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पाकिस्तान पुलिस संकट: सबसे ज़्यादा निशाना, सबसे कम वेतन — खैबर पख्तूनख्वा में 174 जवान शहीद

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पाकिस्तान पुलिस संकट: सबसे ज़्यादा निशाना, सबसे कम वेतन — खैबर पख्तूनख्वा में 174 जवान शहीद

सारांश

पाकिस्तान की खैबर पख्तूनख्वा पुलिस सबसे खतरनाक मोर्चे पर है — लेकिन सबसे कम वेतन पर। पिछले साल 174 जवान शहीद, बन्नू में 134 हमले, और पेशावर मस्जिद नरसंहार के तीन साल बाद भी कोई सुनवाई नहीं। यह सिर्फ वेतन का सवाल नहीं — यह राज्य की प्राथमिकताओं का आईना है।

मुख्य बातें

द डिप्लोमैट की रिपोर्ट के अनुसार, खैबर पख्तूनख्वा में पुलिस कांस्टेबल का मासिक वेतन लगभग 69,000 पाकिस्तानी रुपये है, जबकि बलूचिस्तान में डिप्टी सुपरिटेंडेंट को 4,53,727 रुपये मिलते हैं।
पिछले वर्ष आतंकी हमलों में मारे गए 437 सुरक्षा कर्मियों में से 174 पुलिसकर्मी थे — सभी एजेंसियों में सर्वाधिक।
9 मई को बन्नू जिले में पुलिस चौकी पर हमले में 15 जवान शहीद हुए; केवल बन्नू में 134 हमले दर्ज।
खैबर पख्तूनख्वा की आतंकवाद निरोधक अदालतों में 100 में से केवल 17 मामलों में दोषसिद्धि; राष्ट्रीय स्तर पर 2,200+ मामले लंबित।
पेशावर पुलिस लाइंस मस्जिद हमले ( 84 मौतें ) के तीन साल बाद भी सुनवाई शुरू नहीं।
आईजीपी ने क्षेत्र को 'हार्ड एरिया' घोषित करने की माँग की, जिसके लिए सालाना 2.2 अरब पाकिस्तानी रुपये की ज़रूरत बताई गई।

पाकिस्तान में खैबर पख्तूनख्वा की पुलिस एक विरोधाभासी संकट में फँसी है — यह देश की सबसे अधिक आतंकी हमलों का शिकार होने वाली सुरक्षा एजेंसी है, फिर भी इसे सबसे कम वेतन और सबसे सीमित संसाधनों पर काम करने को मजबूर किया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन पत्रिका द डिप्लोमैट में प्रकाशित एक विस्तृत रिपोर्ट ने इस व्यवस्थागत विफलता को उजागर किया है, जिसमें कम वेतन, न्यायिक लापरवाही और राज्य की उदासीनता को केंद्र में रखा गया है।

वेतन असमानता की चौंकाने वाली तस्वीर

रिपोर्ट के अनुसार, खैबर पख्तूनख्वा में एक पुलिस कांस्टेबल को मासिक लगभग ₹69,000 पाकिस्तानी रुपये मिलते हैं, जबकि वहाँ के डिप्टी सुपरिटेंडेंट का वेतन 1,84,867 रुपये है। इसके विपरीत, बलूचिस्तान में एक डिप्टी सुपरिटेंडेंट को 4,53,727 रुपये मिलते हैं — यानी लगभग ढाई गुना अधिक। यह असमानता तब और गंभीर हो जाती है जब यह ध्यान में आता है कि खैबर पख्तूनख्वा देश का सबसे अस्थिर और आतंकवाद-प्रभावित प्रांत है।

इस असमानता को दूर करने के लिए खैबर पख्तूनख्वा के पुलिस महानिरीक्षक (आईजीपी) ने प्रांत के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर इस क्षेत्र को 'हार्ड एरिया' घोषित करने की माँग की है। इसके लिए सालाना लगभग 2.2 अरब पाकिस्तानी रुपये की अतिरिक्त आवश्यकता बताई गई है।

मुख्य घटनाक्रम: बन्नू हमला और बढ़ती मौतें

9 मई को खैबर पख्तूनख्वा के बन्नू जिले में एक पुलिस चौकी पर हुए हमले में 15 पुलिसकर्मी मारे गए। रिपोर्ट के अनुसार, यह कोई अकेली घटना नहीं थी। सुरक्षा और आतंकवाद मामलों के विशेषज्ञ आमिर हयात ने द डिप्लोमैट में लिखा कि केवल बन्नू जिले में ही पुलिस पर 134 हमले हुए, जिनमें से 27 घातक साबित हुए।

पिछले वर्ष पाकिस्तान में आतंकी हमलों में मारे गए कुल 437 सुरक्षा कर्मियों में से 174 पुलिस बल के जवान थे — जो किसी भी सुरक्षा एजेंसी में सबसे बड़ी संख्या है। इनमें से अधिकांश खैबर पख्तूनख्वा से थे। मृतकों की सूची में लक्की मरवत, डेरा इस्माइल खान, करक, बाजौर और वाना जैसे जिलों के पुलिसकर्मी शामिल थे।

