गुवाहाटी हाईकोर्ट का असम विश्वविद्यालय के कुलपति राजीव मोहन पंत को निर्देश, यूजीसी नियम उल्लंघन पर पद छोड़ें
सारांश
मुख्य बातें
गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने 14 अक्टूबर 2026 को सिलचर स्थित असम विश्वविद्यालय के कुलपति राजीव मोहन पंत को पद से इस्तीफा देने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने यह आदेश विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नियमों के कथित उल्लंघन के आधार पर जारी किया है, जिससे इस केंद्रीय विश्वविद्यालय की शीर्ष नियुक्ति प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
मामले का मुख्य घटनाक्रम
रिपोर्टों के अनुसार, कुलपति पद पर राजीव मोहन पंत की नियुक्ति को इस आधार पर न्यायालय में चुनौती दी गई थी कि नियुक्ति के दौरान यूजीसी द्वारा निर्धारित पात्रता मानदंडों और प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया। गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए 14 अक्टूबर को यह ऐतिहासिक निर्देश जारी किया।
न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि कुलपति को अब तक अदा किए गए वेतन की वसूली का प्रश्न भी विचाराधीन है। हालांकि, आदेश के सटीक कानूनी निहितार्थ आगे की कार्यवाही पर निर्भर करेंगे।
विश्वविद्यालय की प्रतिक्रिया
विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार प्रदोश किरणनाथ ने बताया कि उच्च न्यायालय के इस निर्देश की जानकारी नई दिल्ली स्थित वरिष्ठ केंद्रीय अधिकारियों को दे दी गई है। विश्वविद्यालय प्रशासन अगले कदम तय करने से पहले केंद्र सरकार के जवाब का इंतजार कर रहा है।
गौरतलब है कि चूँकि असम विश्वविद्यालय एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है, इसके कुलपति की नियुक्ति प्रक्रिया में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की भी भूमिका होती है। इस विवाद ने मंत्रालय को भी जाँच के दायरे में ला दिया है।
यूजीसी नियमों का राष्ट्रव्यापी संदर्भ
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब देशभर के विश्वविद्यालयों में वरिष्ठ शैक्षणिक पदों पर नियुक्तियों में यूजीसी नियमों के अनुपालन को लेकर बहस तेज हुई है। यह पहली बार नहीं है कि किसी विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति को न्यायालय में चुनौती दी गई हो — कर्नाटक, केरल और महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में इसी तरह के विवाद सामने आ चुके हैं। इन सभी मामलों की जड़ में वही प्रश्न रहा है: क्या नियुक्ति समिति ने यूजीसी विनियमों का शब्दशः पालन किया?
आम जनता और छात्रों पर असर
असम विश्वविद्यालय असम और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों के हजारों छात्रों को उच्च शिक्षा प्रदान करता है। शीर्ष प्रशासनिक नेतृत्व में संभावित बदलाव का असर विश्वविद्यालय के दैनिक प्रशासन, चल रहे शैक्षणिक कार्यक्रमों और भर्ती प्रक्रियाओं पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि शीर्ष पद की अनिश्चितता की स्थिति में संस्थागत निर्णय-प्रक्रिया धीमी पड़ सकती है, जिसका सीधा नुकसान विद्यार्थियों और शैक्षणिक कर्मचारियों को उठाना पड़ता है।
आगे क्या होगा
न्यायालय के निर्देशों पर केंद्र सरकार और विश्वविद्यालय की आधिकारिक प्रतिक्रिया आने के बाद स्थिति और स्पष्ट होने की उम्मीद है। कुलपति द्वारा इस्तीफे या किसी कानूनी पुनर्विचार याचिका दायर करने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इस पूरे प्रकरण के निष्पर्ष पर देश के अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों की नियुक्ति नीतियों पर भी असर पड़ सकता है।