एनएचआरसी के 33वें स्थापना दिवस पर सीजेआई सूर्यकांत बोले — अधिकार कमज़ोरों तक पहुँचे, तभी सार्थक
सारांश
मुख्य बातें
भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने 12 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के 33वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि किसी भी मानवाधिकार संस्था की असल कसौटी उसके निपटाए गए मामलों की तादाद नहीं, बल्कि यह है कि वह उन लोगों की आवाज़ बन पाती है या नहीं जो सबसे कम अपनी बात रख सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि संवैधानिक गारंटियों को रोजमर्रा की हकीकत में बदलना ही एनएचआरसी जैसी संस्थाओं का मूल दायित्व है।
एनएचआरसी की 33 वर्षों की यात्रा
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने आयोग की स्थापना के बाद के सफर का उल्लेख करते हुए कहा कि एनएचआरसी एक नए विचार से आगे बढ़कर न्याय चाहने वालों के लिए एक भरोसेमंद संस्था बन चुकी है। उन्होंने बताया कि आयोग ने अपने 33 वर्षों में 24 लाख से अधिक मामले दर्ज किए और 23 लाख से ज़्यादा मामलों का निपटारा किया, जिसकी निपटारा दर 98 प्रतिशत से अधिक रही।
उन्होंने कहा, 'संस्थाओं को भी लोगों की तरह उनके जन्मदिन पर ही सबसे बेहतर समझा जा सकता है। हम पीछे मुड़कर देखते हैं कि उन्होंने कहाँ से शुरुआत की थी, हम आसपास देखते हैं कि वे अभी कहाँ खड़ी हैं और हम आगे देखते हैं कि जिन लोगों की वे सेवा करती हैं, उनके प्रति उनकी क्या जिम्मेदारियाँ हैं।' उन्होंने स्पष्ट किया कि ये आँकड़े सिर्फ संस्था के काम को नहीं, बल्कि उन असंख्य मामलों को भी दर्शाते हैं जिनमें गंभीर उल्लंघनों को सार्वजनिक रूप से सामने लाया गया।
हाशिए पर मौजूद वर्गों के लिए संस्थागत जवाबदेही
सीजेआई ने हिरासत में यातना और मौत, बंधुआ मज़दूरी, सिलिकोसिस जैसी औद्योगिक बीमारियों और हाशिए पर मौजूद समुदायों के अधिकारों से जुड़े मामलों में एनएचआरसी के हस्तक्षेप की सराहना की। उन्होंने कहा कि ऐसे काम संस्थागत दखल की अहमियत को रेखांकित करते हैं और सिस्टम की कमियों को उजागर करते हैं।
उन्होंने उन वर्गों की विशेष तौर पर चर्चा की जिन्हें संस्थागत ध्यान की सबसे अधिक ज़रूरत है — विचाराधीन कैदी जो अपने वकीलों से कभी नहीं मिले, बिना दस्तावेज़ों वाले प्रवासी मज़दूर, परिवारों द्वारा छोड़े गए बुज़ुर्ग, दिव्यांगजन और वे महिलाएँ जिनकी परेशानियाँ सुरक्षा देने वाले तंत्र की नज़र में नहीं आ पातीं। जस्टिस सूर्यकांत ने दो टूक कहा, 'जो अधिकार ताकतवर लोगों के काम तो आता है लेकिन कमजोर लोगों के लिए बेकार साबित होता है, उसे सही मायनों में अधिकार नहीं माना जा सकता — यह बेहतर ब्रांडिंग वाली एक सुविधा मात्र है।'
राज्य मानवाधिकार आयोगों की भूमिका
मुख्य न्यायाधीश ने भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में राज्य मानवाधिकार आयोगों की महत्ता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा, 'भारत में अधिकारों का अनुभव अक्सर राजधानी में नहीं, बल्कि किसी दूरदराज के गाँव, किसी खास इलाके या यहाँ तक कि घर के भीतर होता है।' उनके अनुसार, जहाँ राष्ट्रीय आयोग मानक तय कर सकता है और बड़े स्तर के पैटर्न पर ध्यान दिला सकता है, वहीं राज्य आयोग स्थानीय भाषाओं में शिकायतें सुनने, प्रभावित इलाकों तक पहुँचने और उल्लंघन की परिस्थितियों को समझने के लिए कहीं बेहतर स्थिति में होते हैं।
अदालतों और आयोगों की पूरक भूमिका
सीजेआई सूर्यकांत ने मानवाधिकारों की सुरक्षा में अदालतों और मानवाधिकार आयोगों की परस्पर पूरक भूमिकाओं को भी स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि जब संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो, तो अदालतों को दखल देना चाहिए, जबकि मानवाधिकार आयोगों की जिम्मेदारी है कि वे शिकायतों की जाँच करें, सिस्टम की खामियाँ उजागर करें और यह सुनिश्चित करें कि उपेक्षित चिंताओं पर संस्थागत स्तर पर ध्यान दिया जाए। मानवाधिकारों की सुरक्षा का दायरा उल्लंघनों की पहचान तक सीमित नहीं होना चाहिए — इसमें जवाबदेही तय करना, प्रभावितों को सार्थक राहत देना और दोबारा घटना न हो इसके लिए बदलाव लाना भी शामिल होना चाहिए।
जल अधिकार पर राष्ट्रीय सम्मेलन
इस वर्ष एनएचआरसी ने 'पानी जीवन का अमृत: पानी के अधिकार के ज़रिए मानवीय गरिमा को बढ़ावा देना' विषय पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन के साथ अपना स्थापना दिवस मनाया। सम्मेलन में जल निकायों के संरक्षण और बहाली, तथा सभी के लिए पेयजल की सुरक्षित और टिकाऊ पहुँच सुनिश्चित करने पर विचार-विमर्श हुआ।
इस थीम की सराहना करते हुए सीजेआई ने कहा, 'मानवाधिकार केवल अमूर्त सिद्धांत नहीं हैं, बल्कि ये लोगों के रोजमर्रा के जीवन से गहराई से जुड़े हैं। वे उतने ही ठोस हैं जितना किसी बच्चे के हाथ में साफ पानी का गिलास और उतने ही ज़रूरी हैं जितनी उस बच्चे को लगने वाली प्यास।'
समारोह में एनएचआरसी के अध्यक्ष जस्टिस वी. रामासुब्रमण्यन, सदस्य जस्टिस (डॉ.) विद्युत रंजन सारंगी, विजया भारती सयानी, प्रियंक कानूनगो, महासचिव पीयूष गोयल, वरिष्ठ अधिकारी और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। आयोग का यह 33वाँ स्थापना दिवस मानवाधिकारों की व्यापक प्रासंगिकता और संस्थागत जवाबदेही की बढ़ती माँग को रेखांकित करता है।