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ऐतिहासिक खोज: बिलासपुर में मिला 2000 साल पुराना 3 किलो का दुर्लभ ताम्रपत्र, ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण संदेश

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ऐतिहासिक खोज: बिलासपुर में मिला 2000 साल पुराना 3 किलो का दुर्लभ ताम्रपत्र, ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण संदेश

सारांश

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में ज्ञान भारतम अभियान के दौरान संजीव पाण्डेय के घर से 3 किलो से अधिक वजनी 2000 वर्ष पुराना ताम्रपत्र मिला। इस पर ब्राह्मी लिपि और पाली भाषा में उत्कीर्ण लेख इसे बेहद दुर्लभ और ऐतिहासिक रूप से अमूल्य बनाते हैं।

मुख्य बातें

बिलासपुर, छत्तीसगढ़ में संजीव पाण्डेय के घर से 3 किलोग्राम से अधिक वजनी दुर्लभ ताम्रपत्र मिला।
यह ताम्रपत्र लगभग 2000 वर्ष पुराना है और इस पर ब्राह्मी लिपि व पाली भाषा में लेख उत्कीर्ण हैं।
यह खोज केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के ज्ञान भारतम अभियान के तहत हुई, जो पांडुलिपियों और धरोहरों के संरक्षण को समर्पित है।
प्राचीन काल में इस प्रकार के ताम्रपत्रों का उपयोग भूमि दान, राजकीय आदेश या धार्मिक घोषणाओं के दस्तावेज के रूप में होता था।
मल्हार क्षेत्र पहले से पुरातात्विक दृष्टि से समृद्ध माना जाता है; यह खोज इसके ऐतिहासिक महत्व को और बढ़ाती है।
आगे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा वैज्ञानिक परीक्षण और डिजिटलीकरण किए जाने की संभावना है।

बिलासपुर, 26 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में ज्ञान भारतम अभियान के अंतर्गत एक अत्यंत दुर्लभ और ऐतिहासिक खोज सामने आई है। स्थानीय निवासी संजीव पाण्डेय के आवास से लगभग 3 किलोग्राम से अधिक वजन का एक प्राचीन ताम्रपत्र प्राप्त हुआ है, जिस पर लगभग 2000 वर्ष पुरानी ब्राह्मी लिपि और पाली भाषा में महत्वपूर्ण लेख उत्कीर्ण हैं। यह खोज भारत की प्राचीन सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

ताम्रपत्र की विशेषताएं और ऐतिहासिक महत्व

विशेषज्ञों के अनुसार, ब्राह्मी लिपि भारत की सर्वाधिक प्राचीन लिपियों में गिनी जाती है, जिसका उपयोग मौर्य काल से लेकर कई शताब्दियों तक व्यापक रूप से होता रहा। वहीं, पाली भाषा का सीधा संबंध बौद्ध धर्म के पवित्र ग्रंथों और धार्मिक शिक्षाओं से रहा है। इस ताम्रपत्र पर उत्कीर्ण लेख इसे धार्मिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक — तीनों दृष्टियों से अत्यंत मूल्यवान बनाते हैं।

प्रारंभिक अध्ययन से संकेत मिलते हैं कि प्राचीन काल में इस प्रकार के ताम्रपत्रों का उपयोग भूमि दान, राजकीय आदेश अथवा धार्मिक घोषणाओं के आधिकारिक दस्तावेज के रूप में किया जाता था। ऐसे में यह ताम्रपत्र उस युग की प्रशासनिक व्यवस्था और सामाजिक संरचना पर प्रकाश डाल सकता है।

पुरातत्वविदों और इतिहासकारों की प्रतिक्रिया

इस अप्रत्याशित खोज से पुरातत्वविदों और इतिहासकारों में उत्साह की लहर दौड़ गई है। उनका मानना है कि यदि इस ताम्रपत्र का वैज्ञानिक परीक्षण और विधिवत गहन अध्ययन किया जाए, तो उस कालखंड की सामाजिक व्यवस्था, प्रशासनिक ढांचे और धार्मिक परंपराओं से जुड़ी अमूल्य जानकारियां सामने आ सकती हैं।

यह खोज मल्हार क्षेत्र की ऐतिहासिक समृद्धि को रेखांकित करती है। गौरतलब है कि मल्हार पहले से ही पुरातात्विक महत्व के लिए जाना जाता है और यहां पूर्व में भी कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अवशेष मिल चुके हैं। इस नई खोज ने इस क्षेत्र के ऐतिहासिक कद को और ऊंचा किया है।