न्यायिक व्यवस्था की विफलता

रिपोर्ट में पाकिस्तान की न्यायिक प्रक्रिया की कमज़ोरी को भी गंभीरता से रेखांकित किया गया है। खैबर पख्तूनख्वा की आतंकवाद निरोधक अदालतों में दर्ज 100 आतंकी हमलों के मामलों में केवल 17 मामलों में दोषसिद्धि हो पाई है। राष्ट्रीय स्तर पर इन अदालतों में 2,200 से अधिक मामले अभी भी लंबित हैं।

इसका एक प्रतीकात्मक उदाहरण पेशावर पुलिस लाइंस मस्जिद पर हुआ हमला है, जिसमें 84 नमाज़ियों की मौत हुई थी। तीन वर्ष बीत जाने के बाद भी इस मामले में मुकदमे की सुनवाई शुरू नहीं हो सकी है। कथित तौर पर उसी पुलिस बल के एक कांस्टेबल ने आतंकी संगठन जमात-उल-अहरार से दो लाख पाकिस्तानी रुपये लेकर इस हमले में सहयोग किया था। उसे 2024 के अंत में गिरफ्तार किया गया, लेकिन मामला अब भी ट्रायल-पूर्व चरण में है।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

रिपोर्ट में एक तीखी टिप्पणी की गई है: 'बन्नू में इस सप्ताह जिन पुलिसकर्मियों को दफनाया गया, उन्हें उनके काम के मुकाबले कम वेतन मिला। राज्य का उन पर और उनकी जगह लेने वाले साथियों पर कम से कम इतना कर्ज़ है कि वह उनकी जान की वास्तविक कीमत को स्वीकार करे।'

यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब पाकिस्तान में आंतरिक सुरक्षा पर बहस तेज़ हो रही है और खैबर पख्तूनख्वा में हमलों की आवृत्ति लगातार बढ़ रही है। जब तक वेतन सुधार, न्यायिक दक्षता और संसाधन आवंटन में ठोस बदलाव नहीं होते, इस संकट के गहराने की आशंका बनी रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

उसे सबसे कम मूल्य दिया जाता है। खैबर पख्तूनख्वा में वेतन असमानता महज़ प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि यह उस राजनीतिक इच्छाशक्ति की अनुपस्थिति को दर्शाती है जो सीमावर्ती सुरक्षा को प्राथमिकता दे सके। आतंकवाद निरोधक अदालतों में 17% दोषसिद्धि दर और पेशावर मस्जिद मामले में तीन साल की न्यायिक निष्क्रियता यह संकेत देती है कि संस्थागत विफलता केवल पुलिस तक सीमित नहीं है। जब तक जवाबदेही, वेतन सुधार और न्यायिक गति एकसाथ नहीं आते, बन्नू जैसी घटनाएँ दोहराती रहेंगी।
RashtraPress
16 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

खैबर पख्तूनख्वा पुलिस का वेतन संकट क्या है?
द डिप्लोमैट की रिपोर्ट के अनुसार, खैबर पख्तूनख्वा में एक पुलिस कांस्टेबल को लगभग 69,000 पाकिस्तानी रुपये मासिक मिलते हैं, जबकि बलूचिस्तान में डिप्टी सुपरिटेंडेंट का वेतन 4,53,727 रुपये है। यह असमानता देश के सबसे अस्थिर प्रांत में काम करने वाले जवानों के लिए गंभीर मनोबल और भर्ती समस्या पैदा करती है।
बन्नू पुलिस हमले में क्या हुआ था?
9 मई को खैबर पख्तूनख्वा के बन्नू जिले में एक पुलिस चौकी पर हमले में 15 पुलिसकर्मी मारे गए। विशेषज्ञ आमिर हयात के अनुसार, केवल बन्नू जिले में पुलिस पर 134 हमले हो चुके हैं, जिनमें से 27 घातक साबित हुए।
पाकिस्तान में पिछले साल कितने पुलिसकर्मी आतंकी हमलों में मारे गए?
पिछले वर्ष पाकिस्तान में आतंकी हमलों में मारे गए कुल 437 सुरक्षा कर्मियों में से 174 पुलिस बल के जवान थे — जो किसी भी सुरक्षा एजेंसी में सबसे बड़ी संख्या है। इनमें से अधिकांश खैबर पख्तूनख्वा के विभिन्न जिलों से थे।
पेशावर पुलिस लाइंस मस्जिद हमले का मुकदमा क्यों नहीं चला?
रिपोर्ट के अनुसार, पेशावर पुलिस लाइंस मस्जिद हमले — जिसमें 84 नमाज़ियों की मौत हुई थी — को तीन साल बीत जाने के बाद भी मुकदमे की सुनवाई शुरू नहीं हुई है। कथित तौर पर उसी पुलिस बल के एक कांस्टेबल ने आतंकी संगठन जमात-उल-अहरार से दो लाख पाकिस्तानी रुपये लेकर हमले में मदद की थी, जिसे 2024 के अंत में गिरफ्तार किया गया, लेकिन मामला अभी ट्रायल-पूर्व चरण में है।
पाकिस्तान की आतंकवाद निरोधक अदालतों की दोषसिद्धि दर कितनी है?
रिपोर्ट के अनुसार, खैबर पख्तूनख्वा की आतंकवाद निरोधक अदालतों में दर्ज 100 आतंकी हमलों के मामलों में केवल 17 में ही दोषसिद्धि हो पाई है। राष्ट्रीय स्तर पर इन अदालतों में 2,200 से अधिक मामले अभी भी लंबित हैं।
राष्ट्र प्रेस
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