भोजशाला विवाद: दिग्विजय सिंह बोले — 'ASI नियमों के तहत पूजा का कोई प्रावधान नहीं', सुप्रीम कोर्ट जाएगा मुस्लिम पक्ष

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भोजशाला विवाद: दिग्विजय सिंह बोले — 'ASI नियमों के तहत पूजा का कोई प्रावधान नहीं', सुप्रीम कोर्ट जाएगा मुस्लिम पक्ष

सारांश

भोजशाला पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का फैसला आते ही राजनीतिक और कानूनी घमासान शुरू हो गया है। दिग्विजय सिंह ने ASI नियमों का हवाला दिया, मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में है, और AIMIM ने 1991 के उपासना स्थल कानून की अनदेखी का आरोप लगाया — यह विवाद अब देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज़ पर है।

मुख्य बातें

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि ASI-संरक्षित स्मारकों में किसी भी धर्म के लिए पूजा का कानूनी प्रावधान नहीं है।
उन्होंने दावा किया कि उमा भारती के मुख्यमंत्रित्व काल में पेश ASI सर्वे रिपोर्ट में परिसर में मंदिर का कोई प्रमाण नहीं मिला था।
कमाल मौला वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष अब्दुल समद ने फैसले को 'एकतरफा' बताते हुए सर्वोच्च न्यायालय जाने की घोषणा की।
AIMIM नेता वारिस पठान ने आरोप लगाया कि फैसले में वक्फ अधिनियम और उपासना स्थल अधिनियम, 1991 को नज़रअंदाज़ किया गया।
उच्च न्यायालय के फैसले में परिसर में रोज़ाना पूजा का कोई निर्देश नहीं — मामला सरकार के विवेक पर छोड़ा गया।

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने 16 मई को इंदौर में पत्रकारों से बातचीत में भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस विषय पर गहन अध्ययन की आवश्यकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षित स्मारकों में किसी भी धार्मिक स्थल — चाहे मस्जिद हो, मंदिर हो, गुरुद्वारा हो या चर्च — में पूजा-पाठ का कानूनी प्रावधान नहीं है।

दिग्विजय सिंह की मुख्य दलीलें

दिग्विजय सिंह ने कहा कि भोजशाला एक ASI-संरक्षित स्मारक है और इसके नियमों के अंतर्गत किसी भी धार्मिक आयोजन की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए बताया कि जब उमा भारती मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं, उस दौरान सुमित्रा महाजन के पति ने सरकारी वकील के रूप में जो ASI सर्वे रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की थी, उसमें उल्लेख था कि परिसर में मंदिर का कोई भी ठोस प्रमाण नहीं पाया गया।

उन्होंने यह भी याद दिलाया कि बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने एक कानून बनाया था, जिसके तहत स्वतंत्रता के बाद राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद को छोड़कर किसी भी धार्मिक स्थल की स्थिति में बदलाव नहीं किया जा सकता।

राजनीतिक आरोप: BJP पर निशाना

दिग्विजय सिंह ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर तीखा हमला करते हुए कहा कि पार्टी के पास हिंदू-मुस्लिम के अलावा कोई ठोस मुद्दा नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि महंगाई से आम जनता त्रस्त है — सोना इतना महंगा हो गया है कि शादी-विवाह में मंगलसूत्र बनाना मुश्किल हो गया है — और इन असली समस्याओं से ध्यान भटकाने के लिए सांप्रदायिक मुद्दे उठाए जा रहे हैं।

मुस्लिम पक्ष का रुख: सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई

कमाल मौला वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष अब्दुल समद ने उच्च न्यायालय के फैसले को 'पूरी तरह एकतरफा' करार दिया। उन्होंने कहा कि संगठन इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देगा। अब्दुल समद ने यह भी रेखांकित किया कि हिंदू पक्ष खुद भी उच्च न्यायालय के फैसले से पहले ही सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया था, जो उनके अनुसार इस बात का संकेत है कि फैसले को लेकर सभी पक्षों में अनिश्चितता थी।

