धनबाद जज उत्तम आनंद हत्याकांड: झारखंड हाईकोर्ट ने राहुल व लखन वर्मा की उम्रकैद बरकरार रखी
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड हाईकोर्ट ने 14 जुलाई 2026 को धनबाद के चर्चित जज उत्तम आनंद हत्याकांड में दोषी ठहराए गए राहुल वर्मा और लखन वर्मा की उम्रकैद की सजा को यथावत बनाए रखा। न्यायमूर्ति रंगन मुखोपाध्याय की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने दोनों दोषियों की आपराधिक अपीलें खारिज करते हुए धनबाद सीबीआई अदालत के फैसले में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
मुख्य घटनाक्रम
मंगलवार को सुनाए गए इस फैसले में अदालत ने इस घटना को न्यायपालिका पर सीधा हमला करार दिया। दोनों दोषियों ने निचली अदालत की सजा को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी। सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने मामले का निचली अदालत का पूरा रिकॉर्ड (एलसीआर) मंगाया और पक्षकारों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद अपील खारिज कर दी। दोषियों की ओर से अधिवक्ता सब्यसाची ने पैरवी की।
हत्याकांड की पृष्ठभूमि
28 जुलाई 2021 की सुबह धनबाद में मॉर्निंग वॉक के दौरान अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश उत्तम आनंद को एक ऑटो ने टक्कर मार दी थी। गंभीर रूप से घायल होने के बाद उनकी मौत हो गई। यह घटना सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई, जिसके बाद मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया और जाँच केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) को सौंपी गई।
गौरतलब है कि सीसीटीवी फुटेज में ऑटो का न्यायाधीश को जानबूझकर टक्कर मारना स्पष्ट रूप से दिखाई दिया था, जिसने इस मामले को दुर्घटना से हत्या की श्रेणी में ला दिया और पूरे देश में न्यायिक सुरक्षा पर बहस छेड़ दी।
सीबीआई अदालत का मूल फैसला
सीबीआई की विशेष अदालत ने 28 जुलाई 2022 को ऑटो चालक लखन वर्मा और उसके साथी राहुल वर्मा को हत्या का दोषी ठहराया था। इसके बाद 6 अगस्त 2022 को दोनों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई और प्रत्येक पर ₹25,000 का जुर्माना भी लगाया गया। दोनों के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या), धारा 201 (साक्ष्य मिटाने का प्रयास) और धारा 34 (समान आशय) के तहत आरोप तय किए गए थे। विशेष अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि दोनों दोषी जीवन के अंतिम समय तक कारावास में रहेंगे।
न्यायपालिका की सुरक्षा पर असर
यह मामला देश में न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा के संदर्भ में सबसे अधिक चर्चित रहा है। यह ऐसे समय में आया था जब न्यायाधीशों की सुरक्षा को लेकर पहले से ही चिंताएँ व्यक्त की जा रही थीं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया था और जाँच की निगरानी की थी।
आगे की स्थिति
हाईकोर्ट के इस ताज़ा फैसले के बाद दोनों दोषियों की उम्रकैद की सजा अब पूरी तरह से पुष्ट हो गई है। यदि दोषी इस फैसले को चुनौती देना चाहते हैं, तो उनके पास सर्वोच्च न्यायालय में अपील का विकल्प शेष रहेगा। यह फैसला न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।