चोल ताम्रपत्र भारत वापसी: PM मोदी ने नीदरलैंड में 11वीं सदी की धरोहर की स्वदेश वापसी का किया स्वागत

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
चोल ताम्रपत्र भारत वापसी: PM मोदी ने नीदरलैंड में 11वीं सदी की धरोहर की स्वदेश वापसी का किया स्वागत

सारांश

लगभग डेढ़ सदी से नीदरलैंड की लीडेन यूनिवर्सिटी में रखे 11वीं सदी के चोल ताम्रपत्र अब भारत लौटेंगे। PM मोदी ने एम्स्टर्डम में इस ऐतिहासिक प्रत्यावर्तन समारोह में भाग लिया — यह भारत की सांस्कृतिक कूटनीति की एक बड़ी जीत है।

मुख्य बातें

PM नरेंद्र मोदी ने 16 मई 2025 को एम्स्टर्डम में घोषणा की कि 11वीं सदी के चोल ताम्रपत्र नीदरलैंड से भारत वापस लाए जाएंगे।
ये ताम्रपत्र 21 बड़ी और 3 छोटी पट्टियों का समूह हैं, जिन पर मुख्यतः तमिल भाषा में लेख हैं और ये राजेंद्र चोल प्रथम के काल से संबंधित हैं।
ये अभिलेख 19वीं सदी के मध्य से लीडेन यूनिवर्सिटी में संरक्षित थे; नीदरलैंड सरकार ने इनकी वापसी पर सहमति जताई।
PM मोदी ने नीदरलैंड के राजा विलेम-अलेक्जेंडर और रानी मैक्सिमा से हेग के रॉयल पैलेस में मुलाकात की।
यह यात्रा भारत-नीदरलैंड के बीच रणनीतिक साझेदारी पर हस्ताक्षर के उद्देश्य से की गई मोदी की दूसरी नीदरलैंड्स यात्रा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 16 मई 2025 को एम्स्टर्डम से घोषणा की कि 11वीं सदी के चोल ताम्रपत्र शीघ्र ही नीदरलैंड से भारत वापस लाए जाएंगे। नीदरलैंड के प्रधानमंत्री रॉब जेटेन की उपस्थिति में आयोजित एक विशेष समारोह में उन्होंने इस ऐतिहासिक सांस्कृतिक प्रत्यावर्तन में भाग लिया।

ताम्रपत्र क्या हैं और क्यों हैं खास

ये चोल ताम्रपत्र 21 बड़ी और 3 छोटी पट्टियों का एक दुर्लभ समूह हैं, जिन पर मुख्यतः तमिल भाषा में लेख अंकित हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने एक्स पर अपनी पोस्ट में बताया कि ये ताम्रपत्र महान राजेंद्र चोल प्रथम द्वारा अपने पिता राजाराजा प्रथम के एक मौखिक वचन को औपचारिक रूप देने से संबंधित हैं। ये अभिलेख चोल साम्राज्य की प्रशासनिक परंपरा, सांस्कृतिक गौरव और समुद्री शक्ति के प्रमाण हैं।

गौरतलब है कि ये ताम्रपत्र 19वीं सदी के मध्य से नीदरलैंड की प्रतिष्ठित लीडेन यूनिवर्सिटी में संरक्षित थे। प्रधानमंत्री मोदी ने नीदरलैंड सरकार और विशेष रूप से लीडेन यूनिवर्सिटी का इस सांस्कृतिक सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया।

PM मोदी ने क्या कहा

एक्स पर अपनी पोस्ट में प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा, 'हर भारतीय के लिए यह एक खुशी का पल है। 11वीं सदी के चोल ताम्रपत्र नीदरलैंड से भारत वापस लाए जाएंगे।' उन्होंने तमिल भाषा को 'दुनिया की सबसे सुंदर भाषाओं में से एक' बताया और कहा, 'हम भारतीय चोलों, उनकी संस्कृति और उनकी समुद्री शक्ति पर अत्यंत गर्व करते हैं।'

राजपरिवार से मुलाकात और द्विपक्षीय संबंध

इसी दौरे में प्रधानमंत्री मोदी ने हेग स्थित रॉयल पैलेस 'हुइस टेन बॉश' में नीदरलैंड के राजा विलेम-अलेक्जेंडर और रानी मैक्सिमा से भी मुलाकात की। इस बैठक में टेक्नोलॉजी, इनोवेशन, सस्टेनेबल ग्रोथ, व्यापार और जल संसाधन जैसे प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर विचार-विमर्श हुआ।

