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दही, प्रोबायोटिक्स और प्रीबायोटिक्स से कोलोरेक्टल कैंसर का खतरा 50% तक कम: नई स्टडी

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दही, प्रोबायोटिक्स और प्रीबायोटिक्स से कोलोरेक्टल कैंसर का खतरा 50% तक कम: नई स्टडी

सारांश

एक नए अध्ययन के अनुसार दही, प्रोबायोटिक्स और प्रीबायोटिक्स का नियमित सेवन करने वालों में कोलोरेक्टल कैंसर का खतरा लगभग 50% कम पाया गया। NHANES के 9,405 प्रतिभागियों पर आधारित यह शोध आंतों के माइक्रोबायोम और कैंसर-निरोधक संभावनाओं के बीच एक अहम कड़ी की ओर इशारा करता है।

मुख्य बातें

चंग शान मेडिकल यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के सहयोग से किए गए नए शोध में दही, प्रोबायोटिक्स और प्रीबायोटिक्स को कोलोरेक्टल कैंसर के कम जोखिम से जोड़ा गया।
इन खाद्य पदार्थों का सेवन करने वाले प्रतिभागियों में कोलोरेक्टल कैंसर की संभावना लगभग 50% कम देखी गई।
अध्ययन में NHANES के 2001–2020 के आँकड़ों का उपयोग हुआ; 9,405 प्रतिभागी शामिल थे जो अमेरिका की 3.7 करोड़ वयस्क आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं।
शोध 50 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों पर केंद्रित था।
शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह सहसंबंध है, कार्य-कारण का प्रमाण नहीं; दीर्घकालिक अध्ययन अभी आवश्यक हैं।

आंत और मलाशय के कैंसर यानी कोलोरेक्टल कैंसर के खतरे को कम करने में दही, प्रोबायोटिक्स और प्रीबायोटिक्स का नियमित सेवन सहायक हो सकता है — यह बात एक नए शोध में सामने आई है। चंग शान मेडिकल यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल रिसर्च प्रोग्राम के सहयोग से किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि इन खाद्य पदार्थों का सेवन करने वाले लोगों में कोलोरेक्टल कैंसर की संभावना लगभग 50 प्रतिशत तक कम देखी गई। हालाँकि, शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह एक सहसंबंध है, न कि कार्य-कारण का प्रमाण।

अध्ययन का दायरा और पद्धति

इस शोध में अमेरिका के नेशनल हेल्थ एंड न्यूट्रिशन एग्जामिनेशन सर्वे (NHANES) के 2001 से 2020 तक के आँकड़ों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में 50 वर्ष या उससे अधिक आयु के करीब 9,405 प्रतिभागियों को शामिल किया गया, जो अमेरिका की लगभग 3.7 करोड़ वयस्क आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं।

शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों की डाइट, सप्लीमेंट लेने की आदतें और कोलोरेक्टल कैंसर के इतिहास का गहन विश्लेषण किया। परिणामों की सटीकता सुनिश्चित करने के लिए उम्र, लिंग, धूम्रपान, शारीरिक वजन, खान-पान की अन्य आदतें और अन्य स्वास्थ्य संबंधी कारकों को भी ध्यान में रखा गया।

मुख्य निष्कर्ष: आंतों का माइक्रोबायोम निभाता है अहम भूमिका

अध्ययन के अनुसार, प्रोबायोटिक्स, प्रीबायोटिक्स या दही का सेवन करने वाले प्रतिभागियों में कोलोरेक्टल कैंसर की संभावना लगभग 50% कम पाई गई। शोधकर्ताओं का मानना है कि इसके पीछे आंतों के माइक्रोबायोटा — यानी लाभकारी और हानिकारक बैक्टीरिया के संतुलन — पर इन खाद्य पदार्थों के सकारात्मक प्रभाव की भूमिका हो सकती है।

प्रोबायोटिक्स ऐसे जीवित सूक्ष्मजीव हैं जो आंतों में लाभकारी बैक्टीरिया की संख्या बढ़ाते हैं। प्रीबायोटिक्स विशेष प्रकार के फाइबर हैं जो इन्हीं अच्छे बैक्टीरिया के पोषण का काम करते हैं। दही जैसे फर्मेंटेड खाद्य पदार्थों में भी ऐसे तत्व पाए जाते हैं जिन्हें पाचन तंत्र के लिए लाभकारी माना जाता है।

