भोपाल में आदिवासी छात्रों से अभद्रता: मिसरोद थाना प्रभारी निलंबित, उमंग सिंघार ने मांगी FIR
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में आदिवासी छात्रों के साथ अभद्र व्यवहार करने के आरोप में मिसरोद थाने के प्रभारी रतन सिंह परिहार को 14 अक्टूबर 2026 को निलंबित कर दिया गया है। मुख्यमंत्री मोहन यादव के निर्देश पर की गई यह कार्रवाई उस वायरल वीडियो के बाद हुई, जिसमें परिहार छात्रों के साथ दुर्व्यवहार करते दिख रहे हैं। मामले की जाँच के आदेश भी दिए गए हैं।
मुख्य घटनाक्रम
राजधानी भोपाल में आदिवासी छात्र अपनी विभिन्न माँगों को लेकर आंदोलन कर रहे थे और 'जय जोहार' जैसे नारे लगा रहे थे। छात्रों की इस नारेबाज़ी पर थाना प्रभारी रतन सिंह परिहार कथित तौर पर भड़क उठे और उन्होंने छात्रों के साथ अभद्रता की तथा गाली-गलौज की। इस पूरी घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद मामले ने तूल पकड़ा।
मुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस घटना को गंभीरता से लेते हुए तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए। उनके आदेश पर मिसरोद थाना प्रभारी परिहार को निलंबित किया गया और मामले की जाँच शुरू की गई है। प्रशासन की ओर से यह कदम जनदबाव और सोशल मीडिया पर बढ़ती आलोचना के बीच उठाया गया।
नेता प्रतिपक्ष की कड़ी निंदा
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए आवाज़ उठाने वाले आदिवासी छात्रों के साथ 'जोहार' कहने पर अभद्र टिप्पणी और गाली-गलौज किए जाने की घटना अत्यंत गंभीर और निंदनीय है। उन्होंने कहा, 'वर्दी की ताकत का इस्तेमाल नागरिकों को अपमानित करने के लिए नहीं, बल्कि उनके अधिकारों की रक्षा के लिए होना चाहिए।'
सिंघार ने आदिवासी परंपरा का हवाला देते हुए कहा कि 'जोहार' कोई गाली नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति, पहचान, स्वाभिमान और सम्मान का प्रतीक है — यह अभिवादन प्रेम, आदर और भाईचारे का संदेश देता है। उन्होंने चेतावनी दी कि आदिवासी संस्कृति और अस्मिता का अपमान किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
विपक्ष की माँग
नेता प्रतिपक्ष ने माँग की कि दोषी पुलिसकर्मियों के विरुद्ध तत्काल एफआईआर दर्ज कर उनके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि किसी पुलिसकर्मी ने अपने पद का दुरुपयोग किया है, तो उसकी जवाबदेही तय होनी ही चाहिए। सिंघार ने जोर देकर कहा कि कानून के रखवालों से कानून और संविधान के सम्मान की अपेक्षा की जाती है।
आम जनता और आदिवासी समुदाय पर असर
यह घटना ऐसे समय में सामने आई है जब आदिवासी अधिकारों को लेकर मध्य प्रदेश में संवेदनशीलता बढ़ी हुई है। गौरतलब है कि राज्य में आदिवासी आबादी लगभग 21% है और उनकी सांस्कृतिक पहचान एवं संवैधानिक अधिकारों के प्रश्न राजनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। सिंघार ने इस संघर्ष को संविधान, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और आदिवासी अस्मिता के सम्मान से जोड़ा है। मामले में आगे की कार्रवाई और जाँच रिपोर्ट पर सभी की निगाहें टिकी हैं।