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मंगलेश डबराल: पाखंड और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध हिंदी कविता की सशक्त आवाज़

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मंगलेश डबराल: पाखंड और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध हिंदी कविता की सशक्त आवाज़

सारांश

टिहरी गढ़वाल के काफलपानी गाँव से निकलकर हिंदी साहित्य के शीर्ष तक पहुँचे मंगलेश डबराल की कविताएँ पाखंड और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध मितभाषी पर दृढ़ आवाज़ हैं। पत्रकारिता के शोर को कविता के संगीत में बदलने वाले इस कवि की विरासत हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है।

मुख्य बातें

मंगलेश डबराल का जन्म 16 मई 1948 को उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले के काफलपानी गाँव में हुआ।
प्रमुख कविता संकलन: 'पहाड़ पर लालटेन' , 'घर का रास्ता' , 'हम जो देखते हैं' , 'आवाज़ भी एक जगह है' ।
पाब्लो नेरुदा , एर्नेस्टो कार्डिनल और हरमन हेस की रचनाओं के अनुवादक रहे।
उन्होंने प्रतिपक्ष जैसे पत्रों में पत्रकारिता की; पत्रकारिता और कविता दोनों में समान दक्षता।
कविताएँ पाखंड, धूर्तता और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध सशक्त रूप से बोलती हैं।
नागार्जुन को आदर्श मानते थे; संघर्षरत और विफल लोगों को अपनी रचनाओं में श्रद्धांजलि देते रहे।

आधुनिक हिंदी कविता के महत्वपूर्ण स्तंभ मंगलेश डबराल की रचनाएँ पाठक को उस संवेदनशील दुनिया में ले जाती हैं जो उसे अपनी ही लगती है — जहाँ पाखंड, धूर्तता और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध शब्द बिना शोर के, पर पूरी दृढ़ता से बोलते हैं। कवि, गद्यकार और वरिष्ठ पत्रकार के रूप में उन्होंने हिंदी साहित्य की उस परंपरा को समृद्ध किया, जिसमें कविता समाज की सच्चाई का आईना होती है।

जीवन और साहित्यिक यात्रा

मंगलेश डबराल का जन्म 16 मई 1948 को उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले के काफलपानी गाँव में हुआ था। पहाड़ की माटी से उठकर वे दिल्ली आए और प्रतिपक्ष जैसे महत्वपूर्ण पत्रों से जुड़े। उनका व्यक्तित्व सरल, सौम्य और विनम्र था, किंतु उनकी कलम में असाधारण धार थी।

उनकी कविताओं में देशज महक और इंसान के रागात्मक पक्षों का सुंदर चित्रण मिलता है। उन्होंने हिंदी कविता में नए अनुभव और संवेदनाएँ जोड़ीं, जो उन्हें अपनी पीढ़ी के कवियों में विशिष्ट बनाती हैं।

प्रमुख कृतियाँ और संपादन

उनके प्रकाशित कविता संकलनों में 'पहाड़ पर लालटेन', 'घर का रास्ता', 'हम जो देखते हैं' और 'आवाज़ भी एक जगह है' शामिल हैं। इसके अलावा उन्होंने राजस्थान के शिक्षक-कवियों की कविताओं के संकलन 'रेत घड़ी' का संपादन भी किया।

विश्व साहित्य से उनका गहरा जुड़ाव रहा। वे पाब्लो नेरुदा और एर्नेस्टो कार्डिनल जैसे वैश्विक कवियों के अनुवादक रहे। उन्होंने हरमन हेस के उपन्यास 'सिद्धार्थ' और बांग्ला लेखक नवारो भट्टाचार्य के संग्रह का सह-अनुवाद भी किया।

कविता और पत्रकारिता का संगम

एक इंटरव्यू में डबराल ने कहा था कि कविता लिखने के बाद रचनाकार के अनुभव की मृत्यु हो जाती है और रचना का जीवन शुरू होता है। उन्होंने रघुवीर सहाय के कथन 'कविता हुई नहीं कि मरी' को सही ठहराया।

पत्रकारिता और कविता के बीच के संबंध पर उन्होंने कहा था कि पत्रकारिता उन्हें शोर देती है और कविता उस शोर को संगीत में बदलने की कोशिश करती है। उनके अनुसार दोनों क्षेत्रों में संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण रहा, लेकिन पत्रकारिता ने उनकी कविता को गहराई प्रदान की।

वैचारिक प्रतिबद्धता और साहित्यिक विरासत

मंगलेश डबराल नागार्जुन को अपना आदर्श मानते थे। वे उन विफल और संघर्षरत लोगों को अपनी कविता में श्रद्धांजलि देते रहे जो रास्ते में गिर पड़े, पर कोशिश करते रहे। यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक है जब साहित्य में सामाजिक प्रतिबद्धता की आवाज़ें कमज़ोर पड़ती दिख रही हैं।

मितभाषी और अपनी मान्यताओं में दृढ़ रहे डबराल हिंदी साहित्य की उस गौरवशाली परंपरा के वाहक हैं, जिसमें कविता बिना नारेबाज़ी के समाज और मनुष्य की सच्चाई को उजागर करती है। उनकी रचनाएँ आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेंगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

बिना उग्रता के, पाखंड और अन्याय को कविता की भाषा में पकड़ा — यही उनकी असली ताक़त है। पत्रकारिता और कविता को एक साथ साधना आज की पीढ़ी के लेखकों के लिए एक सबक है। उनकी परंपरा यह याद दिलाती है कि शब्द की शक्ति शोर में नहीं, संवेदना की गहराई में होती है।
RashtraPress
30 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मंगलेश डबराल कौन थे?
मंगलेश डबराल आधुनिक हिंदी कविता के प्रमुख कवि, गद्यकार और वरिष्ठ पत्रकार थे। उनका जन्म 16 मई 1948 को उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले के काफलपानी गाँव में हुआ था और उन्होंने हिंदी साहित्य को नई संवेदनाएँ और अनुभव दिए।
मंगलेश डबराल के प्रमुख कविता संग्रह कौन से हैं?
उनके प्रमुख कविता संकलनों में 'पहाड़ पर लालटेन', 'घर का रास्ता', 'हम जो देखते हैं' और 'आवाज़ भी एक जगह है' शामिल हैं। उन्होंने राजस्थान के शिक्षक-कवियों के संकलन 'रेत घड़ी' का संपादन भी किया।
मंगलेश डबराल ने किन विदेशी लेखकों का अनुवाद किया?
उन्होंने विश्व साहित्य के प्रमुख कवियों पाब्लो नेरुदा और एर्नेस्टो कार्डिनल की रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया। इसके अलावा हरमन हेस के उपन्यास 'सिद्धार्थ' और बांग्ला लेखक नवारो भट्टाचार्य के संग्रह का सह-अनुवाद भी किया।
मंगलेश डबराल की कविताओं का मुख्य विषय क्या था?
उनकी कविताएँ पाखंड, धूर्तता और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध बोलती हैं। वे संघर्षरत और विफल लोगों को श्रद्धांजलि देते थे, और उनकी रचनाओं में देशज महक के साथ इंसान के रागात्मक पक्षों का सुंदर चित्रण मिलता है।
मंगलेश डबराल ने पत्रकारिता और कविता के संबंध पर क्या कहा था?
उन्होंने कहा था कि पत्रकारिता उन्हें शोर देती है और कविता उस शोर को संगीत में बदलने की कोशिश करती है। उनके अनुसार दोनों क्षेत्रों में संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण रहा, लेकिन पत्रकारिता ने उनकी कविता को गहराई प्रदान की।
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