10 अगस्त 2026
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द्रौपदी मुर्मु का 68वाँ जन्मदिन: उपरबेड़ा गाँव से राष्ट्रपति भवन तक का अदम्य सफर

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द्रौपदी मुर्मु का 68वाँ जन्मदिन: उपरबेड़ा गाँव से राष्ट्रपति भवन तक का अदम्य सफर

सारांश

उपरबेड़ा के एक संथाल आदिवासी घर से निकलकर राष्ट्रपति भवन तक — द्रौपदी मुर्मु की कहानी केवल राजनीतिक उत्थान की नहीं, बल्कि दो बेटों, पति, माँ और भाई को खोने के बाद भी अध्यात्म और योग के बल पर खुद को पुनर्जीवित करने की है। 68वें जन्मदिन पर उनका जीवन पूरे देश के लिए प्रेरणापाठ है।

मुख्य बातें

द्रौपदी मुर्मु का जन्म 20 जून 1958 को ओडिशा के मयूरभंज जिले के उपरबेड़ा गाँव में एक संथाल आदिवासी परिवार में हुआ।
वे अपने गाँव की पहली बालिका थीं जिन्होंने मैट्रिक पास किया और 1979 में रमादेवी महिला महाविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की।
2009 में बेटे की असमय मृत्यु के बाद वे अवसाद में गईं; 2013 में दूसरे बेटे और 2014 में पति श्यामचरण मुर्मु का भी निधन हो गया।
1997 में पार्षद से राजनीति शुरू कर 2000 व 2009 में रायरंगपुर से दो बार विधायक, फिर 2015 में झारखंड की पहली आदिवासी राज्यपाल बनीं।
25 जुलाई 2022 को भारत की 15वीं राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली — देश की पहली आदिवासी राष्ट्रपति ।
संथाली भाषा की संवैधानिक मान्यता और 'ओल चिकी' लिपि के संहिताकरण में उनकी अहम भूमिका रही।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु 20 जून 2025 को अपना 68वाँ जन्मदिन मना रही हैं। ओडिशा के एक सुदूर आदिवासी गाँव से निकलकर भारत की 15वीं राष्ट्रपति बनने तक का उनका सफर न केवल आदिवासी समाज के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा का अटूट स्रोत है। व्यक्तिगत त्रासदियों की एक के बाद एक मार झेलते हुए भी उन्होंने अध्यात्म और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर खुद को पुनः खड़ा किया।

उपरबेड़ा से भुवनेश्वर: शिक्षा ने बदली राह

द्रौपदी मुर्मु का जन्म 20 जून 1958 को ओडिशा के मयूरभंज जिले के उपरबेड़ा गाँव में एक संथाल आदिवासी परिवार में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा उपरबेड़ा प्राथमिक विद्यालय में लेने के बाद, 8वीं कक्षा से आगे की पढ़ाई के लिए वे भुवनेश्वर गईं — यह कदम उनके गाँव की किसी बालिका के लिए अभूतपूर्व था।

उन्होंने 1979 में भुवनेश्वर के रमादेवी महिला महाविद्यालय से राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में कला स्नातक की उपाधि प्राप्त की। मैट्रिक पास करने वाली और स्नातक बनने वाली वे अपने गाँव की पहली बालिका थीं — एक ऐसी उपलब्धि जो सीमित संसाधनों और सामाजिक बाधाओं के बीच उनकी असाधारण इच्छाशक्ति को रेखांकित करती है। 1980 में उनका विवाह बैंक अधिकारी श्यामचरण मुर्मु से हुआ।

दुखों का पहाड़: बेटे, माँ, भाई और पति का जाना

जीवन ने मुर्मु की परीक्षा बार-बार और निर्ममता से ली। 2009 में उनके 25 वर्षीय बेटे की असमय मृत्यु ने उन्हें गहरे अवसाद (डिप्रेशन) में धकेल दिया। इस संकट से उबरने के लिए उन्होंने अध्यात्म का मार्ग चुना और ब्रह्माकुमारी संस्था से जुड़ीं।

वे धीरे-धीरे संभल ही रही थीं कि 2013 में एक दुर्घटना में उनके दूसरे बेटे का भी निधन हो गया। इसके कुछ ही समय बाद उनकी माँ और भाई भी चल बसे। दुखों की यह श्रृंखला यहीं नहीं रुकी — 2014 में उनके पति श्यामचरण मुर्मु भी दुनिया छोड़ गए। कुछ ही वर्षों में परिवार के कई स्तंभ एक-एक कर बिखर गए। उन्होंने अध्यात्म के साथ-साथ योग को अपनाया और अवसाद से तब तक संघर्ष किया जब तक उसे पूरी तरह परास्त नहीं कर दिया।

राजनीतिक यात्रा: पार्षद से राष्ट्रपति तक

मुर्मु ने 1997 में रायरंगपुर नगर पंचायत में पार्षद के रूप में अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया। 2000 में वे ओडिशा में भारतीय जनता पार्टी (BJP)-बीजेडी गठबंधन सरकार में मंत्री बनीं और परिवहन, वाणिज्य, मत्स्य पालन तथा पशुपालन मंत्रालयों का कार्यभार सँभाला।

