2050 तक हर साल 4.3 लाख मौतें: भीषण गर्मी और कूलिंग संकट पर क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब की चेतावनी
सारांश
मुख्य बातें
क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान से वर्ष 2050 तक हर साल करीब 4.3 लाख अतिरिक्त लोगों की मौत होने का अनुमान है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इनमें से लगभग 10 गुना अधिक मौतें गरीब देशों में होंगी, जबकि अमीर देशों में यह संख्या तुलनात्मक रूप से काफी कम रहेगी। यह रिपोर्ट सोमवार, 27 जुलाई 2026 को जारी की गई।
रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष
रिपोर्ट के अनुसार, इन मौतों को काफी हद तक रोका जा सकता है — बशर्ते लोगों को ऊर्जा, विशेष रूप से कूलिंग के लिए आवश्यक बिजली, तक पर्याप्त पहुँच मिले। रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि जिन इलाकों पर भीषण गर्मी का सबसे अधिक असर पड़ेगा, वहीं के लोगों के पास एयर कंडीशनिंग जैसी सुविधाएँ चलाने के लिए संसाधनों की सबसे अधिक कमी होगी।
रिपोर्ट ने 18 देशों के ऐसे क्षेत्रों की पहचान की है जहाँ लगभग 67.6 करोड़ लोग रहते हैं और जो भीषण गर्मी तथा कूलिंग की कमी — दोनों संकटों का एक साथ सामना करेंगे। इन क्षेत्रों में वर्ष 2050 तक हर साल करीब 3.77 लाख लोगों की मौत होने का अनुमान है।
सबसे अधिक प्रभावित देश और क्षेत्र
रिपोर्ट के अनुसार, सबसे अधिक प्रभावित देश उत्तरी उप-सहारा अफ्रीका के नाइजर, माली, बुर्किना फासो और चाड हैं। इसके अलावा दक्षिण एशिया के पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार भी इस सूची में शामिल हैं। ये सभी देश वर्तमान में कम आय या निम्न-मध्यम आय वर्ग में आते हैं।
रिपोर्ट में नाइजर और सऊदी अरब की तुलना करते हुए बताया गया है कि वर्ष 2050 तक नाइजर में प्रति व्यक्ति बिजली की अतिरिक्त खपत, सऊदी अरब की तुलना में केवल नौवें हिस्से के बराबर होगी — जिसके चलते नाइजर में हर साल करीब 27,000 अधिक लोगों की मौत गर्मी के कारण होने का अनुमान है।
आय असमानता और कूलिंग का गहरा संबंध
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मध्यम आय वाले देशों में कूलिंग के लिए बिजली की खपत, कम आय वाले देशों की तुलना में सात गुना अधिक बढ़ेगी। वहीं, कम आय वाले देशों में प्रति व्यक्ति बिजली की अतिरिक्त खपत इतनी कम होगी कि उससे केवल एक एलईडी बल्ब को मात्र चार महीने तक ही जलाया जा सकेगा।
गौरतलब है कि बहरीन, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और सऊदी अरब जैसे खाड़ी देशों में तापमान उप-सहारा अफ्रीका जितना ही रहता है, लेकिन वहाँ कूलिंग के लिए बिजली की खपत कहीं अधिक है — इसीलिए वहाँ गर्मी से होने वाली मौतों की संख्या अपेक्षाकृत कम रहने का अनुमान है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के सह-संस्थापक और शिकागो विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर माइकल ग्रीनस्टोन ने कहा, 'एयर कंडीशनर लोगों की जान बचा सकता है, और जलवायु परिवर्तन के कारण अमीर देशों में इसका इस्तेमाल निश्चित रूप से बढ़ेगा। लेकिन हमारी रिसर्च बताती है कि दुनिया के कई गरीब देशों के लोग ऐसा नहीं कर पाएँगे। यही जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है कि सबसे ज्यादा मौतें उन्हीं देशों में होंगी, जिन्होंने जलवायु परिवर्तन में सबसे कम योगदान दिया है।'
क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के फेलो और शिकागो विश्वविद्यालय के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट (EPIC) में वैज्ञानिक अनुसंधान निदेशक अश्विन रोडे ने कहा, 'हमने उन इलाकों की पहचान की है, जहाँ गर्मी से सबसे ज्यादा मौतें होने का खतरा है और जहाँ लोगों के पास एयर कंडीशनर चलाने के लिए पर्याप्त बिजली भी नहीं होगी। इससे सरकारों और नीति-निर्माताओं को यह तय करने में मदद मिलेगी कि सबसे अधिक लोगों की जान कैसे बचाई जा सकती है।'
आगे की राह और समाधान
रिपोर्ट के अनुसार, लोगों को भीषण गर्मी से बचाने के लिए बिजली की बेहतर उपलब्धता, हीट अर्ली वार्निंग सिस्टम, प्रभावी कार्ययोजनाएँ, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार और जरूरतमंद लोगों के लिए लक्षित सामाजिक योजनाएँ जैसी पहल आवश्यक होंगी। हालाँकि, इनमें से कई उपायों का अभी तक बड़े पैमाने पर परीक्षण नहीं हुआ है।
क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब वर्तमान में दुनिया भर के देशों के लिए डेटा-आधारित रणनीतियाँ और प्रभावी अनुकूलन उपायों (एडाप्टेशन स्ट्रैटेजीज) का एक वैश्विक खाका तैयार कर रही है, ताकि सरकारें, वित्तीय संस्थान और स्थानीय समुदाय जलवायु परिवर्तन से बढ़ते जोखिमों का बेहतर तरीके से सामना कर सकें।