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2050 तक हर साल 4.3 लाख मौतें: भीषण गर्मी और कूलिंग संकट पर क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब की चेतावनी

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2050 तक हर साल 4.3 लाख मौतें: भीषण गर्मी और कूलिंग संकट पर क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब की चेतावनी

सारांश

क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब की रिपोर्ट एक कड़वी सच्चाई उजागर करती है — 2050 तक हर साल 4.3 लाख मौतें, और उनमें से अधिकांश उन देशों में जिन्होंने जलवायु संकट पैदा करने में सबसे कम भूमिका निभाई। एयर कंडीशनर जान बचा सकता है, पर गरीब देशों के पास उसे चलाने की बिजली भी नहीं होगी।

मुख्य बातें

क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब की रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन से 2050 तक हर साल करीब 4.3 लाख अतिरिक्त मौतें होने का अनुमान है।
गरीब देशों में मृत्यु दर अमीर देशों की तुलना में लगभग 10 गुना अधिक रहने का अनुमान है।
18 देशों में 67.6 करोड़ लोग भीषण गर्मी और कूलिंग की कमी — दोनों संकटों का एक साथ सामना करेंगे; इनमें हर साल 3.77 लाख मौतें संभावित हैं।
सबसे अधिक प्रभावित देश: नाइजर , माली , बुर्किना फासो , चाड (अफ्रीका) और पाकिस्तान , बांग्लादेश , नेपाल , म्यांमार (दक्षिण एशिया)।
मध्यम आय वाले देशों में कूलिंग बिजली खपत, कम आय वाले देशों की तुलना में सात गुना अधिक बढ़ेगी।
नाइजर में प्रति व्यक्ति बिजली खपत सऊदी अरब के मुकाबले केवल नौवें हिस्से के बराबर रहेगी, जिससे वहाँ सालाना 27,000 अतिरिक्त मौतें होने का अनुमान है।

क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान से वर्ष 2050 तक हर साल करीब 4.3 लाख अतिरिक्त लोगों की मौत होने का अनुमान है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इनमें से लगभग 10 गुना अधिक मौतें गरीब देशों में होंगी, जबकि अमीर देशों में यह संख्या तुलनात्मक रूप से काफी कम रहेगी। यह रिपोर्ट सोमवार, 27 जुलाई 2026 को जारी की गई।

रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष

रिपोर्ट के अनुसार, इन मौतों को काफी हद तक रोका जा सकता है — बशर्ते लोगों को ऊर्जा, विशेष रूप से कूलिंग के लिए आवश्यक बिजली, तक पर्याप्त पहुँच मिले। रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि जिन इलाकों पर भीषण गर्मी का सबसे अधिक असर पड़ेगा, वहीं के लोगों के पास एयर कंडीशनिंग जैसी सुविधाएँ चलाने के लिए संसाधनों की सबसे अधिक कमी होगी।

रिपोर्ट ने 18 देशों के ऐसे क्षेत्रों की पहचान की है जहाँ लगभग 67.6 करोड़ लोग रहते हैं और जो भीषण गर्मी तथा कूलिंग की कमी — दोनों संकटों का एक साथ सामना करेंगे। इन क्षेत्रों में वर्ष 2050 तक हर साल करीब 3.77 लाख लोगों की मौत होने का अनुमान है।

सबसे अधिक प्रभावित देश और क्षेत्र

रिपोर्ट के अनुसार, सबसे अधिक प्रभावित देश उत्तरी उप-सहारा अफ्रीका के नाइजर, माली, बुर्किना फासो और चाड हैं। इसके अलावा दक्षिण एशिया के पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार भी इस सूची में शामिल हैं। ये सभी देश वर्तमान में कम आय या निम्न-मध्यम आय वर्ग में आते हैं।

रिपोर्ट में नाइजर और सऊदी अरब की तुलना करते हुए बताया गया है कि वर्ष 2050 तक नाइजर में प्रति व्यक्ति बिजली की अतिरिक्त खपत, सऊदी अरब की तुलना में केवल नौवें हिस्से के बराबर होगी — जिसके चलते नाइजर में हर साल करीब 27,000 अधिक लोगों की मौत गर्मी के कारण होने का अनुमान है।

आय असमानता और कूलिंग का गहरा संबंध

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मध्यम आय वाले देशों में कूलिंग के लिए बिजली की खपत, कम आय वाले देशों की तुलना में सात गुना अधिक बढ़ेगी। वहीं, कम आय वाले देशों में प्रति व्यक्ति बिजली की अतिरिक्त खपत इतनी कम होगी कि उससे केवल एक एलईडी बल्ब को मात्र चार महीने तक ही जलाया जा सकेगा।

गौरतलब है कि बहरीन, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और सऊदी अरब जैसे खाड़ी देशों में तापमान उप-सहारा अफ्रीका जितना ही रहता है, लेकिन वहाँ कूलिंग के लिए बिजली की खपत कहीं अधिक है — इसीलिए वहाँ गर्मी से होने वाली मौतों की संख्या अपेक्षाकृत कम रहने का अनुमान है।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के सह-संस्थापक और शिकागो विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर माइकल ग्रीनस्टोन ने कहा, 'एयर कंडीशनर लोगों की जान बचा सकता है, और जलवायु परिवर्तन के कारण अमीर देशों में इसका इस्तेमाल निश्चित रूप से बढ़ेगा। लेकिन हमारी रिसर्च बताती है कि दुनिया के कई गरीब देशों के लोग ऐसा नहीं कर पाएँगे। यही जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है कि सबसे ज्यादा मौतें उन्हीं देशों में होंगी, जिन्होंने जलवायु परिवर्तन में सबसे कम योगदान दिया है।'