वे रायरंगपुर से BJP के टिकट पर 2000 और 2009 में दो बार विधायक चुनी गईं। उल्लेखनीय यह है कि 2009 में जब बीजेडी ने BJP से गठबंधन तोड़ लिया और मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने बड़ी जीत दर्ज की, तब भी मुर्मु ने अपनी सीट बरकरार रखी। 2007 में ओडिशा विधानसभा ने उन्हें प्रतिष्ठित 'पंडित नीलकंठ दास-सर्वश्रेष्ठ विधायक' पुरस्कार से सम्मानित किया।

2015 में उन्हें झारखंड का राज्यपाल नियुक्त किया गया और वे इस पद पर पहुँचने वाली पहली आदिवासी नेता बनीं। 2015 से 2021 तक झारखंड की 9वीं राज्यपाल रहने के बाद, 25 जुलाई 2022 को उन्होंने भारत के 15वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली।

आदिवासी संस्कृति और भाषा की संरक्षक

राष्ट्रपति के रूप में मुर्मु ने संथाली भाषा को भारत की आधिकारिक भाषाओं में संवैधानिक मान्यता दिलाने में अहम भूमिका निभाई और 'ओल चिकी' लिपि के संहिताकरण की पहल से भी जुड़ी रहीं। उन्होंने राष्ट्रपति भवन को आम जनता, विशेष रूप से बच्चों और दिव्यांगजनों के लिए अधिक सुलभ बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं।

गौरतलब है कि उनका यह सफर केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है — यह उन करोड़ों आदिवासी परिवारों के लिए संभावनाओं का द्वार है जो सीमित संसाधनों के बावजूद आगे बढ़ने का सपना देखते हैं। उनकी जीवन-यात्रा यह सिद्ध करती है कि लोकतंत्र की शक्ति समाज के हर वर्ग तक पहुँच सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

पर उदाहरण विरले मिलते हैं। हालाँकि यह भी ध्यान देने योग्य है कि उनकी राष्ट्रपति पद तक की यात्रा जितनी व्यक्तिगत दृढ़ता की कहानी है, उतनी ही यह सवाल भी उठाती है कि क्या संस्थागत ढाँचे ने आदिवासी समाज के लिए वे रास्ते खोले हैं जो मुर्मु जैसे अपवादों की नहीं, बल्कि सामान्य नियम की तरह हों। संथाली भाषा को संवैधानिक मान्यता और 'ओल चिकी' लिपि के संरक्षण में उनका योगदान ठोस और दीर्घकालिक है। असली कसौटी यह होगी कि उनकी विरासत केवल प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व तक सीमित रहती है या आदिवासी समुदायों के लिए नीतिगत बदलाव की नींव बनती है।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

द्रौपदी मुर्मु का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
द्रौपदी मुर्मु का जन्म 20 जून 1958 को ओडिशा के मयूरभंज जिले के उपरबेड़ा गाँव में एक संथाल आदिवासी परिवार में हुआ था। वे अपने गाँव की पहली बालिका थीं जिन्होंने मैट्रिक पास किया और कॉलेज में पढ़ाई की।
द्रौपदी मुर्मु को किन व्यक्तिगत त्रासदियों का सामना करना पड़ा?
2009 में उनके एक बेटे की असमय मृत्यु हुई, जिससे वे अवसाद में चली गईं। इसके बाद 2013 में दूसरे बेटे का भी निधन हो गया, और कुछ ही समय बाद माँ व भाई भी चल बसे। 2014 में पति श्यामचरण मुर्मु का भी देहांत हो गया। उन्होंने अध्यात्म और योग के सहारे इन सभी दुखों से उबरने का रास्ता खोजा।
द्रौपदी मुर्मु राजनीति में कब और कैसे आईं?
उन्होंने 1997 में रायरंगपुर नगर पंचायत में पार्षद के रूप में राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। इसके बाद 2000 और 2009 में BJP के टिकट पर रायरंगपुर से विधायक चुनी गईं और ओडिशा सरकार में मंत्री पद भी सँभाला।
द्रौपदी मुर्मु भारत की राष्ट्रपति कब बनीं?
द्रौपदी मुर्मु ने 25 जुलाई 2022 को भारत के 15वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। वे देश की पहली आदिवासी राष्ट्रपति हैं। इससे पहले 2015 से 2021 तक वे झारखंड की 9वीं राज्यपाल रहीं और इस पद पर पहुँचने वाली पहली आदिवासी नेता थीं।
आदिवासी संस्कृति और भाषा के लिए मुर्मु का योगदान क्या रहा है?
द्रौपदी मुर्मु ने संथाली भाषा को भारत की आधिकारिक भाषाओं में संवैधानिक मान्यता दिलाने में अहम भूमिका निभाई और 'ओल चिकी' लिपि के संहिताकरण की पहल से जुड़ी रहीं। राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने राष्ट्रपति भवन को आम जनता, बच्चों और दिव्यांगजनों के लिए अधिक सुलभ बनाने की दिशा में भी कदम उठाए हैं।
राष्ट्र प्रेस
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