भगत सिंह जयंती 2026: 23 साल की उम्र में जिस क्रांतिकारी से थर्राती थी ब्रिटिश हुकूमत
सारांश
मुख्य बातें
शहीद-ए-आजम भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत के बंगा गाँव में हुआ था — वह स्थान जो आज पाकिस्तान में है। महज 23 वर्ष की आयु में फाँसी के फंदे को चूमने वाला यह नौजवान उस ब्रिटिश साम्राज्य को भीतर तक हिला गया, जिसके राज में कभी सूरज नहीं डूबता था। उनकी शायरी की वह पंक्ति — 'उन्हें यह फिक्र है हरदम, नयी तर्ज-ए-जफा क्या है? हमें यह शौक है देखें, सितम की इन्तहा क्या है?' — उनके अदम्य साहस और वैचारिक गहराई की जीवंत मिसाल है।
क्रांति की पहली चिनगारी
भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह और माता विद्यावती कौर एक किसान परिवार से थे, किंतु घर में देशभक्ति की लौ पहले से जल रही थी। उनके चाचा अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह स्वयं नामचीन क्रांतिकारी थे। जब 1919 में जलियाँवाला बाग हत्याकांड हुआ, तब भगत सिंह मात्र 12 वर्ष के थे। उस दिल-दहलाने वाली खबर ने उनके बाल मन को झकझोर दिया और वे अपने विद्यालय से 12 मील पैदल चलकर जलियाँवाला बाग पहुँचे। वहाँ की मिट्टी को मुट्ठी में भरकर लाने की उस प्रतिज्ञा में ही भविष्य के क्रांतिकारी का बीज छिपा था।
इसके बाद उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज की पढ़ाई छोड़ दी और 1926 में 'नौजवान भारत सभा' की स्थापना की। पहले वे महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रेरित थे, किंतु 1922 में चौरीचौरा कांड के बाद गांधी जी द्वारा आंदोलन वापस लिए जाने से वे निराश हुए। उनकी मान्यता बन गई कि अहिंसा से स्वतंत्रता संभव नहीं। तब वे चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व वाले हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े, जिसे बाद में उनके प्रयासों से हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) नाम दिया गया।
सांडर्स वध और असेंबली बम कांड
1928 में जब लाला लाजपत राय लाठीचार्ज में घायल होने के बाद शहीद हुए, तब भगत सिंह, राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद ने मिलकर 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में ब्रिटिश अफसर जे.पी. सांडर्स को गोली मार दी। इस कार्रवाई ने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी।
इसके बाद आया वह ऐतिहासिक क्षण जो इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है — 8 अप्रैल 1929 को नई दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेंकना। यह कदम किसी की जान लेने के इरादे से नहीं उठाया गया था; इसके पीछे भगत सिंह का वह प्रसिद्ध तर्क था — 'बहरों को सुनाने के लिए धमाका करना ज़रूरी है।' बम उस स्थान पर फेंका गया जहाँ कोई नहीं था। धुएँ से हॉल भर गया और उन्होंने खुद 'इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद' के नारे लगाते हुए पर्चे फेंके। वे चाहते तो भाग सकते थे, लेकिन उन्होंने जानबूझकर गिरफ्तारी दी — ताकि अदालत उनका मंच बने।
जेल में भी जारी रही क्रांति
लाहौर सेंट्रल जेल में करीब 2 वर्ष बिताते हुए भगत सिंह ने जेल को भी क्रांति का मंच बना दिया। कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार के विरोध में उन्होंने 116 दिन की ऐतिहासिक भूख हड़ताल की। इस संघर्ष में उनके साथी यतींद्रनाथ दास ने शहादत दे दी।
जेल में लिखा उनका लेख 'मैं नास्तिक क्यों हूँ?' आज भी विचारशील युवाओं को झकझोरता है। वे हिंदी, उर्दू, पंजाबी, अंग्रेजी और बांग्ला में पारंगत थे। फाँसी के दिन तक वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे — यह उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता का प्रमाण है।
फाँसी और अंग्रेजों का भय
26 अगस्त 1930 को अदालत ने उन्हें दोषी करार दिया और 7 अक्टूबर 1930 को फाँसी की सजा सुनाई। पूरे देश में माफी की अपीलें उठीं। महात्मा गांधी ने भी वायसराय से बात की। लेकिन भगत सिंह स्वयं माफी नहीं चाहते थे — उनका कहना था कि उनकी शहादत सोए हुए देश को जगा देगी।
23 मार्च 1931 को शाम 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर जेल में फाँसी दी गई। कहा जाता है कि उस क्षण तीनों 'मेरा रंग दे बसंती चोला' गा रहे थे। अंग्रेज इतने भयभीत थे कि उन्होंने उनके शवों को बोरियों में भरकर रात के अंधेरे में फिरोजपुर ले जाकर चुपके से जलाने का प्रयास किया। किंतु ग्रामीणों ने देख लिया और उनके अधजले शवों का विधिवत अंतिम संस्कार किया गया।
विरासत जो आज भी जीवित है
भगत सिंह का वह कथन — 'सुधार बूढ़े आदमी नहीं कर सकते, सुधार होते हैं युवाओं के परिश्रम, साहस और बलिदान से' — आज भी भारत के युवाओं की प्रेरणा का स्रोत है। जिस साम्राज्य के राज में सूरज कभी नहीं डूबता था, वह केवल 23 वर्ष के एक नौजवान के नाम से थर-थर काँपती थी — यही उनकी असली विजय थी। उनकी जयंती पर राष्ट्र उस अदम्य आत्मा को नमन करता है, जिसने यह सिद्ध किया कि विचार की ताकत किसी भी साम्राज्य से बड़ी होती है।