाकाल का त्रिपुंड, त्रिनेत्र और भांग से राजा स्वरूप में अलौकिक शृंगार हुआ। भस्म आरती के दिव्य दर्शन के लिए रात से ही श्रद्धालुओं की कतारें लगी रहीं और मंदिर परिसर 'जय श्री महाकाल' के उद्घोष से गूँज उठा।

मुख्य बातें

उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में 13 जुलाई 2026 को आषाढ़ कृष्ण पक्ष चतुर्दशी पर भस्म आरती संपन्न हुई।
बाबा महाकाल का त्रिपुंड, त्रिनेत्र, भांग, चंदन और रजत आभूषणों से राजा स्वरूप में शृंगार किया गया।
पंचामृत अभिषेक में दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस का उपयोग हुआ।
भस्म आरती में अब कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों से तैयार भस्म का उपयोग होता है, पूर्व में शमशान राख का प्रयोग होता था।
भस्म आरती में पुरुषों के लिए धोती-सोला और महिलाओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है।
दर्शन के लिए श्रद्धालु बीती रात से ही पंक्ति में खड़े रहे; व्यवस्था के लिए बड़े पैमाने पर पुलिसकर्मी तैनात रहे।

उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में 13 जुलाई 2026 को आषाढ़ कृष्ण पक्ष चतुर्दशी के पावन अवसर पर बाबा महाकाल की भव्य भस्म आरती संपन्न हुई। त्रिपुंड, त्रिनेत्र और भांग से सुसज्जित राजा स्वरूप में बाबा के दिव्य दर्शन पाने के लिए मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्रित हुए।

कपाट खुलने का दिव्य क्षण

सोमवार की तड़के भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के पश्चात ढोल-नगाड़ों की गूँज के साथ बाबा महाकाल के कपाट विधिवत खोले गए। जैसे ही भस्म आरती और दिव्य शृंगार के बाद श्रद्धालुओं को बाबा के दर्शन हुए, मंदिर परिसर "जय श्री महाकाल" के जयघोष से गुंजायमान हो उठा। घंटियों की टंकार, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार ने वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।

राजा स्वरूप में अलौकिक शृंगार

मंदिर के कपाट खुलते ही मंत्रोच्चार के बीच भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया। तत्पश्चात दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस से निर्मित पंचामृत से अभिषेक संपन्न हुआ। जटाधारी बाबा महाकाल को भांग, चंदन, तिलक और रजत आभूषण अर्पित कर राजा स्वरूप में सोलह शृंगार से सजाया गया। मंदिर के पुजारियों ने महाआरती संपन्न कराई।

भस्म आरती की विशेषता और परंपरा

जानकारी के अनुसार, पूर्व में महाकाल को शमशान की राख अर्पित की जाती थी, किंतु अब विशेष रूप से कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों से तैयार भस्म का उपयोग किया जाता है। भस्म आरती के दौरान पुरुष श्रद्धालुओं के लिए पारंपरिक धोती-सोला और महिलाओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है।

श्रद्धालुओं की आस्था और व्यवस्था

बाबा महाकाल की भस्म आरती देश-विदेश में विख्यात है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु बीती रात से ही दर्शन की पंक्ति में खड़े रहे। सामान्य जनमानस से लेकर著名 हस्तियाँ तक इस अलौकिक आरती के दर्शन के लिए उज्जैन पहुँचती हैं। मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में व्यवस्था बनाए रखने के लिए बड़े पैमाने पर पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी।

आगे क्या

आषाढ़ मास में महाकालेश्वर मंदिर में श्रद्धालुओं का आगमन निरंतर बना रहता है। सावन माह के निकट आने के साथ मंदिर में भक्तों की संख्या और बढ़ने की संभावना है, जिसके मद्देनज़र प्रशासन द्वारा व्यवस्थाएँ और सुदृढ़ की जाएंगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उज्जैन की सांस्कृतिक पहचान और पर्यटन अर्थव्यवस्था की धुरी है। शमशान राख से कपिला गाय की भस्म तक का परिवर्तन परंपरा और आधुनिक स्वास्थ्य-चेतना के बीच संतुलन का प्रयास दर्शाता है। सावन के निकट आते ही श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या मंदिर प्रशासन और स्थानीय प्रशासन दोनों के लिए भीड़-प्रबंधन की परीक्षा भी है — यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि आस्था का यह केंद्र सुरक्षित और सुलभ बना रहे।
RashtraPress
13 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाकालेश्वर मंदिर की भस्म आरती क्या है?
भस्म आरती उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन तड़के होने वाला अनूठा धार्मिक अनुष्ठान है, जिसमें भगवान महाकाल को भस्म अर्पित कर आरती की जाती है। यह देश की सबसे प्रसिद्ध आरतियों में से एक है और इसे देखने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं।
भस्म आरती में किस भस्म का उपयोग होता है?
जानकारी के अनुसार, पहले शमशान की राख का उपयोग होता था, किंतु अब विशेष रूप से कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों से तैयार भस्म का उपयोग किया जाता है। यह बदलाव परंपरा और आधुनिक शुद्धता-मानकों के बीच सामंजस्य का प्रतीक है।
भस्म आरती के दर्शन के लिए ड्रेस कोड क्या है?
भस्म आरती के दौरान पुरुष श्रद्धालुओं के लिए पारंपरिक धोती-सोला और महिला श्रद्धालुओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है। यह नियम मंदिर की पवित्रता और परंपरा को बनाए रखने के लिए लागू है।
13 जुलाई को महाकाल का शृंगार कैसे किया गया?
आषाढ़ कृष्ण पक्ष चतुर्दशी पर बाबा महाकाल का त्रिपुंड, त्रिनेत्र, भांग, चंदन, तिलक और रजत आभूषणों से राजा स्वरूप में शृंगार किया गया। इससे पहले जलाभिषेक और पंचामृत अभिषेक भी संपन्न हुआ।
महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती के दर्शन कैसे करें?
भस्म आरती के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं को पहले से पंजीकरण कराना होता है और निर्धारित ड्रेस कोड का पालन करना अनिवार्य है। भारी भीड़ को देखते हुए श्रद्धालु प्रायः रात से ही पंक्ति में खड़े हो जाते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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