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केसरबाई केरकर: जिनकी आवाज़ 1977 में NASA के वॉयजर के साथ अंतरिक्ष तक पहुँची

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केसरबाई केरकर: जिनकी आवाज़ 1977 में NASA के वॉयजर के साथ अंतरिक्ष तक पहुँची

सारांश

केसरबाई केरकर की आवाज़ सिर्फ मंच तक सीमित नहीं रही — 1977 में NASA के वॉयजर मिशन के साथ उनकी 'जात कहां हो' प्रस्तुति अंतरिक्ष तक पहुँची। 13 जुलाई को उनकी जयंती पर उस गायिका को याद करना ज़रूरी है जिन्हें रवींद्रनाथ टैगोर ने 'सुरश्री' कहा और भारत ने पद्म भूषण से नवाज़ा।

मुख्य बातें

केसरबाई केरकर का जन्म 13 जुलाई 1892 को गोवा के केरी गाँव में हुआ था।
उन्होंने 1921 से लगभग 11 वर्षों तक उस्ताद अल्लादिया खान के मार्गदर्शन में जयपुर-अतरौली घराने की तालीम ली।
1977 में NASA के वॉयजर मिशन के गोल्डन रिकॉर्ड में उनकी 'जात कहां हो' (राग भैरवी) को मानवता की सांगीतिक धरोहर के रूप में शामिल किया गया।
महाकवि रवींद्रनाथ टैगोर ने उन्हें 'सुरश्री' की उपाधि दी।
1953 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 1969 में पद्म भूषण से सम्मानित।
16 सितंबर 1977 को निधन; उनकी रिकॉर्डिंग्स आज भी शास्त्रीय संगीत के अध्येताओं के लिए संदर्भ-स्रोत हैं।

भारतीय शास्त्रीय संगीत की महान गायिका केसरबाई केरकर उन विरल कलाकारों में से हैं जिनकी आवाज़ न केवल पीढ़ियों को मंत्रमुग्ध करती रही, बल्कि 1977 में NASA के वॉयजर मिशन के साथ अंतरिक्ष की गहराइयों तक भी पहुँची। राग भैरवी पर आधारित उनकी प्रस्तुति 'जात कहां हो' को मानव सभ्यता की श्रेष्ठ सांगीतिक धरोहर के रूप में गोल्डन रिकॉर्ड में स्थान मिला। 13 जुलाई को उनकी जयंती के अवसर पर उनकी इस अमर विरासत को स्मरण करना स्वाभाविक है।

प्रारंभिक जीवन और संगीत-साधना

केसरबाई केरकर का जन्म 13 जुलाई 1892 को गोवा के केरी गाँव में हुआ था, जो उस समय पुर्तगाली शासन के अधीन था। बचपन से ही संगीत के प्रति उनका अनुराग असाधारण था और मात्र आठ वर्ष की आयु में उन्होंने विधिवत संगीत-शिक्षा आरंभ कर दी। कोल्हापुर में संगीत की बारीकियाँ सीखने के बाद उनकी साधना को एक निर्णायक दिशा मिली।

1921 में वे जयपुर-अतरौली घराने के सुविख्यात उस्ताद अल्लादिया खान की शिष्या बनीं। लगभग 11 वर्षों तक उनके कठोर मार्गदर्शन में की गई रियाज़ ने केसरबाई की गायकी को वह गहराई और परिपक्वता दी, जो आगे चलकर उनकी पहचान बनी। घराने की ख़याल गायकी की परंपरा को उन्होंने अपनी विशिष्ट शैली में ढालकर प्रस्तुत किया।

गायकी की विशेषता और मंच-प्रभाव

केसरबाई किसी राग को केवल तकनीकी दक्षता से नहीं, बल्कि उसके भाव को पूरी तरह आत्मसात करके प्रस्तुत करती थीं। उनके मंच पर आते ही श्रोताओं में एक विशेष स्थिरता छा जाती थी। सुरों की शुद्धता, भावनात्मक गहराई और रागों की सूक्ष्म व्याख्या — ये तीनों तत्व उनकी गायकी को समकालीन कलाकारों से अलग करते थे।

गौरतलब है कि महाकवि रवींद्रनाथ टैगोर भी उनकी गायकी से अत्यंत प्रभावित थे और उन्होंने केसरबाई को 'सुरश्री' — अर्थात सुरों की रानी — की उपाधि से विभूषित किया। यह सम्मान उनकी कला की सार्वभौमिक स्वीकृति का प्रमाण है।

अंतरिक्ष तक पहुँचे सुर: गोल्डन रिकॉर्ड की कहानी

1977 में NASA ने अपने वॉयजर मिशन के साथ एक विशेष गोल्डन रिकॉर्ड अंतरिक्ष में प्रेषित किया, जिसमें पृथ्वी की विविध संस्कृतियों और सभ्यताओं की सांगीतिक झलकियाँ संकलित थीं। इस रिकॉर्ड में केसरबाई केरकर की आवाज़ में राग भैरवी पर आधारित 'जात कहां हो' को स्थान दिया गया।

