सीजेआई सूर्यकांत का NHRC में बड़ा बयान: सरकार सुनिश्चित करे सुरक्षित और भरोसेमंद जल आपूर्ति
सारांश
मुख्य बातें
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने 12 अक्टूबर 2026 को स्पष्ट कहा कि सरकार की जिम्मेदारी केवल नल-कनेक्शन देने तक सीमित नहीं है — उसे ऐसी प्रणालियाँ बनानी और उनका रखरखाव करना होगा जिनसे लोगों तक सुरक्षित, शुद्ध और भरोसेमंद पानी पहुँच सके। नई दिल्ली के विज्ञान भवन में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के 33वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने पानी को एक बुनियादी मानवाधिकार बताया।
जल आपूर्ति पर सीजेआई का मूल संदेश
सीजेआई कांत ने कहा कि सिर्फ नल का होना पानी तक पहुँच के बराबर नहीं है। उन्होंने चेताया कि आर्सेनिक, फ्लोराइड या अन्य हानिकारक पदार्थों से दूषित पानी जीवन और स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा करता है। उनके अनुसार, गुणवत्ता और निरंतरता — दोनों राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी के अंग हैं।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पर्यावरण संबंधी फैसलों ने यह माना है कि जीवन के अधिकार में प्रदूषणमुक्त पानी और हवा का आनंद लेने का अधिकार भी शामिल है, जिससे स्वच्छ जल तक पहुँच सरकार की संवैधानिक जवाबदेही का एक अनिवार्य पहलू बन जाती है।
मानवाधिकार और जल: गहरा संबंध
सीजेआई कांत ने जल को एक पृथक अधिकार नहीं, बल्कि अन्य अधिकारों की पूर्व शर्त बताया। उनके अनुसार, पानी स्वास्थ्य को बनाए रखता है, शिक्षा को संभव बनाता है, गरिमा की रक्षा करता है और परिवारों के रहन-सहन की परिस्थितियों को आकार देता है।
उन्होंने कहा — 'जिस समुदाय के पास पानी तक भरोसेमंद पहुँच नहीं है, वह उस गरिमा का पूरा आनंद नहीं ले सकता जिसका वादा हमारा संविधान करता है।' उन्होंने विशेष रूप से उन महिलाओं का उल्लेख किया जो पानी लाने में घंटों खर्च करती हैं, और उन किसानों का जिनकी आजीविका सिंचाई पर निर्भर है।
प्रगति की सराहना, पर गुणवत्ता पर जोर
सीजेआई ने ग्रामीण भारत में नल-कनेक्शन विस्तार की प्रगति को सराहनीय बताया, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि अब ध्यान आपूर्ति की गुणवत्ता पर केंद्रित होना चाहिए। उन्होंने एक समन्वित संस्थागत प्रतिक्रिया की आवश्यकता पर बल दिया जो केवल बुनियादी ढाँचा खड़ा करने से आगे जाए।
गौरतलब है कि यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश के कई राज्यों में भूजल प्रदूषण और पाइपलाइन रखरखाव की कमी को लेकर विभिन्न उच्च न्यायालयों में याचिकाएँ विचाराधीन हैं।
नागरिक समाज और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भूमिका
सीजेआई कांत ने जमीनी हकीकत उजागर करने में नागरिक समाज संगठनों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के वैज्ञानिक ज्ञान और सहयोग के योगदान पर भी प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा — 'पानी हमें एक अहम बात सिखाता है, यह सीमाओं को पार करता है।' उनके अनुसार, जल अधिकार को केवल वर्तमान पीढ़ी का हक नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए।
आगे की राह
सीजेआई के इस संबोधन से स्पष्ट संकेत मिलता है कि न्यायपालिका जल-अधिकार की व्याख्या को और व्यापक बनाने की दिशा में सक्रिय है। जीवन के अधिकार की संवैधानिक समझ अब स्वास्थ्य, भोजन, आवास, आजीविका और स्वच्छ पर्यावरण को भी समाहित करती है। आने वाले समय में इस विमर्श का असर जल-नीति निर्माण और संबंधित मुकदमों पर देखा जा सकता है।