हत्यारोपी बीडीओ प्रशांत बर्मन ने कलकत्ता हाईकोर्ट का सरेंडर आदेश ठुकराया, सुप्रीम कोर्ट पहुंचा
सारांश
मुख्य बातें
पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर जिले के रायगंज के फरार ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर (बीडीओ) प्रशांत बर्मन ने 6 अक्टूबर 2026 को कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा दिए गए 48 घंटे के भीतर सरेंडर के आदेश का पालन नहीं किया। सोने के व्यापारी स्वपन कामिल्या की अपहरण और हत्या के मामले में मुख्य आरोपी बर्मन ने आत्मसमर्पण करने की बजाय हाईकोर्ट के आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देना उचित समझा।
मामले का मुख्य घटनाक्रम
6 अक्टूबर 2026 को कलकत्ता हाईकोर्ट की एक डिवीजन बेंच ने स्पष्ट आदेश दिया था कि यदि प्रशांत बर्मन निर्धारित समयसीमा के भीतर सरेंडर नहीं करते, तो उनकी संपत्ति जब्त करने की प्रक्रिया तत्काल प्रभाव से शुरू की जाए। इसके साथ ही अदालत ने राज्य सरकार को बर्मन का वेतन तुरंत बंद करने का भी निर्देश दिया था।
परंतु डेडलाइन समाप्त होने के बाद भी बर्मन ने सरेंडर नहीं किया और 8 अक्टूबर 2026 को उन्होंने हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पृष्ठभूमि: कौन है प्रशांत बर्मन और क्या है मामला
कथित तौर पर पिछले साल अक्टूबर 2025 में जलपाईगुड़ी जिले के राजगंज के तत्कालीन बीडीओ प्रशांत बर्मन को कोलकाता के साल्ट लेक स्थित दत्ताबाद इलाके में पश्चिम मिदनापुर निवासी सोने के व्यापारी स्वपन कामिल्या के अपहरण और हत्या में मुख्य आरोपी के रूप में चिह्नित किया गया था। तब से वह फरार चल रहे हैं।
गौरतलब है कि इस मामले में जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी बर्मन ने निचली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं किया था। इसके बाद यातायात नियम उल्लंघन से जुड़े एक अलग मामले में उन्हें गिरफ्तार किया गया, किंतु अगले ही दिन उन्हें जमानत मिल गई।
जाँच एजेंसी की विफलता पर अदालत की नाराज़गी
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट को बताया था कि प्रशांत बर्मन का ठिकाना नहीं मिल पा रहा है। इस पर अदालत ने क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (सीआईडी) से कड़े सवाल किए थे कि एक निलंबित सरकारी अधिकारी को ढूंढने में वह आखिर क्यों नाकाम रहा। अब बर्मन का सुप्रीम कोर्ट जाना इस मामले को एक नए कानूनी मोड़ पर ले आया है।
आम जनता और प्रशासन पर असर
यह मामला पश्चिम बंगाल में सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। एक निलंबित बीडीओ का बार-बार न्यायिक आदेशों की अवहेलना करना और जाँच एजेंसियों का उसे पकड़ पाने में असमर्थ रहना — दोनों मिलकर प्रशासनिक तंत्र की कमज़ोरियों को उजागर करते हैं। पीड़ित परिवार के लिए यह लंबा इंतजार न्याय में देरी का प्रतीक बन गया है।
आगे क्या होगा
अब नज़रें सर्वोच्च न्यायालय पर टिकी हैं कि वह प्रशांत बर्मन की याचिका पर क्या रुख अपनाता है। यदि सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा तो बर्मन के लिए सरेंडर के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। वहीं, कलकत्ता हाईकोर्ट के संपत्ति जब्ती और वेतन-बंदी के निर्देशों की स्थिति भी सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के नतीजे पर निर्भर करेगी।