सीजेआई सूर्यकांत की 'कॉकरोच' टिप्पणी पर एनसीपी (एसपी) का तीखा हमला, अदालत की विश्वसनीयता पर उठाए सवाल
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) — एनसीपी (एसपी) — ने 16 मई 2025 को भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की उस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसमें कथित तौर पर बेरोजगार युवाओं की तुलना 'कॉकरोच' से की गई थी। पार्टी नेताओं ने इसे संवैधानिक गरिमा के विरुद्ध बताते हुए कहा कि इस तरह की भाषा न केवल युवाओं का अपमान करती है, बल्कि न्यायपालिका की साख को भी गहरी चोट पहुँचाती है।
पार्टी नेताओं की तीखी प्रतिक्रिया
एनसीपी (एसपी) नेता फहद अहमद ने कहा, 'अदालत की विश्वसनीयता लगातार गिर रही है। यह भाषा सरकार की उस सोच जैसी लगती है, जहाँ आवाज उठाने वालों को देश-विरोधी या अर्बन नक्सल कहा जाता है। सीजेआई ने उसी भाषा को दोहराया।' उन्होंने आगे कहा कि 'कॉकरोच आसानी से नहीं मरते — वे हर हालात में खुद को ढाल लेते हैं। ये वही युवा हैं जो संविधान के लिए लड़ रहे हैं।'
एनसीपी (एसपी) विधायक रोहित पवार ने टिप्पणी को पूरी तरह अनुचित करार देते हुए कहा कि 'संवैधानिक पद पर बैठे वरिष्ठ व्यक्ति शायद किसी अन्य मुद्दे — जैसे फर्जी डिग्रियों — का संदर्भ दे रहे थे, लेकिन चर्चा के दौरान युवाओं के बारे में दिया गया बयान पूरी तरह अनुचित है। हम इसका समर्थन नहीं करते।'
महाराष्ट्र में महिला सुरक्षा पर भी उठी आवाज़
विधायक रोहित पवार ने डीजीपी कार्यालय में हुई बैठक का उल्लेख करते हुए बताया कि महाराष्ट्र में महिलाओं के विरुद्ध बढ़ते अत्याचारों पर गंभीर चर्चा हुई। उन्होंने कहा, 'कुछ दिन पहले मैं उन दो परिवारों से मिला जिनकी बेटियों के साथ बलात्कार और हत्या की गई थी। परिवार को धमकियाँ मिल रही थीं।' उन्होंने बताया कि डीजीपी ने तत्काल संबंधित एसपी से बात कर मदद का आश्वासन दिया।
कानून को सख्त बनाने की माँग
पवार ने शक्ति कानून और विशेष संहिता विधेयक को केंद्र सरकार द्वारा मंजूरी न दिए जाने पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा, 'इस कानून को और सख्त बनाने की ज़रूरत है। वरना ऐसे मामले 10-20 साल तक चलते रहेंगे। इस सत्र में इसे पास किया जाना चाहिए।' यह ऐसे समय में आया है जब महिला सुरक्षा को लेकर विपक्ष पहले से ही सरकार पर दबाव बना रहा है।
न्यायपालिका की भाषा पर व्यापक बहस
गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय की विश्वसनीयता और न्यायाधीशों की सार्वजनिक टिप्पणियों को लेकर यह पहली बार नहीं है जब राजनीतिक दलों ने आपत्ति जताई हो। आलोचकों का कहना है कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों की भाषा संयमित और समावेशी होनी चाहिए, विशेषकर जब वह हाशिए पर खड़े युवाओं से जुड़ी हो। इस विवाद के आगे बढ़ने के साथ न्यायपालिका की जवाबदेही पर राष्ट्रीय बहस तेज होने की संभावना है।