सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सोमवार-शुक्रवार केवल वर्चुअल सुनवाई, जजों में कारपूलिंग का संकल्प
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 15 मई 2025 को एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय लेते हुए यह तय किया कि सोमवार और शुक्रवार को अदालत की समस्त सुनवाई केवल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से होगी। यह फैसला पश्चिम एशिया संकट के कारण उत्पन्न आर्थिक दबाव के मद्देनजर ईंधन संरक्षण की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय अपील के अनुरूप लिया गया है। शेष तीन कार्य दिवसों पर हाइब्रिड सुनवाई — यानी व्यक्तिगत और वर्चुअल दोनों माध्यमों से — जारी रहेगी।
मुख्य घटनाक्रम
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मौजूदा राष्ट्रीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह निर्देश जारी किए। सर्वोच्च न्यायालय के सेक्रेटरी जनरल भरत पाराशर द्वारा जारी आधिकारिक सर्कुलर में स्पष्ट किया गया है कि 'मिसलेनियस डेज' — अर्थात सोमवार और शुक्रवार — तथा आंशिक कार्य दिवसों पर सूचीबद्ध सभी मामलों की सुनवाई अब केवल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिये होगी।
रजिस्ट्री को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है कि वीडियो लिंक समय पर भेजे जाएँ और तकनीकी व्यवस्था निर्बाध बनी रहे, ताकि न्यायालय के कामकाज में किसी प्रकार की बाधा न आए।
जजों का कारपूलिंग संकल्प
ईंधन की खपत को कम करने की दिशा में एक और सार्थक कदम उठाते हुए, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने सर्वसम्मति से आपस में कारपूलिंग की व्यवस्था अपनाने का संकल्प लिया है। यह कदम न्यायपालिका की ओर से ऊर्जा संरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक माना जा रहा है।
कर्मचारियों के लिए घर से काम की व्यवस्था
न्यायालय ने प्रत्येक रजिस्ट्री शाखा या अनुभाग में अधिकतम 50 प्रतिशत कर्मचारियों को सप्ताह में दो दिन तक घर से काम करने की अनुमति दी है। इसके लिए अनिवार्य शर्त यह है कि साप्ताहिक रोस्टर पहले से तैयार किया जाए और न्यायालय का सामान्य कामकाज बाधित न हो।
संबंधित रजिस्ट्रार यह सुनिश्चित करेंगे कि सप्ताह आरंभ होने से पूर्व कार्यसूची तैयार हो। घर से काम करने वाले कर्मचारियों को टेलीफोन पर उपलब्ध रहना होगा और आवश्यकता पड़ने पर किसी भी समय कार्यालय आने के लिए तत्पर रहना होगा।
कब लागू होगी व्यवस्था और क्या होंगे अपवाद
यदि किसी शाखा की कार्य-प्रकृति को देखते हुए संबंधित रजिस्ट्रार की राय हो कि घर से काम करना प्रभावी नहीं है, तो वे उस शाखा के लिए इस व्यवस्था को प्रतिबंधित या संशोधित कर सकते हैं। यह लचीलापन यह सुनिश्चित करता है कि न्यायालय की प्रशासनिक दक्षता से कोई समझौता न हो।
क्या होगा आगे
गौरतलब है कि यह व्यवस्था उस दौर में लागू हो रही है जब पश्चिम एशिया संकट के चलते ईंधन की कीमतों पर दबाव बना हुआ है और केंद्र सरकार ने सभी संस्थानों से ऊर्जा बचत के उपाय अपनाने का आग्रह किया है। सर्वोच्च न्यायालय का यह कदम अन्य उच्च न्यायालयों और सरकारी संस्थाओं के लिए एक नज़ीर बन सकता है।