राजस्थान हाईकोर्ट ने जोधपुर ओपन जेल में उम्रकैद काट रहे दो कैदियों की शादी को दी हरी झंडी
सारांश
मुख्य बातें
राजस्थान हाईकोर्ट ने 16 जुलाई 2026 को एक ऐतिहासिक फैसले में जोधपुर स्थित मंडोर ओपन एयर कैंप में उम्रकैद की सजा काट रहे दो कैदियों को आपसी सहमति से विवाह करने की अनुमति प्रदान की। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार जेल की सलाखों के पीछे भी बाधित नहीं होता।
मामले की पृष्ठभूमि
नागौर निवासी मूलाराम, जो 16 फरवरी 2017 से हत्या के एक मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे हैं, ने शादी के लिए अपनी सजा को अस्थायी रूप से निलंबित करने की याचिका दायर की थी। वे फिलहाल मंडोर ओपन एयर कैंप परिसर में रह रहे हैं। जिस महिला कैदी से वे विवाह करना चाहते हैं, वह हैं सीमा गाडसे गुलाब, जो अपने पति की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रही हैं और इस समय 40 दिन की पैरोल पर बाहर हैं।
अदालत का तर्क और संवैधानिक आधार
जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस प्रवीर भटनागर की खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि दो बालिग व्यक्तियों को महज इसलिए विवाह के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि वे कारागार में हैं। पीठ ने माना कि ऐसी अनुमति देने से कैदियों के सुधार और उनके समाज में पुनर्एकीकरण के उद्देश्य को बल मिलता है। याचिकाकर्ता के वकील कालूराम भाटी के अनुसार, याचिका में राजस्थान हाईकोर्ट के एक पूर्व निर्णय का हवाला दिया गया जिसमें कैदियों के विवाह और संतान उत्पत्ति के अधिकार को अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित मौलिक अधिकार माना गया था।
राज्य सरकार का रुख
राज्य सरकार ने अपनी रिपोर्ट में पुष्टि की कि दोनों कैदी विवाह के इच्छुक हैं और यह भी स्वीकार किया कि वे लिव-इन रिलेशनशिप में रहे हैं। सरकारी अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि राज्य को ओपन एयर कैंप परिसर में विवाह संपन्न कराने पर कोई आपत्ति नहीं है, बशर्ते यह जेल के नियमों के अनुरूप हो।
अदालत के निर्देश
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि विवाह समारोह में दोनों पक्षों के अधिकतम 21 परिवार के सदस्य और विवाह संपन्न कराने वाले पंडित को मंडोर ओपन एयर कैंप में प्रवेश की अनुमति होगी। यदि अतिरिक्त सदस्यों को शामिल करने का अनुरोध किया जाता है, तो उस पर निर्णय जेल प्रशासन करेगा। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि विवाह की तिथि की सूचना काफी पहले जेल प्रशासन को दी जाए। समारोह का समस्त व्यय मूलाराम स्वयं वहन करेंगे।
व्यापक संदर्भ और महत्व
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देशभर में कैदियों के मौलिक अधिकारों पर बहस तेज हो रही है। गौरतलब है कि भारतीय न्यायालयों ने पिछले कुछ वर्षों में कैदियों के प्रजनन अधिकारों और वैवाहिक अधिकारों से जुड़े कई महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं, जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि कारावास केवल शारीरिक स्वतंत्रता का हरण करता है, नागरिक अधिकारों का नहीं। यह निर्णय भविष्य में इसी तरह की याचिकाओं के लिए एक मिसाल बन सकता है।