वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट: अदालतों को बाध्य करना संभव नहीं, हाईकोर्ट को तय करना होगा
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 21 मई 2025 को स्पष्ट किया कि दिल्ली की सभी अदालतों में केवल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए सुनवाई अनिवार्य करने का निर्देश देना उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है, क्योंकि जिला अदालतों का प्रशासनिक नियंत्रण संबंधित हाईकोर्ट के पास होता है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह टिप्पणी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें दिल्ली की समस्त अदालतों में कम से कम तीन महीने तक अनिवार्य ऑनलाइन सुनवाई लागू करने की माँग की गई थी।
याचिका में क्या माँगा गया
याचिकाकर्ता के वकील ने सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष इस मामले को रखते हुए शीघ्र सुनवाई का अनुरोध किया। उनकी मुख्य माँग थी कि दिल्ली की सभी अदालतों में — जिला स्तर से लेकर उच्च न्यायालय तक — सभी प्रकार के मामलों की सुनवाई अनिवार्य रूप से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से की जाए। वकील ने न्यूनतम तीन महीने की अवधि के लिए यह व्यवस्था लागू करने का निर्देश देने की प्रार्थना की।
सीजेआई का स्पष्ट रुख
मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता के वकील को बताया कि वे पहले ही देश के सभी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई बढ़ाने का आग्रह कर चुके हैं और अधिकांश उच्च न्यायालय इस व्यवस्था का उपयोग पहले से ही कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह एक ऐसी सुविधा है जिसे न्यायाधीशों और वकीलों की स्वेच्छा और सहमति से लागू किया जाना उचित है — किसी भी अदालत को इसे अनिवार्य रूप से अपनाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि जिला अदालतों पर प्रशासनिक नियंत्रण का अधिकार संबंधित हाईकोर्ट को है, इसलिए इस विषय में निर्णय लेने का अधिकार भी उन्हीं के पास है। सर्वोच्च न्यायालय ने हाईकोर्ट से जिला अदालतों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग को प्रोत्साहित करने का आग्रह पहले ही किया हुआ है।
याचिका की पृष्ठभूमि
यह याचिका कोविड-19 महामारी के दौरान शुरू हुई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग व्यवस्था को स्थायी रूप देने और अदालतों में भीड़ कम करने की माँग से जुड़ी मानी जा रही है। महामारी के दौरान अपनाई गई इस प्रणाली से वकीलों, मुवक्किलों और न्यायाधीशों के समय और संसाधनों की उल्लेखनीय बचत हुई थी। विशेष रूप से दूरदराज के क्षेत्रों से आने वाले पक्षकारों के लिए यह व्यवस्था अत्यंत उपयोगी साबित हुई। दिल्ली हाईकोर्ट और जिला अदालतों में कुछ मामलों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग पहले से ही उपयोग में है, परंतु याचिकाकर्ता इसे सभी प्रकार के मामलों के लिए अनिवार्य बनाने की माँग कर रहे हैं।
प्रौद्योगिकी और न्यायिक सुधार
मुख्य न्यायाधीश ने संकेत दिया कि अदालती कार्यवाही को अधिक पारदर्शी और सुलभ बनाने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग बढ़ाना ज़रूरी है, किंतु इसे जबरदस्ती थोपने के बजाय स्वैच्छिक आधार पर अपनाना अधिक प्रभावी होगा। यह ऐसे समय में आया है जब न्यायपालिका में लंबित मामलों की संख्या करोड़ों में है और डिजिटल सुनवाई को इस बोझ को कम करने के एक संभावित समाधान के रूप में देखा जा रहा है।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय ने इस याचिका पर आगे की सुनवाई के लिए अभी कोई तारीख निर्धारित नहीं की है। न्यायालय का रुख यह संकेत देता है कि वह इस मुद्दे पर कोई बाध्यकारी आदेश जारी करने के बजाय संवाद और सहमति के रास्ते को प्राथमिकता देगा।