भोजशाला विवाद: दिग्विजय सिंह बोले — 'ASI नियमों के तहत पूजा का कोई प्रावधान नहीं', सुप्रीम कोर्ट जाएगा मुस्लिम पक्ष
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने 16 मई को इंदौर में पत्रकारों से बातचीत में भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस विषय पर गहन अध्ययन की आवश्यकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षित स्मारकों में किसी भी धार्मिक स्थल — चाहे मस्जिद हो, मंदिर हो, गुरुद्वारा हो या चर्च — में पूजा-पाठ का कानूनी प्रावधान नहीं है।
दिग्विजय सिंह की मुख्य दलीलें
दिग्विजय सिंह ने कहा कि भोजशाला एक ASI-संरक्षित स्मारक है और इसके नियमों के अंतर्गत किसी भी धार्मिक आयोजन की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए बताया कि जब उमा भारती मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं, उस दौरान सुमित्रा महाजन के पति ने सरकारी वकील के रूप में जो ASI सर्वे रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की थी, उसमें उल्लेख था कि परिसर में मंदिर का कोई भी ठोस प्रमाण नहीं पाया गया।
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने एक कानून बनाया था, जिसके तहत स्वतंत्रता के बाद राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद को छोड़कर किसी भी धार्मिक स्थल की स्थिति में बदलाव नहीं किया जा सकता।
राजनीतिक आरोप: BJP पर निशाना
दिग्विजय सिंह ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर तीखा हमला करते हुए कहा कि पार्टी के पास हिंदू-मुस्लिम के अलावा कोई ठोस मुद्दा नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि महंगाई से आम जनता त्रस्त है — सोना इतना महंगा हो गया है कि शादी-विवाह में मंगलसूत्र बनाना मुश्किल हो गया है — और इन असली समस्याओं से ध्यान भटकाने के लिए सांप्रदायिक मुद्दे उठाए जा रहे हैं।
मुस्लिम पक्ष का रुख: सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई
कमाल मौला वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष अब्दुल समद ने उच्च न्यायालय के फैसले को 'पूरी तरह एकतरफा' करार दिया। उन्होंने कहा कि संगठन इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देगा। अब्दुल समद ने यह भी रेखांकित किया कि हिंदू पक्ष खुद भी उच्च न्यायालय के फैसले से पहले ही सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया था, जो उनके अनुसार इस बात का संकेत है कि फैसले को लेकर सभी पक्षों में अनिश्चितता थी।
अब्दुल समद ने यह भी स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय के फैसले में परिसर के भीतर रोज़ाना पूजा शुरू करने का कोई निर्देश नहीं दिया गया है — अदालत ने मामले को सरकार के विवेक पर छोड़ा है।
AIMIM की आपत्ति: वक्फ और 1991 कानून की अनदेखी का आरोप
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के नेता वारिस पठान ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले से 'पूरी विनम्रता के साथ' असहमति जताई। उन्होंने कहा कि यह फैसला बिना समुचित विचार-विमर्श के सुनाया गया है और इसमें दो महत्वपूर्ण कानूनों — वक्फ अधिनियम और उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 — को नज़रअंदाज़ किया गया है। 1991 का यह कानून स्वतंत्रता के समय जिस धार्मिक स्थल की जो स्थिति थी, उसे बनाए रखने का प्रावधान करता है।
आगे क्या होगा
मुस्लिम पक्ष के सर्वोच्च न्यायालय जाने की घोषणा के साथ यह विवाद अब देश की सर्वोच्च अदालत में पहुँचने की ओर अग्रसर है। गौरतलब है कि हिंदू पक्ष पहले ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर चुका है, जिससे यह मामला अब दोनों तरफ से शीर्ष न्यायालय के समक्ष है। यह ऐसे समय में आया है जब देश में कई धार्मिक स्थलों के स्वामित्व को लेकर कानूनी लड़ाइयाँ चल रही हैं और 1991 के उपासना स्थल कानून की प्रासंगिकता पर बहस तेज़ हो रही है।