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गजलीटांड़ खदान त्रासदी: 26 सितंबर 1995 को 64 श्रमिकों की जलसमाधि, 31 साल बाद भी न्याय अधूरा

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गजलीटांड़ खदान त्रासदी: 26 सितंबर 1995 को 64 श्रमिकों की जलसमाधि, 31 साल बाद भी न्याय अधूरा

सारांश

26 सितंबर 1995 की वह काली रात धनबाद के कोयलांचल ने कभी नहीं भुलाई। कतरी नदी की भयावह बाढ़ ने गजलीटांड़ खदान को जलसमाधि में बदल दिया और 64 मजदूरों को हमेशा के लिए निगल लिया। 31 साल बाद भी शव नहीं मिले, न पूरा न्याय — सिर्फ हर साल फूल चढ़ाते परिवारों की नम आँखें।

मुख्य बातें

26 सितंबर 1995 को धनबाद की गजलीटांड़ कोलियरी की नंबर छह खदान में कतरी नदी का पानी घुसने से 64 मजदूरों की जलसमाधि हो गई।
उस दिन 331-360 मिलीमीटर वर्षा हुई — सामान्य से करीब तीन गुना अधिक; झरिया के राजा तालाब का तटबंध टूटने से 275 करोड़ लीटर पानी नदी में आया।
92 में से 28 मजदूर ही मैनुअल विंडिंग सिस्टम से सुरक्षित निकाले जा सके; आसपास की सैटेलाइट खदानों सहित कुल 79 मौतें हुईं।
4 मई 1996 को केवल 5 कंकाल बरामद हुए; शेष मजदूरों के शव आज तक नहीं मिले।
मुखर्जी आयोग ने 26 जून 1998 को रिपोर्ट में सुरक्षा लापरवाही और कोयला अवरोधक हटाए जाने को कथित तौर पर त्रासदी का कारण बताया।
हादसे के 31 साल बाद भी पूर्ण जवाबदेही अधूरी; हर वर्ष 26 सितंबर को पीड़ित परिवार स्मारक पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

धनबाद की गजलीटांड़ कोलियरी में 26 सितंबर 1995 को आई भीषण बाढ़ ने 64 खनिकों को भूमिगत खदान में हमेशा के लिए समा लिया — यह झारखंड के कोयलांचल की सबसे दर्दनाक औद्योगिक त्रासदियों में से एक है, जिसका घाव 31 साल बाद भी भरा नहीं है। उस रात कतरी नदी का पानी अचानक नंबर छह खदान में घुस गया और 92 में से केवल 28 मजदूर ही जीवित बाहर निकल सके।

आपदा की रात: क्या हुआ था 26 सितंबर 1995 को

जाँच आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, उस दिन धनबाद और आसपास के झरिया क्षेत्र में 331 से 360 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई — सामान्य से लगभग तीन गुना अधिक। मूसलाधार बारिश से कतरी नदी खतरे के निशान से ऊपर बहने लगी। इसके बाद झरिया के राजा तालाब का तटबंध टूट गया और करीब 275 करोड़ लीटर पानी एक झटके में नदी में समा गया।

शाम करीब 5:15 बजे भारी बारिश के बीच बिजली चली गई। खदान के भीतर फंसे मजदूरों को निकालने के लिए मैनुअल विंडिंग सिस्टम का सहारा लिया गया, जिससे 28 मजदूर किसी तरह बाहर आ सके। शेष मजदूर नीचे ही रह गए। रात करीब 11 बजे तक खदान के अंदर से यांत्रिक संकेत मिलते रहे, जो बता रहे थे कि वे जीवित हैं और बाहर निकलने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

परंतु रात करीब 12:45 बजे कतरी नदी का पश्चिमी तटबंध भी टूट गया। पानी तेज़ी से गजलीटांड़ और आसपास की सैटेलाइट खदानों में घुस गया। कुछ ही घंटों में भूमिगत सुरंगें पूरी तरह जलमग्न हो गईं और 64 जिंदगियाँ सदा के लिए उस पानी में समा गईं। आसपास की सैटेलाइट खदानों में भी जानें गईं, जिससे कुल मृतक संख्या 79 तक पहुँच गई।

बचाव अभियान और संसाधनों की कमी

हादसे के बाद भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (BCCL) के पास पर्याप्त पंप और तकनीकी संसाधन नहीं थे। खदान से पानी निकालने के लिए बाद में चीन और यूक्रेन के विशेषज्ञों तथा मशीनों की सहायता लेनी पड़ी। महीनों तक चले इस अभियान के बावजूद अधिकांश मजदूरों के शव कभी नहीं मिल सके।

