जीएसटी परिषद 8 अक्टूबर: रिफंड, ई-कॉमर्स और आईटीसी नियमों में बड़े सुधारों पर चर्चा संभव
सारांश
मुख्य बातें
वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) परिषद की 8 अक्टूबर 2026 को होने वाली बैठक में अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था के अगले चरण के व्यापक सुधारों पर विचार-विमर्श होने की संभावना है। सूत्रों के अनुसार, प्रस्तावित बदलावों का मुख्य उद्देश्य कर अनुपालन को सरल बनाना, रिफंड प्रक्रिया में तेजी लाना, ई-कॉमर्स विक्रेताओं के लिए राष्ट्रीय बाज़ार तक पहुँच आसान करना और टैक्स प्रशासन को डेटा-आधारित, भरोसेमंद व्यवस्था में बदलना है। यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब कारोबारी समुदाय लंबे समय से जीएसटी की जटिलताओं में राहत की माँग कर रहा है।
पाँच प्रमुख क्षेत्रों पर केंद्रित है एजेंडा
सूत्रों के अनुसार, बैठक का एजेंडा मुख्यतः पाँच क्षेत्रों — प्रक्रियागत सुधार, संरचनात्मक सुधार, कारोबार सुगमता, ई-कॉमर्स और सेवा निर्यात — के इर्द-गिर्द तैयार किया गया है। गौरतलब है कि ये सुधार एक साथ उठाए जाने की स्थिति में कंपनियों की परिचालन लागत और मुकदमेबाजी के बोझ दोनों को घटा सकते हैं।
रिफंड और रिटर्न फाइलिंग में बड़े बदलाव प्रस्तावित
रिफंड प्रक्रिया को अधिक तेज और पारदर्शी बनाने के लिए प्रस्ताव है कि रिफंड आवेदन की प्राप्ति की पुष्टि 10 दिनों के भीतर की जाए। इसके साथ ही, कस्टम्स और बैंकिंग प्रणाली से प्राप्त स्वचालित डेटा के आधार पर जोखिम मूल्यांकन के बाद 90 प्रतिशत राशि शीघ्र जारी किए जाने का प्रावधान लाया जा सकता है। यदि यह लागू होता है, तो निर्यातकों और कारोबारियों की कार्यशील पूँजी पर पड़ने वाला दबाव उल्लेखनीय रूप से कम हो सकता है।
रिटर्न फाइलिंग प्रणाली में भी इनवॉइस मैचिंग को स्वचालित करने की योजना है, जिससे इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) की वैधता शुरुआती स्तर पर ही सुनिश्चित होगी और बड़ी संख्या में विसंगति नोटिसों से बचा जा सकेगा। इसके अलावा, केवल उपभोक्ताओं को सामान बेचने वाले छोटे करदाताओं को मासिक के बजाय साल में एक बार रिटर्न दाखिल करने की सुविधा मिल सकती है।
ई-कॉमर्स विक्रेताओं और सेवा निर्यातकों को राहत
वर्तमान व्यवस्था में ई-कॉमर्स विक्रेता को हर उस राज्य में पंजीकृत कार्यालय दर्ज कराना पड़ता है जहाँ वह बिक्री करता है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत गृह राज्य में एक बार सत्यापन के बाद देशभर में बिक्री की अनुमति सुगम हो सकती है, जिससे छोटे विक्रेताओं को राष्ट्रीय बाज़ार तक पहुँचने में मदद मिलेगी।
सेवा निर्यात क्षेत्र के लिए भी स्पष्टता लाने का प्रस्ताव है। यदि कोई भारतीय कंपनी विदेश स्थित अपनी शाखा के माध्यम से विदेशी ग्राहक को बिल जारी करती है, तो उसके निर्यात दर्जे पर प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा। साथ ही, भारत में किए गए टेस्टिंग, रिपेयर, सर्टिफिकेशन और रिसर्च कार्य को भी निर्यात माना जा सकेगा, भले ही संबंधित वस्तु देश से बाहर न गई हो।
आईटीसी नियमों में कारोबार-अनुकूल संशोधन
संरचनात्मक सुधारों के अंतर्गत आईटीसी के नियमों को कारोबारियों के अनुकूल बनाने का प्रस्ताव है। सूत्रों के अनुसार, यदि खरीदार के पास वैध चालान है, उसने सामान प्राप्त कर लिया है और आपूर्तिकर्ता को पूरा भुगतान कर दिया है, तो उसका टैक्स क्रेडिट सुरक्षित रहना चाहिए — भले ही आपूर्ति श्रृंखला में ऊपर किसी अन्य पक्ष ने कर जमा किया हो या नहीं। इसके अतिरिक्त, कई सामान्य कारोबारी खर्चों को आईटीसी श्रृंखला में पुनः शामिल करने पर विचार किया जा रहा है, जिससे दोहरे कराधान जैसी स्थितियों में कमी आ सकती है।
ट्रस्ट-आधारित प्रशासन और विवाद निपटान
बैठक में जीएसटी उल्लंघनों को आपराधिक प्रावधानों से बाहर लाने पर भी चर्चा संभावित है। प्रस्तावित मॉडल में कर वसूली, ब्याज और जुर्माने पर ज़ोर होगा, जबकि गिरफ्तारी जैसे कठोर प्रावधानों का उपयोग केवल गंभीर धोखाधड़ी मामलों तक सीमित रखा जा सकता है। इसी तरह, नोटिस और सुनवाई के लिए एक समान मानक अपनाने और एक निश्चित सीमा से नीचे के मामलों में नोटिस जारी न करने का प्रावधान भी लाया जा सकता है।
रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया की बात करें तो वर्तमान में कथित तौर पर लगभग 61 प्रतिशत करदाताओं को तीन कार्यदिवस के भीतर बिना किसी अधिकारी के हस्तक्षेप के जीएसटी पंजीकरण मिल जाता है। शेष मामलों में भी अनावश्यक प्रश्नों और अस्वीकृतियों को कम करने के लिए प्रक्रिया सरल किए जाने की योजना है। इसके साथ ही, यदि किसी व्यवसाय का पंजीकरण केवल प्रक्रियागत कारणों से निलंबित हुआ है, तो कमी दूर होने पर उसे स्वतः बहाल करने का प्रावधान भी प्रस्तावित है।
यह ऐसे समय में आया है जब सरकार जीएसटी व्यवस्था को अधिकांशतः डेटा और तकनीक-आधारित स्वचालन पर टिकाने की दिशा में काम कर रही है, ताकि अधिकारियों की भूमिका मुख्यतः विवेकपूर्ण निर्णय वाले मामलों तक सीमित रहे। 8 अक्टूबर 2026 की बैठक के नतीजे यह तय करेंगे कि ये प्रस्ताव किस रूप में और किस समयसीमा में लागू होंगे।