अब्दुल समद ने यह भी स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय के फैसले में परिसर के भीतर रोज़ाना पूजा शुरू करने का कोई निर्देश नहीं दिया गया है — अदालत ने मामले को सरकार के विवेक पर छोड़ा है।

AIMIM की आपत्ति: वक्फ और 1991 कानून की अनदेखी का आरोप

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के नेता वारिस पठान ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले से 'पूरी विनम्रता के साथ' असहमति जताई। उन्होंने कहा कि यह फैसला बिना समुचित विचार-विमर्श के सुनाया गया है और इसमें दो महत्वपूर्ण कानूनों — वक्फ अधिनियम और उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 — को नज़रअंदाज़ किया गया है। 1991 का यह कानून स्वतंत्रता के समय जिस धार्मिक स्थल की जो स्थिति थी, उसे बनाए रखने का प्रावधान करता है।

आगे क्या होगा

मुस्लिम पक्ष के सर्वोच्च न्यायालय जाने की घोषणा के साथ यह विवाद अब देश की सर्वोच्च अदालत में पहुँचने की ओर अग्रसर है। गौरतलब है कि हिंदू पक्ष पहले ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर चुका है, जिससे यह मामला अब दोनों तरफ से शीर्ष न्यायालय के समक्ष है। यह ऐसे समय में आया है जब देश में कई धार्मिक स्थलों के स्वामित्व को लेकर कानूनी लड़ाइयाँ चल रही हैं और 1991 के उपासना स्थल कानून की प्रासंगिकता पर बहस तेज़ हो रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह भी उतना ही सच है कि उनकी पार्टी इस मुद्दे पर दशकों से कोई स्पष्ट रुख नहीं अपना सकी। 1991 के उपासना स्थल कानून की बार-बार अनदेखी — जिसे AIMIM ने भी रेखांकित किया — यह सवाल खड़ा करती है कि क्या न्यायपालिका इस कानून को वास्तव में एक सीमा-रेखा मान रही है या महज़ एक संदर्भ। जब तक सर्वोच्च न्यायालय इस पर स्पष्ट निर्णय नहीं देता, ऐसे विवाद राजनीतिक ध्रुवीकरण का ईंधन बनते रहेंगे।
RashtraPress
17 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद क्या है?
भोजशाला मध्य प्रदेश के धार में स्थित एक ASI-संरक्षित स्मारक है, जिसे हिंदू पक्ष सरस्वती मंदिर और मुस्लिम पक्ष कमाल मौला मस्जिद मानता है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने हाल ही में इस मामले में फैसला सुनाया, जिसके बाद दोनों पक्षों ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया है।
दिग्विजय सिंह ने भोजशाला पर क्या कहा?
कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि ASI-संरक्षित स्मारकों में किसी भी धर्म के लिए पूजा का कानूनी प्रावधान नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि उमा भारती के मुख्यमंत्रित्व काल में पेश ASI सर्वे रिपोर्ट में मंदिर का कोई प्रमाण नहीं मिला था।
मुस्लिम पक्ष अब क्या करेगा?
कमाल मौला वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष अब्दुल समद ने घोषणा की है कि वे उच्च न्यायालय के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देंगे। उन्होंने फैसले को एकतरफा बताया और कहा कि हिंदू पक्ष भी पहले ही सुप्रीम कोर्ट पहुँच चुका है।
AIMIM ने भोजशाला फैसले पर क्या आपत्ति जताई?
AIMIM नेता वारिस पठान ने आरोप लगाया कि उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में वक्फ अधिनियम और 1991 के उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम को नज़रअंदाज़ किया। 1991 का यह कानून स्वतंत्रता के समय की धार्मिक स्थलों की यथास्थिति बनाए रखने का प्रावधान करता है।
उपासना स्थल अधिनियम 1991 क्या कहता है?
उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 यह सुनिश्चित करता है कि 15 अगस्त 1947 को जिस धार्मिक स्थल की जो धार्मिक पहचान थी, वह बरकरार रहे। राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद को इससे अलग रखा गया था। भोजशाला मामले में इसी कानून की प्रासंगिकता पर बहस जारी है।
राष्ट्र प्रेस
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