रक्तदान राष्ट्र की सर्वोच्च सेवा: दिल्ली स्पीकर विजेंद्र गुप्ता ने रोहिणी शिविर में दिया संदेश
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने 3 अगस्त 2025 को रोहिणी के सेक्टर-10 स्थित जापानी पार्क में आयोजित रक्तदान शिविर को संबोधित करते हुए कहा कि रक्तदान राष्ट्र की सबसे बड़ी सेवा है। लक्ष्मी तारू फाउंडेशन द्वारा आयोजित इस शिविर में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कोई कारखाना और कोई दौलत रक्त का उत्पादन नहीं कर सकती — इसका एकमात्र स्रोत मानवता स्वयं है।
शिविर का उद्देश्य और संदेश
यह रक्तदान शिविर 'एक बूंद देश के लिए' आदर्श वाक्य के तहत भारतीय सशस्त्र बलों के लिए विशेष रूप से आयोजित किया गया था। स्पीकर गुप्ता ने कार्यक्रम में उपस्थित सैन्य कर्मियों और वरिष्ठ अधिकारियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि आज दान किया गया रक्त एक दिन सीमाओं की रक्षा कर रहे किसी सैनिक की जान बचा सकता है।
उन्होंने कहा कि भारतीय सेना वैश्विक स्तर पर देश को मिलने वाले सम्मान का सबसे बड़ा कारण है, जिसने लगातार साहस और दृढ़ संकल्प के साथ हर खतरे को विफल किया है।
अभियान का नेतृत्व और विस्तार
इस अभियान का नेतृत्व सामाजिक कार्यकर्ता विपिन गर्ग ने किया, जिन्हें 'ब्लड मैन ऑफ दिल्ली' के नाम से जाना जाता है। उनकी प्रेरणा से 20 से अधिक राज्यों के 50 से अधिक गैर सरकारी संगठनों और स्वयंसेवकों ने इस मानवीय प्रयास में भाग लिया।
रक्त संग्रह और चिकित्सा निगरानी के लिए नौ प्रमुख अस्पतालों के साथ समन्वय किया गया और भारतीय सेना के लिए समर्पित दान केंद्र भी स्थापित किए गए।
भागीदारी और लक्ष्य
शिविर में 3,100 यूनिट रक्त एकत्र करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा गया था। शुरुआती घंटों में ही 1,000 से अधिक लोगों ने रक्तदान किया, जो इस अभियान की व्यापक स्वीकृति को दर्शाता है।
भ्रांतियाँ दूर करने की अपील
स्पीकर गुप्ता ने रक्तदान से जुड़ी आम गलतफहमियों को दूर करते हुए जनता से आग्रह किया कि वे झिझक छोड़ें और नियमित रूप से रक्तदान करें। उन्होंने स्पष्ट किया कि रक्तदान से शरीर कमज़ोर नहीं होता, क्योंकि शरीर थोड़े समय में स्वाभाविक रूप से स्वयं की भरपाई कर लेता है।
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार एक स्वस्थ व्यक्ति हर तीन महीने में सुरक्षित रूप से रक्तदान कर सकता है। उन्होंने व्यापक जागरूकता की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि चिकित्सा आपात स्थितियों में परिवारों को संकोच का सामना न करना पड़े।