12वां अंतरराष्ट्रीय योग दिवस: भारत के एक प्रस्ताव को 175 देशों का समर्थन, 90 दिन से भी कम में बनी वैश्विक परंपरा
सारांश
मुख्य बातें
21 जून 2026 को दुनिया भर में 12वां अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जा रहा है। वैश्विक तनाव, सशस्त्र संघर्षों और बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों के बीच योग की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक गहरी हो गई है। यह दिवस महज एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक यात्रा का प्रमाण है जो नई दिल्ली से शुरू होकर संयुक्त राष्ट्र महासभा तक पहुँची और 90 दिनों से भी कम समय में वैश्विक मान्यता पा गई।
योग की जड़ें और वैश्विक विस्तार
'योग' शब्द संस्कृत भाषा से आया है, जिसका अर्थ है 'जोड़ना' या 'एकत्र होना'। इसका मूल भाव शरीर और चेतना को एकीकृत करना है — मनुष्य को स्वयं से, प्रकृति से और समूचे विश्व से जोड़ना। 5,000 वर्ष पुरानी इस भारतीय शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक पद्धति की जड़ें प्राचीन भारतीय ग्रंथों में मिलती हैं।
विश्व के सर्वाधिक प्रभावशाली योग गुरुओं में से एक बीकेएस अयंगर के अनुसार, 'योग रोज़मर्रा की जिंदगी में संतुलित दृष्टिकोण बनाए रखने के तरीके विकसित करता है और व्यक्ति को अपने कार्यों को कुशलतापूर्वक करने की क्षमता प्रदान करता है।' यह परिभाषा योग को केवल व्यायाम की श्रेणी से ऊपर उठाती है।
संयुक्त राष्ट्र में भारत की ऐतिहासिक पहल
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की नींव सितंबर 2014 में रखी गई, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 69वें सत्र के उद्घाटन संबोधन में इसका प्रस्ताव रखा। मोदी ने अपने भाषण में कहा, 'योग हमारी पुरातन पारंपरिक अमूल्य देन है। योग मन व शरीर, विचार व कर्म, संयम व उपलब्धि की एकात्मकता का और मानव व प्रकृति के बीच सामंजस्य का मूर्त रूप है। यह स्वास्थ्य व कल्याण का समग्र दृष्टिकोण है।'
यूएन में भारत के तत्कालीन राजदूत अशोक मुखर्जी ने महासभा में औपचारिक प्रस्ताव प्रस्तुत किया। 11 दिसंबर 2014 को महासभा ने यह प्रस्ताव पारित कर 21 जून को प्रतिवर्ष अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया।
रिकॉर्ड समर्थन और ऐतिहासिक उपलब्धि
इस प्रस्ताव को 175 सदस्य देशों ने सह-प्रायोजक के रूप में समर्थन दिया — जो संयुक्त राष्ट्र महासभा के किसी भी प्रस्ताव के लिए अब तक की सबसे बड़ी संख्या थी। गौरतलब है कि यह पहली बार था जब किसी देश ने यूएन में 90 दिनों से भी कम समय में किसी ऐसी पहल का प्रस्ताव रखा और उसे लागू भी करवाया। यह तथ्य अपने आप में भारत की कूटनीतिक क्षमता और योग की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है।
पश्चिम से पूर्व तक: बदलती धारणा
एक-दो दशक पहले तक पश्चिमी देश योग को मुख्यतः शरीर को सुडौल बनाने वाली शारीरिक कसरत मानते थे। भारत के प्रमुख योग संस्थानों और शिक्षकों की निरंतर कोशिशों से यह धारणा बदली। शोध और अनुभव ने दर्शाया कि योग कई बीमारियों से लड़ने, मानसिक स्वास्थ्य सुधारने और शांतिपूर्ण जीवन जीने में सहायक है।
आज की प्रासंगिकता
आज जब दुनिया युद्ध, आर्थिक अनिश्चितता और मानसिक स्वास्थ्य संकट से जूझ रही है, तब योग एक जीवन-पद्धति के रूप में और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। दुनिया भर में करोड़ों लोग प्रतिवर्ष 21 जून को सामूहिक योग आयोजनों में हिस्सा लेते हैं — यह सिलसिला 2015 में पहले अंतरराष्ट्रीय योग दिवस से शुरू हुआ और अब एक सुदृढ़ वैश्विक परंपरा बन चुका है।