गुजरात का ₹50 करोड़ का बायोमैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम: पश्चिम एशिया संकट के बीच जैविक उर्वरकों पर बड़ा दांव
सारांश
मुख्य बातें
मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में गुजरात सरकार ने 9 अक्टूबर 2026 को एक एकीकृत बायोमैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम विकसित करने की महत्वाकांक्षी पहल की घोषणा की, जिसके तहत पाँच वर्षों में ₹50 करोड़ खर्च किए जाएंगे। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और अस्थिरता के कारण वैश्विक उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई है, और इसी पृष्ठभूमि में यह पहल जैविक उर्वरकों व जैविक कीटनाशकों को बढ़ावा देकर परंपरागत कृषि इनपुट्स पर राज्य की निर्भरता कम करने का लक्ष्य रखती है।
समझौता ज्ञापन और प्रमुख साझेदार
इस पहल के अंतर्गत गुजरात स्टेट बायोटेक्नोलॉजी मिशन (GSBTM) और आणंद कृषि विश्वविद्यालय (AAU) के बीच भावनगर में आज एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए। इस अवसर पर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री अर्जुनभाई मोढवाडिया तथा कृषि, किसान कल्याण, सहकारिता एवं पशुपालन मंत्री जीतूभाई वाघाणी उपस्थित रहे। GSBTM विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत कार्यरत है और इस पूरे इकोसिस्टम के विकास की धुरी बनेगा।
इकोसिस्टम में क्या होगा शामिल
यह एकीकृत व्यवस्था राज्य के सूक्ष्मजीव संसाधनों, कृषि विश्वविद्यालयों, बायोटेक्नोलॉजी संस्थानों, स्टार्टअप्स, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs), सहकारी संस्थाओं और किसानों को एक साझा मंच पर जोड़ेगी। इस इकोसिस्टम में सूक्ष्मजीवों की खोज, अनुसंधान, उत्पाद फॉर्मूलेशन, उत्पादन, खेत में परीक्षण और अंततः किसानों द्वारा अपनाने तक के सभी चरण शामिल होंगे — यानी एक पूर्ण 'खेत से उद्योग तक' की श्रृंखला।
इस कार्यक्रम का केंद्र चार परस्पर जुड़े घटकों पर रहेगा: जैविक उर्वरक, बायोस्टिमुलेंट्स, सूक्ष्मजीव संयोजन और अन्य जैविक प्रौद्योगिकियाँ। ये विकल्प किसानों को पोषक तत्वों के कार्यक्षम उपयोग और मिट्टी के दीर्घकालिक स्वास्थ्य को बनाए रखने में सहायक होंगे।
आणंद कृषि विश्वविद्यालय की तकनीकी ताकत
आणंद कृषि विश्वविद्यालय ने एजोटोबैक्टर, एजोस्पिरिलम, राइजोबियम, फॉस्फेट घुलनशील बैक्टीरिया और पोटेशियम गतिशील करने वाले बैक्टीरिया जैसे सूक्ष्मजीवों का उपयोग कर जैविक उर्वरकों की तकनीक विकसित और व्यावसायीकृत की है। विश्वविद्यालय ने बायो-एनपी और बायो-एनपीके सहित सूक्ष्मजीवों के संयोजन भी तैयार किए हैं।
उल्लेखनीय है कि विश्वविद्यालय ने वर्ष 2024-25 तक लगभग 42 लाख लीटर जैविक उर्वरक का उत्पादन कर बिक्री की है। इसके पास 1,000 से अधिक सूक्ष्मजीव संवर्धनों का संग्रह है तथा 148 सूक्ष्मजीव स्ट्रेन्स के डीएनए सीक्वेंस का डेटा राष्ट्रीय जैव प्रौद्योगिकी सूचना केंद्र (NCBI) के पास जमा कराया गया है — जो इस पहल की वैज्ञानिक विश्वसनीयता को रेखांकित करता है।
उर्वरक आपूर्ति की व्यापक चुनौती
गौरतलब है कि भारत में यूरिया, डीएपी (DAP), म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) और एनपीके (NPK) जैसे सब्सिडी वाले उर्वरकों की माँग और आपूर्ति के बीच समन्वय की व्यवस्था पहले से मौजूद है। लेकिन असली चुनौती केवल अधिक मात्रा में उर्वरक उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि कृषि इनपुट्स की अधिक लचीली और विविध व्यवस्था खड़ी करना है। यह पहल इसी दिशा में एक ठोस कदम है।
आगे की राह
गुजरात की यह पहल उस अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी के व्यावसायीकरण पर आधारित है जो राज्य में पहले से उपलब्ध है। यह ऐसे समय में आई है जब वैश्विक उर्वरक बाज़ार भू-राजनीतिक उथलपुथल के प्रति संवेदनशील साबित हो रहा है। परंपरागत उर्वरकों की भूमिका बनी रहेगी, लेकिन जैविक विकल्पों का समानांतर विकास राज्य को दीर्घकालिक कृषि आत्मनिर्भरता की ओर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।