सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: 3 महीने में निर्णय न सुनाने पर केस मुख्य न्यायाधीश के पास जाएगा
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 29 मई 2025 को देशभर की अदालतों में फैसले सुरक्षित रखने के बाद उन्हें समय पर न सुनाने की गंभीर समस्या पर कड़े दिशानिर्देश जारी किए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई निर्णय रिजर्व होने के तीन महीने के भीतर नहीं सुनाया गया, तो संबंधित हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को वह मामला तत्काल मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करना होगा। यह निर्देश न्याय वितरण व्यवस्था में जनता के विश्वास को बहाल करने की दिशा में एक निर्णायक हस्तक्षेप है।
मुख्य दिशानिर्देश
सर्वोच्च न्यायालय ने तय किया कि मुख्य न्यायाधीश अधिकतम दो सप्ताह का अतिरिक्त समय दे सकते हैं। यदि इस विस्तारित समयसीमा में भी फैसला नहीं सुनाया जाता, तो केस दूसरी पीठ को स्थानांतरित कर दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त, ऑपरेटिव पार्ट (मुख्य आदेश) की घोषणा के 15 दिनों के भीतर कारण सहित पूर्ण निर्णय ऑनलाइन अपलोड करना अनिवार्य कर दिया गया है।
यदि 15 दिनों में कारण अपलोड नहीं होते, तो पक्षकार आवेदन दाखिल कर सकते हैं। 30 दिनों तक अपलोड न होने की स्थिति में पक्षकार केस वापस लेने या दूसरी पीठ में सुनवाई के लिए आवेदन दे सकेंगे। इसके साथ ही बहस पूरी होने के बाद जजमेंट रिजर्व की तारीख संबंधित हाईकोर्ट की वेबसाइट पर सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित की जाएगी।
जमानत मामलों में विशेष प्रावधान
सर्वोच्च न्यायालय ने जमानत के मामलों को लेकर विशेष रूप से कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने कहा कि जमानत मामलों में ऑर्डर रिजर्व होने के अगले ही दिन फैसला सुनाया जाना चाहिए। जमानत आदेश तत्काल जेल अधिकारियों को सूचित किए जाएंगे और अंडरट्रायल कैदी को उसी दिन या अधिकतम अगले दिन रिहा किया जाएगा। ट्रायल कोर्ट को इसकी अनुपालन रिपोर्ट हाईकोर्ट को भेजनी होगी।
यह प्रावधान उन अंडरट्रायल कैदियों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जो जमानत मिलने के बावजूद प्रशासनिक देरी के कारण जेल में बंद रहते हैं — एक ऐसी विडंबना जिसे कोर्ट ने संवैधानिक स्वतंत्रता के उल्लंघन के रूप में देखा है।
झारखंड हाईकोर्ट मामले से उठी चिंगारी
यह ऐतिहासिक निर्देश झारखंड हाईकोर्ट में लंबित एक याचिका की पृष्ठभूमि में आया। याचिकाकर्ताओं ने शिकायत की थी कि उनकी आपराधिक अपीलों पर अंतिम बहस के बाद दो से तीन वर्षों तक फैसला सुरक्षित रखा गया, किंतु सुनाया नहीं गया। न्यायमूर्ति सूर्यकांत की पीठ ने इस शिकायत को गंभीरता से लेते हुए मामले का दायरा बढ़ाया और सभी हाईकोर्ट से रिपोर्ट मांगी कि कितने मामलों में महीनों या वर्षों से फैसले सुरक्षित पड़े हैं।
गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक विलंब पर चिंता व्यक्त की हो। देश में लगभग 5 करोड़ से अधिक मामले विभिन्न अदालतों में लंबित हैं, और रिजर्व्ड जजमेंट की समस्या इस संकट का एक अनदेखा पहलू रही है।
न्याय व्यवस्था पर व्यापक असर
सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुद्दे को न्याय वितरण व्यवस्था की विश्वसनीयता से सीधे जोड़ा। कोर्ट ने कहा कि देरी से न्याय मिलने में बाधा आती है और जनता का न्यायपालिका पर भरोसा कमज़ोर होता है। सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को इन दिशानिर्देशों को अपने-अपने मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने का निर्देश दिया गया है।
आगे क्या होगा
सभी हाईकोर्ट को इन दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने को कहा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन निर्देशों का प्रभावी क्रियान्वयन हुआ, तो लंबे समय से लंबित मामलों के निपटारे में उल्लेखनीय तेज़ी आ सकती है। अगला परीक्षण यह होगा कि हाईकोर्ट इन निर्देशों की अनुपालन रिपोर्ट कितनी शीघ्रता और पारदर्शिता से प्रस्तुत करते हैं।