8 अक्टूबर 2026
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झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: कोयलाकर्मियों के ₹1,300 करोड़ PF निवेश में ₹727 करोड़ डूबे, CBI जांच शुरू होगी

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झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: कोयलाकर्मियों के ₹1,300 करोड़ PF निवेश में ₹727 करोड़ डूबे, CBI जांच शुरू होगी

सारांश

कोयलाकर्मियों के PF की ₹1,300 करोड़ रकम DHFL में लगाई गई, कंपनी दिवालिया हुई और ₹727.67 करोड़ डूब गए। SBI-UTI की समय पर दी गई चेतावनी अनसुनी रही। अब झारखंड हाईकोर्ट ने CBI जांच का आदेश दे दिया है — यह लाखों कोयला कर्मचारियों की जीवनभर की बचत से जुड़ा सवाल है।

मुख्य बातें

झारखंड हाईकोर्ट ने 8 अक्टूबर 2026 को CMPFO के DHFL निवेश घोटाले की CBI जांच का आदेश दिया।
CMPFO ने DHFL में ₹1,300 करोड़ का निवेश किया था, जिसमें से ₹727.67 करोड़ कंपनी के दिवालिया होने के बाद डूब गए।
SBI और UTI ने 24 जून 2019 को ही DHFL की खराब आर्थिक स्थिति की चेतावनी दी थी, लेकिन समय पर कार्रवाई नहीं हुई।
CMPFO की बैठक चेतावनी के 6 महीने बाद 20 दिसंबर 2019 को हुई — तब तक नुकसान हो चुका था।
तत्कालीन कोयला सचिव अनिमेष भारती के खिलाफ विभागीय कार्रवाई हुई; कोल इंडिया ने नुकसान भरपाई हेतु प्रति टन ₹10 उपकर का प्रस्ताव भी रखा था।
कोल एम्पलाई वेलफेयर एसोसिएशन की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक की खंडपीठ ने यह आदेश पारित किया।

झारखंड हाईकोर्ट ने 8 अक्टूबर 2026 को कोयला खदान कर्मचारियों के भविष्य निधि (PF) से जुड़े एक बड़े वित्तीय घोटाले की सीबीआई जांच का आदेश दिया है। मामला कोल माइन्स प्रॉविडेंट फंड ऑर्गनाइजेशन (CMPFO) द्वारा दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉरपोरेशन लिमिटेड (DHFL) में किए गए ₹1,300 करोड़ के निवेश से संबंधित है, जिसमें से ₹727.67 करोड़ कंपनी के दिवालिया होने के बाद डूब गए। रांची स्थित हाईकोर्ट का यह आदेश कोयलाकर्मियों के हितों की रक्षा के लिए दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद आया है।

मुख्य घटनाक्रम

मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कोल एम्पलाई वेलफेयर एसोसिएशन की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने सीबीआई जांच का आदेश देते हुए याचिका का निष्पादन कर दिया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अनिल कुमार सिंह ने पक्ष रखा।

CMPFO ने DHFL में कुल ₹1,300 करोड़ का निवेश किया था। बाद में DHFL दिवालिया हो गई, जिसके परिणामस्वरूप निवेश की राशि में से ₹727.67 करोड़ डूब गए। यह रकम वास्तव में कोयला खदानों में काम करने वाले लाखों कर्मचारियों की मेहनत की कमाई थी।

चेतावनी के बावजूद नहीं हुई कार्रवाई

याचिका के अनुसार, भारतीय स्टेट बैंक (SBI) और UTI — जो CMPFO के फंड मैनेजर थे — ने 24 जून 2019 को ही DHFL की डगमगाती आर्थिक स्थिति के बारे में स्पष्ट चेतावनी दी थी और निवेश की राशि तत्काल निकालने की सलाह दी थी।

गौरतलब है कि इस चेतावनी के बावजूद CMPFO की बैठक करीब छह महीने बाद, 20 दिसंबर 2019 को हुई — तब तक निवेश को भारी नुकसान हो चुका था। बैठक में DHFL से राशि निकालने का प्रस्ताव ज़रूर पारित हुआ, लेकिन नुकसान की स्थिति पहले ही सामने आ चुकी थी।

बट्टे खाते और उपकर का प्रस्ताव

करीब दो साल बाद 22 नवंबर 2021 को CMPFO के बोर्ड की निवेश संबंधी उपसमिति की बैठक में ₹727.67 करोड़ को बट्टे खाते में डालने का प्रस्ताव रखा गया, जिसका कर्मचारियों ने कड़ा विरोध किया। इसके अलावा नुकसान की भरपाई के लिए कोल इंडिया के निदेशक मंडल ने कोयला उत्पादन पर प्रति टन ₹10 उपकर लगाने का प्रस्ताव भी रखा था। यह ऐसे समय में आया जब कर्मचारी पहले से ही अपनी भविष्य निधि की सुरक्षा को लेकर चिंतित थे।