शोधकर्ताओं की सावधानी: संबंध है, प्रमाण नहीं

शोधकर्ताओं ने यह भी रेखांकित किया कि यह स्टडी केवल एक सहसंबंध (association) को दर्शाती है। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि दही या प्रोबायोटिक्स सीधे तौर पर कैंसर को रोकते हैं। चूँकि यह शोध पूर्व में एकत्र किए गए आँकड़ों पर आधारित है, इसलिए दीर्घकालिक और नियंत्रित अध्ययनों की आवश्यकता अभी भी बनी हुई है।

गौरतलब है कि कोलोरेक्टल कैंसर विश्वभर में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले कैंसरों में से एक है और भारत में भी इसके मामले बढ़ रहे हैं, जिससे यह शोध विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाता है।

आम जनता पर असर: रोज़मर्रा की डाइट में बदलाव की संभावना

यह अध्ययन इस बात की ओर संकेत करता है कि संतुलित खान-पान और आंतों की अच्छी सेहत कैंसर-निरोधक रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। रोज़मर्रा की डाइट में दही, फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ और आंतों के लिए लाभकारी चीज़ें शामिल करना स्वास्थ्य की दृष्टि से फायदेमंद हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस दिशा में और शोध की ज़रूरत है ताकि ठोस आहार-संबंधी दिशानिर्देश तैयार किए जा सकें।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसे अंतिम प्रमाण मानना जल्दबाज़ी होगी — खुद शोधकर्ताओं ने यह स्वीकार किया है। NHANES जैसे पूर्वव्यापी सर्वे-आधारित अध्ययन कई बार जीवनशैली के अन्य कारकों को पूरी तरह अलग नहीं कर पाते, जिससे 50% जोखिम-कमी का आँकड़ा सावधानी से पढ़ा जाना चाहिए। भारतीय संदर्भ में, जहाँ दही पहले से आहार का हिस्सा है, यह शोध सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति में आंत-स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने का तर्क मज़बूत करता है — बशर्ते नियंत्रित क्लिनिकल परीक्षणों से इसकी पुष्टि हो।
RashtraPress
12 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कोलोरेक्टल कैंसर क्या होता है और यह किसे प्रभावित करता है?
कोलोरेक्टल कैंसर आंत (colon) और मलाशय (rectum) में होने वाला कैंसर है। यह मुख्यतः 50 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों में अधिक देखा जाता है और विश्वभर में यह सबसे सामान्य कैंसरों में से एक है।
दही और प्रोबायोटिक्स कोलोरेक्टल कैंसर के खतरे को कैसे कम कर सकते हैं?
शोधकर्ताओं के अनुसार, दही और प्रोबायोटिक्स आंतों के माइक्रोबायोटा — यानी लाभकारी और हानिकारक बैक्टीरिया के संतुलन — पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। यह संतुलन आंतों की सेहत बनाए रखने और कैंसर-निरोधक वातावरण तैयार करने में सहायक हो सकता है।
इस स्टडी में कितने लोगों को शामिल किया गया और यह कहाँ हुई?
यह शोध चंग शान मेडिकल यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल रिसर्च प्रोग्राम के सहयोग से किया गया। इसमें NHANES के 2001 से 2020 तक के आँकड़ों के आधार पर करीब 9,405 प्रतिभागियों का विश्लेषण किया गया, जो अमेरिका की लगभग 3.7 करोड़ वयस्क आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं।
क्या यह साबित हो गया कि दही खाने से कैंसर नहीं होगा?
नहीं। शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह अध्ययन केवल एक सहसंबंध दर्शाता है, कार्य-कारण का प्रमाण नहीं। दही या प्रोबायोटिक्स सीधे कैंसर को रोकते हैं, यह अभी सिद्ध नहीं हुआ है और इस दिशा में दीर्घकालिक नियंत्रित अध्ययनों की आवश्यकता है।
रोज़मर्रा की डाइट में क्या बदलाव करना फायदेमंद हो सकता है?
इस शोध के निष्कर्षों के आधार पर, रोज़ाना की डाइट में दही, फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ और प्रोबायोटिक्स-प्रीबायोटिक्स से भरपूर चीज़ें शामिल करना आंतों की सेहत के लिए लाभकारी हो सकता है। हालाँकि, किसी भी आहार परिवर्तन से पहले चिकित्सक की सलाह लेना उचित है।
राष्ट्र प्रेस
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