पाकिस्तान पुलिस संकट: सबसे ज़्यादा निशाना, सबसे कम वेतन — खैबर पख्तूनख्वा में 174 जवान शहीद
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान में खैबर पख्तूनख्वा की पुलिस एक विरोधाभासी संकट में फँसी है — यह देश की सबसे अधिक आतंकी हमलों का शिकार होने वाली सुरक्षा एजेंसी है, फिर भी इसे सबसे कम वेतन और सबसे सीमित संसाधनों पर काम करने को मजबूर किया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन पत्रिका द डिप्लोमैट में प्रकाशित एक विस्तृत रिपोर्ट ने इस व्यवस्थागत विफलता को उजागर किया है, जिसमें कम वेतन, न्यायिक लापरवाही और राज्य की उदासीनता को केंद्र में रखा गया है।
वेतन असमानता की चौंकाने वाली तस्वीर
रिपोर्ट के अनुसार, खैबर पख्तूनख्वा में एक पुलिस कांस्टेबल को मासिक लगभग ₹69,000 पाकिस्तानी रुपये मिलते हैं, जबकि वहाँ के डिप्टी सुपरिटेंडेंट का वेतन 1,84,867 रुपये है। इसके विपरीत, बलूचिस्तान में एक डिप्टी सुपरिटेंडेंट को 4,53,727 रुपये मिलते हैं — यानी लगभग ढाई गुना अधिक। यह असमानता तब और गंभीर हो जाती है जब यह ध्यान में आता है कि खैबर पख्तूनख्वा देश का सबसे अस्थिर और आतंकवाद-प्रभावित प्रांत है।
इस असमानता को दूर करने के लिए खैबर पख्तूनख्वा के पुलिस महानिरीक्षक (आईजीपी) ने प्रांत के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर इस क्षेत्र को 'हार्ड एरिया' घोषित करने की माँग की है। इसके लिए सालाना लगभग 2.2 अरब पाकिस्तानी रुपये की अतिरिक्त आवश्यकता बताई गई है।
मुख्य घटनाक्रम: बन्नू हमला और बढ़ती मौतें
9 मई को खैबर पख्तूनख्वा के बन्नू जिले में एक पुलिस चौकी पर हुए हमले में 15 पुलिसकर्मी मारे गए। रिपोर्ट के अनुसार, यह कोई अकेली घटना नहीं थी। सुरक्षा और आतंकवाद मामलों के विशेषज्ञ आमिर हयात ने द डिप्लोमैट में लिखा कि केवल बन्नू जिले में ही पुलिस पर 134 हमले हुए, जिनमें से 27 घातक साबित हुए।
पिछले वर्ष पाकिस्तान में आतंकी हमलों में मारे गए कुल 437 सुरक्षा कर्मियों में से 174 पुलिस बल के जवान थे — जो किसी भी सुरक्षा एजेंसी में सबसे बड़ी संख्या है। इनमें से अधिकांश खैबर पख्तूनख्वा से थे। मृतकों की सूची में लक्की मरवत, डेरा इस्माइल खान, करक, बाजौर और वाना जैसे जिलों के पुलिसकर्मी शामिल थे।
न्यायिक व्यवस्था की विफलता
रिपोर्ट में पाकिस्तान की न्यायिक प्रक्रिया की कमज़ोरी को भी गंभीरता से रेखांकित किया गया है। खैबर पख्तूनख्वा की आतंकवाद निरोधक अदालतों में दर्ज 100 आतंकी हमलों के मामलों में केवल 17 मामलों में दोषसिद्धि हो पाई है। राष्ट्रीय स्तर पर इन अदालतों में 2,200 से अधिक मामले अभी भी लंबित हैं।
इसका एक प्रतीकात्मक उदाहरण पेशावर पुलिस लाइंस मस्जिद पर हुआ हमला है, जिसमें 84 नमाज़ियों की मौत हुई थी। तीन वर्ष बीत जाने के बाद भी इस मामले में मुकदमे की सुनवाई शुरू नहीं हो सकी है। कथित तौर पर उसी पुलिस बल के एक कांस्टेबल ने आतंकी संगठन जमात-उल-अहरार से दो लाख पाकिस्तानी रुपये लेकर इस हमले में सहयोग किया था। उसे 2024 के अंत में गिरफ्तार किया गया, लेकिन मामला अब भी ट्रायल-पूर्व चरण में है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
रिपोर्ट में एक तीखी टिप्पणी की गई है: 'बन्नू में इस सप्ताह जिन पुलिसकर्मियों को दफनाया गया, उन्हें उनके काम के मुकाबले कम वेतन मिला। राज्य का उन पर और उनकी जगह लेने वाले साथियों पर कम से कम इतना कर्ज़ है कि वह उनकी जान की वास्तविक कीमत को स्वीकार करे।'
यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब पाकिस्तान में आंतरिक सुरक्षा पर बहस तेज़ हो रही है और खैबर पख्तूनख्वा में हमलों की आवृत्ति लगातार बढ़ रही है। जब तक वेतन सुधार, न्यायिक दक्षता और संसाधन आवंटन में ठोस बदलाव नहीं होते, इस संकट के गहराने की आशंका बनी रहेगी।