जीआईडीसी भूमि घोटाला: शक्ति सिंह गोहिल का बड़ा आरोप, सुप्रीम कोर्ट-हाईकोर्ट ने माना दुर्भावनापूर्ण आवंटन
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शक्ति सिंह गोहिल ने 5 अगस्त 2026 को गुजरात इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (जीआईडीसी) में भूमि आवंटन को लेकर गुजरात सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय और गुजरात उच्च न्यायालय दोनों की टिप्पणियाँ यह स्पष्ट करती हैं कि अधिकारियों ने इस पूरे मामले में दुर्भावनापूर्ण (मालाफाइड) आशय से कार्य किया। गोहिल ने दोषी अधिकारियों पर तत्काल कार्रवाई, न्यायिक आयोग के गठन और केंद्रीय एजेंसियों द्वारा जाँच की माँग की है।
मुख्य घटनाक्रम
वलसाड जिले के उमरगांव ब्लॉक स्थित सरीगांव औद्योगिक क्षेत्र में करोड़ों रुपये मूल्य के 20 औद्योगिक प्लॉट कथित तौर पर सभी नियमों और प्रक्रियाओं को दरकिनार कर एक ही पक्ष को आवंटित कर दिए गए। बदले में जीआईडीसी ने बेहद कम मूल्य की कृषि भूमि स्वीकार की। एक जागरूक नागरिक ने इस मामले को जनहित याचिका के माध्यम से गुजरात उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।
अदालतों की टिप्पणियाँ
गोहिल के अनुसार, गुजरात उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के बाद पाया कि आवंटन दुर्भावनापूर्ण मंशा से किया गया था। अदालत ने 20 प्लॉटों का आवंटन रद्द करते हुए अपने आदेश में यह भी कहा कि जीआईडीसी अधिकारियों ने कानून के विपरीत कार्य किया और संबंधित पक्ष के साथ उनकी मिलीभगत प्रतीत होती है। इसके बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा, जहाँ शीर्ष अदालत ने भी उच्च न्यायालय के फैसले और उसकी टिप्पणियों को सही ठहराया।
मुआवजे में कथित अनियमितता
गोहिल ने आरोप लगाया कि मामला यहीं नहीं रुका। उन्होंने कहा कि जिस पक्ष को कृषि भूमि के बदले औद्योगिक प्लॉट दिए गए, उसी पक्ष को भूमि सीलिंग मामले में मुआवजा देने की प्रक्रिया में भी अनियमितता हुई। अधिकारियों ने 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के आधार पर लगभग ₹30 करोड़ का मुआवजा देने का निर्णय लिया, जबकि संबंधित मामला उस कानून के लागू होने से पहले का था। गोहिल के दावे के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय ने इस पहलू की भी समीक्षा की और कहा कि संबंधित पक्ष को ₹30 करोड़ नहीं, बल्कि कानून के अनुसार केवल लगभग ₹1 करोड़ का ही मुआवजा मिल सकता है।
कांग्रेस की माँगें
गोहिल ने राज्य सरकार से माँग की कि जिन अधिकारियों के विरुद्ध अदालतों ने गंभीर टिप्पणियाँ की हैं, उनके खिलाफ तत्काल और कड़ी कार्रवाई हो। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जीआईडीसी की नीतियों में बार-बार बदलाव कर उन्हें कुछ खास लोगों के हित में 'टेलर-मेड' बनाया गया है। पिछले कुछ वर्षों में हुए सभी नीति परिवर्तनों की जाँच के लिए एक न्यायिक आयोग गठित करने और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करने की माँग भी उन्होंने की।
केंद्रीय एजेंसियों से जाँच की अपील
गोहिल ने कहा कि यदि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) और आयकर विभाग अन्य मामलों की जाँच कर सकते हैं, तो उन्हें जीआईडीसी के इस मामले की भी जाँच करनी चाहिए। उन्होंने संबंधित अधिकारियों की संपत्तियों की जाँच और आय से अधिक संपत्ति की पड़ताल की माँग की। उन्होंने यह भी कहा कि जीआईडीसी की स्थापना मूलतः छोटे उद्योगों, कारीगरों और विश्वकर्मा समाज के युवाओं को उद्योग स्थापित करने का अवसर देने के लिए हुई थी, लेकिन आलोचकों का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में इसका लाभ बड़े उद्योगपतियों तक सीमित होता दिखाई दे रहा है। यह मामला गुजरात में औद्योगिक भूमि आवंटन की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े करता है।