उपभोक्ता आयोगों में बढ़ते बैकलॉग पर सीजेआई सूर्यकांत सख्त, NCDRC से दो सप्ताह में मांगी रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने देशभर के उपभोक्ता आयोगों में वर्षों से लंबित मामलों की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है और स्पष्ट किया है कि इस तरह का अनंत विलंब उन मंचों की स्थापना के मूल उद्देश्य को ही निरर्थक बना देता है, जिन्हें आम उपभोक्ता को त्वरित और किफायती न्याय दिलाने के लिए बनाया गया था। 13 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में उपभोक्ता विवाद निवारण निकायों की कार्यप्रणाली से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) के अध्यक्ष से दो सप्ताह के भीतर एक व्यापक रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया।
मामले का संज्ञान और सुनवाई
पीठ ने एक मीडिया रिपोर्ट का स्वतः संज्ञान लिया, जिसमें यह उजागर किया गया था कि 2019 से लंबित एक उपभोक्ता मामले को 2022 में केवल एक बार सूचीबद्ध किया गया और उसके बाद से उसकी कोई सुनवाई नहीं हुई। इस एकल उदाहरण ने व्यापक प्रणालीगत समस्या को उजागर कर दिया।
सीजेआई सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान तीखे सवाल उठाए: 'क्या उपभोक्ता आयोग इसी तरह काम करते हैं? ऐसे विशेष आयोग बनाने का क्या मतलब है?' उन्होंने यह भी कहा, 'हम लगातार बुनियादी ढाँचे और सुविधाओं की बात करते हैं, लेकिन ये संस्थाएँ इस तरह काम कर रही हैं?'
NCDRC से माँगी गई रिपोर्ट में क्या शामिल होगा
सर्वोच्च न्यायालय ने NCDRC के अध्यक्ष को निर्देश दिया है कि रिपोर्ट में निम्नलिखित बिंदुओं पर विस्तृत जानकारी दी जाए:
देशभर के उपभोक्ता मंचों में कुल लंबित मामलों की संख्या और उनका वर्षवार ब्योरा; मौजूदा रिक्त पदों की स्थिति; प्रत्येक पीठ की मामलों के निपटारे की दर; और बढ़ते बोझ को देखते हुए आयोगों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता। इसके अतिरिक्त, राज्य उपभोक्ता आयोगों और राज्य उपभोक्ता मामले विभागों से भी लंबित मामलों का विस्तृत आँकड़ा माँगा गया है।
आम उपभोक्ता पर असर
उपभोक्ता आयोगों की स्थापना का उद्देश्य यह था कि नागरिकों को सामान्य सिविल अदालतों की जटिल और महँगी प्रक्रिया से गुज़रे बिना उत्पाद दोष, सेवा में कमी और व्यापारिक धोखाधड़ी जैसे मामलों में शीघ्र राहत मिल सके। गौरतलब है कि यदि ये मंच भी वर्षों तक मामले लटकाए रखते हैं, तो उपभोक्ता के पास न्याय का कोई त्वरित विकल्प नहीं बचता।
यह ऐसे समय में आया है जब भारत में उपभोक्ता शिकायतों की संख्या ई-कॉमर्स और डिजिटल सेवाओं के विस्तार के साथ तेज़ी से बढ़ रही है, जिससे आयोगों पर दबाव और अधिक हो गया है।
सरकार से प्राथमिकता की अपेक्षा
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बढ़ते बैकलॉग से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को उपभोक्ता आयोगों में रिक्त पदों को भरने और इन संस्थाओं की समग्र क्षमता को मज़बूत करने को प्राथमिकता देनी होगी। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद वह व्यवस्था में मौजूद बाधाओं की पहचान कर सुधारात्मक दिशा-निर्देश जारी कर सकता है।
रिपोर्ट दाखिल होने के बाद मामले की अगली सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की दिशा स्पष्ट होगी — और यह तय होगा कि देश की उपभोक्ता न्याय प्रणाली को पुनर्जीवित करने के लिए किस स्तर के हस्तक्षेप की ज़रूरत है।