क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के फेलो और शिकागो विश्वविद्यालय के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट (EPIC) में वैज्ञानिक अनुसंधान निदेशक अश्विन रोडे ने कहा, 'हमने उन इलाकों की पहचान की है, जहाँ गर्मी से सबसे ज्यादा मौतें होने का खतरा है और जहाँ लोगों के पास एयर कंडीशनर चलाने के लिए पर्याप्त बिजली भी नहीं होगी। इससे सरकारों और नीति-निर्माताओं को यह तय करने में मदद मिलेगी कि सबसे अधिक लोगों की जान कैसे बचाई जा सकती है।'

आगे की राह और समाधान

रिपोर्ट के अनुसार, लोगों को भीषण गर्मी से बचाने के लिए बिजली की बेहतर उपलब्धता, हीट अर्ली वार्निंग सिस्टम, प्रभावी कार्ययोजनाएँ, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार और जरूरतमंद लोगों के लिए लक्षित सामाजिक योजनाएँ जैसी पहल आवश्यक होंगी। हालाँकि, इनमें से कई उपायों का अभी तक बड़े पैमाने पर परीक्षण नहीं हुआ है।

क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब वर्तमान में दुनिया भर के देशों के लिए डेटा-आधारित रणनीतियाँ और प्रभावी अनुकूलन उपायों (एडाप्टेशन स्ट्रैटेजीज) का एक वैश्विक खाका तैयार कर रही है, ताकि सरकारें, वित्तीय संस्थान और स्थानीय समुदाय जलवायु परिवर्तन से बढ़ते जोखिमों का बेहतर तरीके से सामना कर सकें।

संपादकीय दृष्टिकोण

वे सबसे अधिक कीमत चुकाएँगे। एयर कंडीशनर को 'जीवनरक्षक' बताना तकनीकी रूप से सही है, लेकिन यह उस ढाँचागत विफलता को भी उजागर करता है जिसमें जलवायु अनुकूलन की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं पर डाली जा रही है जिनके पास संसाधन सबसे कम हैं। नाइजर और सऊदी अरब की तुलना यह भी दर्शाती है कि ऊर्जा असमानता और जलवायु असमानता एक-दूसरे को और गहरा करते हैं। बिना वैश्विक वित्तपोषण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के, डेटा-आधारित रणनीतियाँ कागज़ पर ही रहेंगी।
RashtraPress
27 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब की रिपोर्ट में 2050 तक कितनी मौतों का अनुमान लगाया गया है?
रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान से 2050 तक हर साल करीब 4.3 लाख अतिरिक्त लोगों की मौत होने का अनुमान है। इनमें से लगभग 10 गुना अधिक मौतें गरीब देशों में होंगी, जहाँ कूलिंग के लिए पर्याप्त बिजली उपलब्ध नहीं होगी।
कौन से देश भीषण गर्मी और कूलिंग संकट से सबसे अधिक प्रभावित होंगे?
रिपोर्ट के अनुसार उत्तरी उप-सहारा अफ्रीका के नाइजर, माली, बुर्किना फासो और चाड तथा दक्षिण एशिया के पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार सबसे अधिक प्रभावित देश हैं। ये सभी कम आय या निम्न-मध्यम आय वाले देश हैं जहाँ कूलिंग के लिए बिजली की उपलब्धता सबसे कम बढ़ने का अनुमान है।
गरीब और अमीर देशों के बीच कूलिंग तक पहुँच में क्या अंतर है?
रिपोर्ट के अनुसार मध्यम आय वाले देशों में कूलिंग के लिए बिजली की खपत, कम आय वाले देशों की तुलना में सात गुना अधिक बढ़ेगी। कम आय वाले देशों में प्रति व्यक्ति बिजली की अतिरिक्त खपत इतनी कम होगी कि उससे केवल एक एलईडी बल्ब को मात्र चार महीने तक ही जलाया जा सकेगा।
नाइजर और सऊदी अरब की तुलना रिपोर्ट में क्यों की गई है?
दोनों देशों में तापमान समान रूप से अधिक रहता है, लेकिन 2050 तक नाइजर में प्रति व्यक्ति बिजली की अतिरिक्त खपत सऊदी अरब की तुलना में केवल नौवें हिस्से के बराबर होगी। इसी कारण नाइजर में हर साल करीब 27,000 अधिक लोगों की मौत गर्मी से होने का अनुमान है — यह तुलना ऊर्जा असमानता के घातक परिणामों को रेखांकित करती है।
भीषण गर्मी से होने वाली मौतों को रोकने के लिए क्या उपाय सुझाए गए हैं?
रिपोर्ट के अनुसार बिजली की बेहतर उपलब्धता, हीट अर्ली वार्निंग सिस्टम, प्रभावी कार्ययोजनाएँ, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार और जरूरतमंद लोगों के लिए लक्षित सामाजिक योजनाएँ आवश्यक हैं। हालाँकि, इनमें से कई उपायों का अभी तक बड़े पैमाने पर परीक्षण नहीं हुआ है और क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब इस दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रही है।
राष्ट्र प्रेस
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