भोजशाला फैसले पर हरि शंकर जैन: 'मंदिर था, मंदिर है' — आक्रांताओं का अन्याय दूर हुआ
सारांश
मुख्य बातें
वकील हरि शंकर जैन ने 15 मई 2026 को भोजशाला विवाद पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि न्यायालय ने स्पष्ट रूप से माना है कि वहाँ एक मंदिर था और हिंदुओं को पूजा का अधिकार मिलना चाहिए। उनके अनुसार यह फैसला सदियों पुराने उस अन्याय को दूर करता है जो आक्रांताओं ने किया था।
मुख्य घटनाक्रम
हरि शंकर जैन ने कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा किए गए सर्वेक्षण में वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी के माध्यम से ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक प्रमाण सामने आए। उनके अनुसार इन साक्ष्यों से यह स्थापित होता है कि सन् 1034 में राजा भोज ने वहाँ सरस्वती मंदिर और संस्कृत पाठशाला का निर्माण करवाया था।
जैन ने आगे कहा कि मुस्लिम आक्रांताओं ने उस मंदिर को ध्वस्त कर एक ढाँचा खड़ा किया और वहाँ नमाज़ पढ़ना शुरू कर दिया। उनका तर्क है कि 'नमाज़ पढ़ लेने मात्र से कोई ढाँचा मस्जिद नहीं बन जाता।'
न्यायालय का रुख
जैन के अनुसार उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उस स्थल का धार्मिक स्वरूप मंदिर का है। न्यायालय ने ASI के पूर्व आदेश को भी निरस्त किया और वाग्देवी की प्रतिमा को वापस लाने का निर्देश दिया। जैन ने रेखांकित किया कि यह फैसला मात्र चार वर्षों में आया, जिसे उन्होंने 'पूरे देश की जीत' बताया। उन्होंने यह भी कहा कि उनका प्रण है कि जितने मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाई गई है, उन सबको वापस लाया जाएगा।
विभिन्न पक्षों की प्रतिक्रिया
समाजवादी पार्टी के विधायक रविदास मेहरोत्रा ने कहा कि उच्च न्यायालय के आदेश पर टिप्पणी करना उचित नहीं है और लोगों को अदालत के फैसले को स्वीकार करना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय की वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने कहा कि उन्होंने फैसला नहीं पढ़ा है इसलिए वे कोई टिप्पणी नहीं करेंगी, लेकिन उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के लिए काम करने की आवश्यकता पर बल दिया।
काजी सैयद निसार अली ने कहा कि यह फैसला एक पक्ष के पक्ष में गया है और यह अंतिम नहीं है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय में अपील का रास्ता खुला है। उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान की अदालतों पर भरोसा है कि किसी के साथ अन्याय नहीं होगा।
आगे की राह
यह मामला कथित तौर पर सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दिए जाने की संभावना है, जैसा कि मुस्लिम पक्ष के प्रतिनिधियों ने संकेत दिया है। गौरतलब है कि भोजशाला विवाद दशकों पुराना है और यह मध्य प्रदेश के धार ज़िले में स्थित है, जहाँ दोनों समुदाय अपने-अपने अधिकारों का दावा करते रहे हैं। उच्च न्यायालय का यह फैसला उस लंबी कानूनी लड़ाई में एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है।