ज्ञान भारतम अभियान की भूमिका

केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय द्वारा संचालित ज्ञान भारतम अभियान के तहत देशभर में प्राचीन पांडुलिपियों और ऐतिहासिक धरोहरों की पहचान, संग्रह और संरक्षण का कार्य तीव्र गति से जारी है। इस अभियान के माध्यम से गांव-गांव तक पहुंचकर आम नागरिकों को अपने पास उपलब्ध पुरानी पांडुलिपियों और ऐतिहासिक वस्तुओं को सुरक्षित रखने एवं सार्वजनिक करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

अभियान के अंतर्गत विशेषज्ञ दल इन धरोहरों की प्रामाणिकता की जांच कर उनका डिजिटलीकरण भी कर रहे हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियां भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा से निरंतर जुड़ी रह सकें। यह पहल न केवल सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की दिशा में एक ठोस कदम है, बल्कि देश की बौद्धिक और ऐतिहासिक संपदा को पुनर्जीवित करने का भी एक सशक्त प्रयास है।

व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ और आगे की राह

यह उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ प्राचीन काल में दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था और यह क्षेत्र बौद्ध, जैन तथा हिंदू धर्म की गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। मल्हार जैसे स्थल पहले भी पुरातात्विक उत्खनन में समृद्ध अवशेष देते रहे हैं। इस संदर्भ में यह ताम्रपत्र उस पूरे कालखंड की कड़ियों को जोड़ने में सहायक हो सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस ताम्रपत्र की कार्बन डेटिंग और रासायनिक विश्लेषण के बाद इसकी सटीक आयु और उद्गम स्थान की पुष्टि हो सकेगी। आने वाले महीनों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और संस्कृति मंत्रालय के विशेषज्ञों द्वारा इस पर विस्तृत शोध किए जाने की संभावना है, जिसके परिणाम भारतीय इतिहास लेखन में नए अध्याय जोड़ सकते हैं।

-- राष्ट्र प्रेस

एसएके/वीसी

संपादकीय दृष्टिकोण

धार्मिक संवाद और सांस्कृतिक विमर्श में अग्रणी था। ज्ञान भारतम अभियान की यह उपलब्धि बताती है कि असली धरोहर सरकारी संग्रहालयों में नहीं, बल्कि आम नागरिकों के घरों में दबी पड़ी है। सवाल यह है कि ऐसे अनगिनत अवशेष जो अभी भी अज्ञात हैं, उनके संरक्षण के लिए क्या हमारी संस्थागत तैयारी पर्याप्त है? यह खोज एक अवसर है — इतिहास को फिर से पढ़ने का और छत्तीसगढ़ को उसकी वास्तविक ऐतिहासिक गरिमा दिलाने का।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बिलासपुर में मिला ताम्रपत्र कितना पुराना है और इस पर क्या लिखा है?
बिलासपुर में मिला यह ताम्रपत्र लगभग 2000 वर्ष पुराना माना जा रहा है। इस पर ब्राह्मी लिपि और पाली भाषा में प्राचीन लेख उत्कीर्ण हैं, जो मौर्य काल से संबंधित हो सकते हैं।
ज्ञान भारतम अभियान क्या है और यह ताम्रपत्र कैसे मिला?
ज्ञान भारतम अभियान केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय की एक पहल है जिसके तहत देशभर में प्राचीन पांडुलिपियों और धरोहरों की खोज की जा रही है। इसी अभियान के दौरान बिलासपुर निवासी संजीव पाण्डेय के घर से यह दुर्लभ ताम्रपत्र प्राप्त हुआ।
इस ताम्रपत्र का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व क्या है?
यह ताम्रपत्र ब्राह्मी लिपि और पाली भाषा में होने के कारण बौद्ध धर्म और मौर्य प्रशासन से जुड़ा हो सकता है। प्राचीन काल में ऐसे ताम्रपत्रों का उपयोग भूमि दान, राजकीय आदेश या धार्मिक घोषणाओं के दस्तावेज के रूप में होता था।
मल्हार क्षेत्र पुरातात्विक दृष्टि से क्यों महत्वपूर्ण है?
मल्हार छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख पुरातात्विक स्थल है जहां पहले भी कई ऐतिहासिक अवशेष मिल चुके हैं। यह क्षेत्र प्राचीन दक्षिण कोसल का हिस्सा था और बौद्ध, जैन तथा हिंदू धर्म की गतिविधियों का केंद्र रहा है।
इस ताम्रपत्र की अब आगे क्या जांच होगी?
विशेषज्ञों द्वारा इस ताम्रपत्र की कार्बन डेटिंग और रासायनिक विश्लेषण किए जाने की संभावना है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और संस्कृति मंत्रालय के दल इसका गहन अध्ययन कर इसका डिजिटलीकरण भी करेंगे।
राष्ट्र प्रेस
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