मोदी ने एक्स पर लिखा, 'भारत और नीदरलैंड्स साझा हितों और एक ऐसे भविष्य के लिए तैयार दुनिया बनाने के साझा विश्वास से जुड़े हुए हैं।' यह नीदरलैंड्स की उनकी दूसरी यात्रा है और इसका मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच एक रणनीतिक साझेदारी पर हस्ताक्षर करना है।

सांस्कृतिक प्रत्यावर्तन का व्यापक संदर्भ

यह प्रत्यावर्तन उस व्यापक प्रयास का हिस्सा है जिसके तहत भारत सरकार विदेशों में रखी गई भारतीय सांस्कृतिक धरोहरों को वापस लाने के लिए कूटनीतिक प्रयास कर रही है। यह ऐसे समय में आया है जब भारत अपनी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और वैश्विक पहचान को लेकर सक्रिय रूप से काम कर रहा है। चोल ताम्रपत्रों की वापसी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि मानी जा रही है।

आगे क्या होगा

ताम्रपत्रों की भारत वापसी की सटीक तिथि और उनके संरक्षण स्थल की आधिकारिक घोषणा अभी बाकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि ये अमूल्य अभिलेख किसी राष्ट्रीय संग्रहालय में प्रदर्शित किए जाएंगे, जहाँ शोधकर्ता और आम जनता दोनों इन्हें देख सकेंगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

असली सवाल यह है कि वापस आने वाली इन धरोहरों का संरक्षण और सार्वजनिक प्रदर्शन भारत में कितने व्यवस्थित तरीके से होगा — क्योंकि अतीत में कई प्रत्यावर्तित वस्तुएँ सरकारी गोदामों में गुमनाम रह गई हैं।
RashtraPress
16 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

चोल ताम्रपत्र क्या हैं और इनका ऐतिहासिक महत्व क्या है?
चोल ताम्रपत्र 11वीं सदी के तांबे की पट्टियों का एक समूह हैं — 21 बड़ी और 3 छोटी — जिन पर मुख्यतः तमिल भाषा में लेख अंकित हैं। ये राजेंद्र चोल प्रथम द्वारा अपने पिता राजाराजा प्रथम के एक मौखिक वचन को औपचारिक रूप देने से संबंधित हैं और चोल साम्राज्य की प्रशासनिक व सांस्कृतिक परंपरा के अमूल्य दस्तावेज़ हैं।
ये ताम्रपत्र नीदरलैंड में कैसे पहुँचे?
ये ताम्रपत्र 19वीं सदी के मध्य से नीदरलैंड की लीडेन यूनिवर्सिटी में संरक्षित थे। औपनिवेशिक काल में अनेक भारतीय सांस्कृतिक वस्तुएँ यूरोपीय संग्रहालयों और विश्वविद्यालयों में पहुँची थीं, जिनमें से कई की वापसी के लिए अब कूटनीतिक प्रयास जारी हैं।
PM मोदी की नीदरलैंड यात्रा का मुख्य उद्देश्य क्या था?
PM मोदी की यह नीदरलैंड्स की दूसरी यात्रा थी, जिसका मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को गहरा करना और एक रणनीतिक साझेदारी पर हस्ताक्षर करना था। इस दौरान टेक्नोलॉजी, इनोवेशन, व्यापार और जल संसाधन जैसे क्षेत्रों में सहयोग पर भी चर्चा हुई।
चोल ताम्रपत्र भारत में कहाँ रखे जाएंगे?
अभी तक भारत सरकार ने इनके संरक्षण स्थल की आधिकारिक घोषणा नहीं की है। ताम्रपत्रों की वापसी की सटीक तिथि और प्रदर्शन स्थल का विवरण बाद में सामने आने की उम्मीद है।
भारत की सांस्कृतिक धरोहर प्रत्यावर्तन नीति क्या है?
भारत सरकार हाल के वर्षों में विदेशों में रखी गई भारतीय कलाकृतियों और ऐतिहासिक वस्तुओं को वापस लाने के लिए सक्रिय कूटनीतिक प्रयास कर रही है। चोल ताम्रपत्रों की वापसी इसी व्यापक प्रयास का हिस्सा है, जो सांस्कृतिक विरासत को विदेश नीति के एक महत्वपूर्ण आयाम के रूप में स्थापित करती है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 2 घंटे पहले
  2. 5 घंटे पहले
  3. 6 घंटे पहले
  4. 7 घंटे पहले
  5. 13 घंटे पहले
  6. 14 घंटे पहले
  7. 9 महीने पहले
  8. 9 महीने पहले