बड़ा फैसला: गाजियाबाद रेप-मर्डर केस की जांच सुप्रीम कोर्ट ने SIT को सौंपी, महिला अधिकारी होंगी शामिल
सारांश
Key Takeaways
- सुप्रीम कोर्ट ने 24 अप्रैल 2025 को गाजियाबाद रेप-मर्डर केस की जांच SIT को सौंपी।
- UP DGP को IG, SP और DSP रैंक की महिला अधिकारियों सहित SIT तत्काल गठित करने का आदेश।
- SIT को दो सप्ताह के भीतर रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार (न्यायिक) को सौंपनी होगी।
- 16 मार्च को पड़ोसी ने चॉकलेट का लालच देकर 4 साल की बच्ची से दुष्कर्म किया, दो निजी अस्पतालों ने इलाज से इनकार किया।
- पीड़ित परिवार का आरोप — थाने में परिवार को बंद कर पीटा गया, सबूत दबाए गए और मीडिया से न बोलने की धमकी दी गई।
- ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही SIT की पूरक रिपोर्ट आने तक स्थगित रहेगी।
नई दिल्ली, 24 अप्रैल। गाजियाबाद में चार वर्षीय मासूम बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म और हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ऐतिहासिक हस्तक्षेप करते हुए पूरी जांच विशेष जांच दल (SIT) को सौंप दी है। शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश पुलिस के DGP को तत्काल SIT गठित करने का आदेश दिया है, जिसमें IG, SP और DSP रैंक की एक-एक महिला पुलिस अधिकारी को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश — क्या-क्या निर्देश दिए गए
SIT को अगले ही दिन से जांच शुरू करने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि SIT पीड़िता के माता-पिता की शिकायतों, गवाहों की सुरक्षा और दो निजी अस्पतालों की संदिग्ध भूमिका की भी जांच करेगी।
ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया है कि SIT की पूरक रिपोर्ट प्रस्तुत होने तक मुकदमे की कार्यवाही स्थगित रखी जाए। SIT को दो सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार (न्यायिक) के समक्ष पेश करनी होगी।
घटना का पूरा घटनाक्रम — कैसे हुई दरिंदगी
16 मार्च को गाजियाबाद में एक पड़ोसी ने चॉकलेट दिलाने का लालच देकर मासूम बच्ची को अपने साथ ले गया। जब काफी देर बाद बच्ची घर नहीं लौटी तो परिजनों ने तलाश की — और बच्ची बेहोश अवस्था में खून से लथपथ मिली।
पीड़िता को सबसे पहले खजान सिंह मानवी हेल्थ केयर ले जाया गया, जिसने इलाज करने से इनकार कर दिया। इसके बाद सेंट जोसेफ (मरियम) अस्पताल ने भी बच्ची को भर्ती नहीं किया। अंततः गाजियाबाद जिला अस्पताल पहुंचने पर बच्ची को मृत घोषित कर दिया गया।
पुलिस पर गंभीर आरोप — परिवार को कमरे में बंद कर पीटा
पीड़िता के पिता ने सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में चौंकाने वाले आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि जब वे FIR दर्ज कराने थाने पहुंचे तो पुलिसकर्मियों ने उन्हें और परिवार के अन्य सदस्यों को एक कमरे में बंद कर मारपीट की। पीड़िता की मां को भी पीटा गया।
परिवार को धमकी दी गई कि वे मीडिया से संपर्क न करें, क्योंकि इससे आगामी चुनावों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। याचिका में यह भी दावा किया गया कि जांच महज खानापूर्ति थी और अहम साक्ष्यों को दबाया गया।
10 अप्रैल को कोर्ट ने जताई थी कड़ी नाराज़गी
10 अप्रैल को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने इस मामले में गहरी नाराज़गी व्यक्त की थी। कोर्ट ने सवाल उठाया था कि पुलिस ने POCSO अधिनियम की संबंधित धाराएं क्यों नहीं लगाईं और दोनों निजी अस्पतालों ने जीवित बच्ची का इलाज करने से क्यों मना किया।
उसी सुनवाई में कोर्ट ने पुलिस कमिश्नर को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश दिया था।
गहरा विश्लेषण — व्यवस्था की विफलता का पैटर्न
यह मामला केवल एक बच्ची के साथ हुई त्रासदी नहीं है — यह तीन स्तरों पर व्यवस्था की विफलता का दर्पण है। पहला, निजी अस्पतालों ने मुनाफे को मानवता से ऊपर रखा। दूसरा, स्थानीय पुलिस ने न केवल जांच में लापरवाही बरती बल्कि पीड़ित परिवार को ही प्रताड़ित किया। तीसरा, राजनीतिक दबाव में सबूत दबाने के आरोप लगे।
गौरतलब है कि भारत में POCSO मामलों में दोषसिद्धि दर अभी भी औसतन 30%25 से कम है, और पीड़ित परिवारों को न्याय पाने में वर्षों लग जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप इस बात का संकेत है कि निचली व्यवस्थाओं पर भरोसा टूट चुका है।
अब सबकी नज़रें SIT की रिपोर्ट पर होंगी, जो दो सप्ताह के भीतर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत होनी है। यह रिपोर्ट न केवल इस मामले की दिशा तय करेगी, बल्कि उत्तर प्रदेश पुलिस और निजी अस्पतालों की जवाबदेही के लिए एक मिसाल भी बन सकती है।