4 मई 1996 को खदान से केवल पाँच कंकाल बरामद हुए, जिनकी पहचान खनिकों की टोपी के आधार पर की गई। बाकी परिवारों के लिए यह पीड़ा और भी गहरी थी — न अपनों के अंतिम दर्शन हुए, न विधिवत अंतिम विदाई मिली।

जाँच रिपोर्ट: प्राकृतिक आपदा या मानवीय लापरवाही

त्रासदी की जाँच के लिए न्यायमूर्ति एन.के. मुखर्जी की अध्यक्षता में आयोग गठित किया गया। आयोग ने 26 जून 1998 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट में हादसे को केवल प्राकृतिक आपदा मानने के बजाय सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर लापरवाही की ओर भी स्पष्ट इशारा किया गया।

आयोग की रिपोर्ट के अनुसार गजलीटांड़ और अंगरापथरा खदान के बीच सुरक्षा के लिए मौजूद कोयला अवरोधक को हटा दिया गया था, जो पानी की घुसपैठ को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता था। यह तकनीकी चूक त्रासदी की गंभीरता बढ़ाने में कथित तौर पर बड़ा कारण बनी।

जवाबदेही का सवाल: 31 साल बाद भी अनुत्तरित

हादसे के बाद जवाबदेही और कानूनी कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल उठे। आलोचकों का कहना है कि समय बीतने के साथ कई आरोपी अधिकारी सेवानिवृत्त हो गए और कुछ मामलों में अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो सकी। हर वर्ष 26 सितंबर को जब पीड़ित परिवार स्मारक पर फूल चढ़ाने पहुँचते हैं, तो उनकी नम आँखों में उस काली रात का दर्द फिर से ताज़ा हो जाता है।

यह त्रासदी इस मायने में भी विशेष है कि यह भारत के कोयला खनन इतिहास की उन घटनाओं में शुमार है जिन्होंने खदान सुरक्षा मानकों पर राष्ट्रीय बहस को नई धार दी। गौरतलब है कि आज भी देश की कई पुरानी भूमिगत खदानों में बाढ़ जोखिम प्रबंधन को लेकर विशेषज्ञ चिंता जताते रहे हैं।

26 सितंबर 2026 को इस हादसे की 31वीं बरसी पर धनबाद के खनन समुदाय और मज़दूर संगठन एक बार फिर उन 64 श्रमिकों को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे, जो आज भी उस खदान की गहराइयों में विराजमान हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

न पूरा न्याय — तब तक ऐसी बरसियाँ स्मृति नहीं, एक जीवित आरोप हैं।
RashtraPress
25 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गजलीटांड़ खदान हादसा क्या था?
26 सितंबर 1995 को धनबाद की गजलीटांड़ कोलियरी की नंबर छह खदान में कतरी नदी का बाढ़ का पानी घुस गया, जिससे भूमिगत काम कर रहे 64 मजदूरों की जलसमाधि हो गई। 92 में से केवल 28 मजदूर सुरक्षित बाहर निकाले जा सके।
इस हादसे में इतना पानी कहाँ से आया था?
जाँच आयोग की रिपोर्ट के अनुसार उस दिन 331 से 360 मिलीमीटर वर्षा हुई — सामान्य से करीब तीन गुना अधिक। झरिया के राजा तालाब का तटबंध टूटने से करीब 275 करोड़ लीटर पानी कतरी नदी में आ गया और रात 12:45 बजे पश्चिमी तटबंध टूटने के बाद पानी खदान में घुस गया।
मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट में क्या कहा गया था?
न्यायमूर्ति एन.के. मुखर्जी आयोग ने 26 जून 1998 को सौंपी रिपोर्ट में हादसे को केवल प्राकृतिक आपदा नहीं माना। रिपोर्ट में गजलीटांड़ और अंगरापथरा खदान के बीच सुरक्षा के लिए मौजूद कोयला अवरोधक हटाए जाने का उल्लेख था, जिसे कथित तौर पर त्रासदी की गंभीरता बढ़ाने का कारण बताया गया।
क्या खदान में फंसे मजदूरों के शव मिल सके?
अधिकांश मजदूरों के शव कभी नहीं मिल सके। बचाव अभियान में चीन और यूक्रेन के विशेषज्ञों की मदद ली गई, फिर भी 4 मई 1996 को केवल पाँच कंकाल बरामद हुए जिनकी पहचान खनिकों की टोपी से की गई।
31 साल बाद पीड़ित परिवारों की स्थिति क्या है?
हर साल 26 सितंबर को पीड़ित परिवार स्मारक पर फूल चढ़ाने पहुँचते हैं। आलोचकों का कहना है कि समय के साथ कई आरोपी अधिकारी सेवानिवृत्त हो गए और अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो सकी, जिससे जवाबदेही का सवाल आज भी अनुत्तरित है।
राष्ट्र प्रेस
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