यह ऐसे समय में आया जब भारतीय शास्त्रीय संगीत को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने की माँग उठ रही थी। NASA के वैज्ञानिकों और संगीत विशेषज्ञों ने इस प्रस्तुति को मानवता की सांगीतिक विविधता का प्रतीक मानकर चुना — जो इस बात का प्रमाण है कि केसरबाई की कला की पहुँच राष्ट्रीय सीमाओं से कहीं परे थी।

पुरस्कार और सम्मान

भारत सरकार और सांस्कृतिक संस्थाओं ने उनकी कला को उचित सम्मान दिया। 1953 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया — यह भारतीय प्रदर्शन कलाओं का सर्वोच्च सरकारी सम्मान है। इसके बाद 1969 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से अलंकृत किया।

ये पुरस्कार न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि के प्रतीक हैं, बल्कि जयपुर-अतरौली घराने की उस परंपरा की मान्यता भी हैं जिसे उन्होंने दशकों तक जीवंत रखा।

विरासत और स्मृति

16 सितंबर 1977 को केसरबाई केरकर का निधन हो गया, किंतु उनकी आवाज़ और गायकी की परंपरा आज भी भारतीय शास्त्रीय संगीत के अध्येताओं और श्रोताओं के बीच जीवित है। उनकी रिकॉर्डिंग्स नई पीढ़ी के संगीतकारों के लिए अध्ययन का स्रोत बनी हुई हैं। जयपुर-अतरौली घराने की गायकी को जिस ऊँचाई तक वे ले गईं, वह मानक आज भी अनुकरणीय माना जाता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

मुख्यधारा की कवरेज अक्सर इस तथ्य को रेखांकित करने में चूकती है कि वॉयजर रिकॉर्ड में शामिल होने वाली वे एकमात्र भारतीय शास्त्रीय गायिका थीं। यह उनकी जयंती पर सिर्फ स्मृति का अवसर नहीं, बल्कि यह पूछने का भी समय है कि क्या हमने उनकी परंपरा को संस्थागत रूप से संरक्षित करने में पर्याप्त प्रयास किए हैं।
RashtraPress
12 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

केसरबाई केरकर कौन थीं?
केसरबाई केरकर भारतीय शास्त्रीय संगीत की जयपुर-अतरौली घराने की विख्यात ख़याल गायिका थीं, जिनका जन्म 13 जुलाई 1892 को गोवा के केरी गाँव में हुआ था। उन्हें रवींद्रनाथ टैगोर ने 'सुरश्री' की उपाधि दी और भारत सरकार ने 1969 में पद्म भूषण से सम्मानित किया।
केसरबाई केरकर की आवाज़ अंतरिक्ष तक कैसे पहुँची?
1977 में NASA के वॉयजर मिशन के साथ एक 'गोल्डन रिकॉर्ड' अंतरिक्ष में भेजा गया, जिसमें पृथ्वी की विविध सांस्कृतिक और सांगीतिक धरोहर संकलित थी। इसमें केसरबाई केरकर की राग भैरवी पर आधारित प्रस्तुति 'जात कहां हो' को मानवता की श्रेष्ठ संगीत-विरासत के प्रतीक के रूप में शामिल किया गया था।
केसरबाई केरकर ने संगीत की शिक्षा किनसे ली?
केसरबाई ने मात्र आठ वर्ष की आयु में संगीत सीखना आरंभ किया और कोल्हापुर में प्रारंभिक शिक्षा ली। 1921 में वे जयपुर-अतरौली घराने के सुविख्यात उस्ताद अल्लादिया खान की शिष्या बनीं और लगभग 11 वर्षों तक उनके मार्गदर्शन में कठोर रियाज़ किया।
केसरबाई केरकर को कौन-से प्रमुख पुरस्कार मिले?
उन्हें 1953 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 1969 में भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण प्रदान किया गया। इसके अतिरिक्त महाकवि रवींद्रनाथ टैगोर ने उन्हें 'सुरश्री' की उपाधि दी, जिसका अर्थ है सुरों की रानी।
केसरबाई केरकर का निधन कब हुआ और उनकी विरासत क्या है?
केसरबाई केरकर का निधन 16 सितंबर 1977 को हुआ। उनकी रिकॉर्डिंग्स आज भी जयपुर-अतरौली घराने की गायकी के अध्ययन का प्रमुख स्रोत हैं और NASA के वॉयजर गोल्डन रिकॉर्ड के माध्यम से उनकी आवाज़ अनंत काल के लिए अंतरिक्ष में सुरक्षित है।
राष्ट्र प्रेस
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