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महाकालेश्वर उज्जैन: ज्येष्ठ अधिकमास त्रयोदशी पर राजा-स्वरूप में सजे बाबा महाकाल, भस्म आरती में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब

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महाकालेश्वर उज्जैन: ज्येष्ठ अधिकमास त्रयोदशी पर राजा-स्वरूप में सजे बाबा महाकाल, भस्म आरती में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब

सारांश

ज्येष्ठ अधिकमास की त्रयोदशी तिथि पर उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में बाबा महाकाल को राजा-स्वरूप में सजाया गया — चंद्रमा, त्रिनेत्र, भांग, चंदन और आभूषणों से अलंकृत इस दिव्य शृंगार के दर्शन के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु उमड़ पड़े।

मुख्य बातें

उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर में 29 मई को ज्येष्ठ अधिकमास की त्रयोदशी तिथि पर विशेष भस्म आरती संपन्न हुई।
बाबा महाकाल को राजा-स्वरूप में सजाया गया — मस्तक पर चंद्रमा, त्रिनेत्र, त्रिपुंड और कमल की आकृति।
पंचामृत अभिषेक में दूध, दही, घी, शहद और शक्कर का उपयोग; भांग, चंदन, सूखे मेवे और आभूषण से शृंगार।
महानिर्वाणी द्वारा विधिवत भस्म अर्पण; शंख, डमरू और घंटी की गूंज से वातावरण आध्यात्मिक।
भक्त गुरुवार रात से ही पंक्तियों में; देश-विदेश से हज़ारों श्रद्धालु दर्शन के लिए उमड़े।

उज्जैन के विश्वविख्यात महाकालेश्वर मंदिर में ज्येष्ठ अधिकमास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर 29 मई को भस्म आरती के अवसर पर बाबा महाकाल को राजा के भव्य स्वरूप में सजाया गया। इस अलौकिक शृंगार के दर्शन के लिए देश-विदेश से हज़ारों श्रद्धालु मंदिर परिसर में उमड़ पड़े।

मुख्य घटनाक्रम

भक्तों की आस्था इतनी प्रबल थी कि वे गुरुवार रात से ही पंक्तियों में खड़े होकर अपने आराध्य की एक झलक पाने की प्रतीक्षा करते रहे। परंपरा के अनुसार, ब्रह्म मुहूर्त में भगवान वीरभद्र से आज्ञा लेकर मंदिर के कपाट खोले गए, और जैसे ही बाबा के दर्शन हुए, भक्त 'हर-हर महादेव' और 'जय महाकाल' के जयकारों से मंदिर परिसर को गुंजायमान करने लगे।

विशेष शृंगार का विवरण

प्रातःकाल सर्वप्रथम बाबा का जलाभिषेक किया गया, इसके पश्चात दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बने पंचामृत से अभिषेक संपन्न हुआ। तत्पश्चात बाबा को राजा-स्वरूप में सुसज्जित किया गया — उनके मस्तक पर चंद्रमा और त्रिनेत्र सजाए गए, त्रिपुंड (तीन रेखाओं वाला तिलक) अंकित किया गया और चंद्रमा पर कमल के फूल की आकृति उकेरी गई।

बाबा को भांग, चंदन, सूखे मेवों और आभूषणों से अलंकृत किया गया। यह दिव्य स्वरूप देखकर उपस्थित भक्त भावविभोर हो उठे। इसके उपरांत महानिर्वाणी द्वारा बाबा को विधिवत भस्म अर्पित की गई।

भस्म आरती का आध्यात्मिक वातावरण

भस्म आरती के दौरान शंख, डमरू और घंटी की मधुर गूंज से पूरा मंदिर परिसर एक अलौकिक आध्यात्मिक वातावरण में डूब गया। मंत्रोच्चार और शंखध्वनि की अनुगूंज के बीच भक्ति और आस्था का ऐसा अनूठा संगम बना, जो श्रद्धालुओं के हृदय में गहरी छाप छोड़ गया।

ज्येष्ठ अधिकमास का महत्व

गौरतलब है कि अधिकमास (जिसे मलमास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है) हिंदू पंचांग में अत्यंत पवित्र माना जाता है और यह लगभग तीन वर्षों में एक बार आता है। इस विशेष तिथि पर महाकालेश्वर में आयोजित भस्म आरती का धार्मिक महत्व कई गुना बढ़ जाता है, जिसके कारण सामान्य दिनों की तुलना में श्रद्धालुओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई।

आगे का कार्यक्रम

अधिकमास की शेष तिथियों पर भी महाकालेश्वर मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन होने की संभावना है। मंदिर प्रशासन की ओर से श्रद्धालुओं से अपील की जाती है कि वे दर्शन की व्यवस्था पहले से सुनिश्चित कर मंदिर पहुँचें।

संपादकीय दृष्टिकोण

किंतु अधिकमास जैसे दुर्लभ धार्मिक अवसरों पर यह संख्या कई गुना बढ़ जाती है — यह भारत की जीवंत तीर्थ-संस्कृति का प्रमाण है। यह ऐसे समय में आया है जब डिजिटल युग में भी पारंपरिक मंदिर-दर्शन की प्रासंगिकता और लोकप्रियता बढ़ रही है। मंदिर प्रशासन के लिए यह अवसर भीड़ प्रबंधन और श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दृष्टि से भी एक परीक्षा है, जिस पर मुख्यधारा की कवरेज प्रायः ध्यान नहीं देती।
RashtraPress
15 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ज्येष्ठ अधिकमास त्रयोदशी पर महाकाल का विशेष शृंगार क्यों किया जाता है?
अधिकमास हिंदू पंचांग में अत्यंत पवित्र माना जाता है और लगभग तीन वर्षों में एक बार आता है। इस दुर्लभ तिथि पर महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती के दौरान बाबा का विशेष राजा-स्वरूप शृंगार किया जाता है, जो सामान्य दिनों से भिन्न और अधिक भव्य होता है।
महाकालेश्वर मंदिर की भस्म आरती में भस्म कौन अर्पित करता है?
महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती के दौरान भस्म अर्पण की परंपरा महानिर्वाणी द्वारा निभाई जाती है। यह अनुष्ठान ब्रह्म मुहूर्त में भगवान वीरभद्र से आज्ञा लेकर कपाट खोलने के पश्चात संपन्न होता है।
29 मई को उज्जैन महाकाल के शृंगार में क्या-क्या शामिल था?
29 मई को बाबा महाकाल को राजा-स्वरूप में सजाया गया। मस्तक पर चंद्रमा, त्रिनेत्र और त्रिपुंड अंकित किए गए; चंद्रमा पर कमल की आकृति उकेरी गई। भांग, चंदन, सूखे मेवे और आभूषणों से अलंकृत करने से पहले पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से अभिषेक किया गया।
महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती का समय क्या है?
महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती ब्रह्म मुहूर्त में, यानी सूर्योदय से पहले तड़के होती है। इस विशेष अवसर पर श्रद्धालु रात से ही पंक्तियों में खड़े हो जाते हैं ताकि दर्शन का अवसर मिल सके।
अधिकमास में उज्जैन महाकाल दर्शन का क्या महत्व है?
अधिकमास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है और यह तीर्थ-दर्शन, पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए विशेष फलदायी माना जाता है। इस दौरान महाकालेश्वर जैसे ज्योतिर्लिंग के दर्शन का पुण्य कई गुना अधिक माना जाता है, जिसके कारण देश-विदेश से श्रद्धालु उज्जैन पहुँचते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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