विभागीय कार्रवाई और हलफनामे का विवाद

इस मामले में तत्कालीन कोयला सचिव अनिमेष भारती के खिलाफ विभागीय कार्रवाई भी की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया कि विभागीय जांच की रिपोर्ट आने से पहले ही CMPFO ने झारखंड हाईकोर्ट में एक हलफनामा दाखिल किया, जिसमें संस्था के अधिकारियों को मामले में दोषमुक्त बताया गया था। अदालत ने इस पहल को गंभीरता से लिया।

अब CBI क्या जांचेगी

हाईकोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई अब इन तीन प्रमुख बिंदुओं की जांच करेगी: DHFL में इतनी बड़ी राशि के निवेश के फैसले में किन प्रक्रियाओं का पालन किया गया; SBI और UTI की चेतावनी मिलने के बावजूद राशि निकालने में इतनी देरी क्यों हुई; और ₹727.67 करोड़ के नुकसान के लिए जिम्मेदारी किसकी है। याचिकाकर्ता ने यह भी मांग की है कि डूबी हुई रकम की भरपाई सुनिश्चित की जाए। यह मामला अब देश भर के कोयला कर्मचारियों की नज़र में है और सीबीआई की जांच रिपोर्ट से तस्वीर और स्पष्ट होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो CMPFO के उन अधिकारियों ने क्यों इंतजार किया जो इन कर्मचारियों के PF के प्रति जवाबदेह थे? इससे भी गंभीर बात यह है कि विभागीय जांच पूरी होने से पहले अधिकारियों को हाईकोर्ट में 'दोषमुक्त' बताने वाला हलफनामा दाखिल किया गया — यह जवाबदेही की प्रक्रिया पर सीधा प्रश्नचिह्न है। CBI जांच अब जरूरी है, लेकिन असली परीक्षा यह होगी कि क्या जांच के नतीजे डूबी हुई रकम की वास्तविक वसूली तक पहुँचते हैं — या यह भी सिर्फ रिपोर्टों की फाइल बन कर रह जाएगा।
RashtraPress
8 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

CMPFO-DHFL निवेश विवाद क्या है?
कोल माइन्स प्रॉविडेंट फंड ऑर्गनाइजेशन (CMPFO) ने कोयला कर्मचारियों के PF की ₹1,300 करोड़ रकम दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉरपोरेशन लिमिटेड (DHFL) में निवेश की थी। DHFL के दिवालिया होने के बाद इसमें से ₹727.67 करोड़ डूब गए, जिससे लाखों कोयला कर्मचारियों की भविष्य निधि को सीधा नुकसान हुआ।
झारखंड हाईकोर्ट ने CBI जांच का आदेश क्यों दिया?
कोल एम्पलाई वेलफेयर एसोसिएशन ने जनहित याचिका दायर कर आरोप लगाया कि SBI और UTI की जून 2019 की चेतावनी के बावजूद CMPFO ने समय पर निवेश नहीं निकाला और इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को बचाने की कोशिश की। मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता देखते हुए 8 अक्टूबर 2026 को CBI जांच का आदेश दिया।
SBI और UTI ने चेतावनी कब दी थी और क्या हुआ?
SBI और UTI ने 24 जून 2019 को DHFL की खराब वित्तीय स्थिति की चेतावनी देते हुए निवेश तुरंत निकालने की सलाह दी थी। इसके बावजूद CMPFO की बैठक करीब छह महीने बाद 20 दिसंबर 2019 को हुई, जब तक नुकसान हो चुका था और DHFL दिवालिया हो चुकी थी।
इस मामले में तत्कालीन कोयला सचिव की क्या भूमिका बताई गई है?
याचिका के अनुसार तत्कालीन कोयला सचिव अनिमेष भारती के खिलाफ विभागीय कार्रवाई हुई थी। आरोप है कि विभागीय जांच रिपोर्ट आने से पहले ही CMPFO ने हाईकोर्ट में हलफनामा दाखिल कर अपने अधिकारियों को दोषमुक्त घोषित कर दिया, जिसे अदालत ने गंभीरता से लिया।
डूबी हुई रकम की भरपाई कैसे होगी?
याचिकाकर्ता ने ₹727.67 करोड़ की वसूली की माँग की है। नुकसान भरपाई के लिए कोल इंडिया के निदेशक मंडल ने कोयला उत्पादन पर प्रति टन ₹10 उपकर लगाने का प्रस्ताव भी रखा था, जिसका कर्मचारियों ने विरोध किया। CBI जांच के बाद रकम वसूली की दिशा स्पष्ट होगी।
राष्ट्र प्रेस
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