सीजेआई से मिलने की मांग 'सरासर मूर्खता': हरीश साल्वे का इंडिया ब्लॉक पर कड़ा हमला
सारांश
मुख्य बातें
पूर्व सॉलिसिटर जनरल और वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने 12 अक्टूबर 2026 को कांग्रेस नेता राहुल गांधी और इंडिया ब्लॉक के नेताओं द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) से मिलने की मांग को 'सरासर मूर्खता' करार दिया। साल्वे ने कहा कि यह प्रयास सुप्रीम कोर्ट को राजनीतिक मोहरे में बदलने की सुनियोजित कोशिश है और इससे न्यायपालिका की स्वायत्तता को नुकसान पहुँचता है। लंदन से बातचीत में उन्होंने यह विचार विस्तार से साझा किए।
सीजेआई से मिलने की मांग पर साल्वे का आकलन
साल्वे ने कहा कि शुरू में उन्हें यह खबर फर्जी लगी, लेकिन जब बेंच के सदस्यों ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट करके पुष्टि की कि नेताओं ने समय माँगा था और सीजेआई ने मिलने से इनकार किया, तो वे हैरान रह गए। उन्होंने सवाल उठाया, 'इंडिया ब्लॉक में इतने वरिष्ठ वकील हैं — क्या किसी ने उन्हें नहीं बताया कि मुख्य न्यायाधीश हर मामले की सुनवाई खुद नहीं करते?'
साल्वे के अनुसार, संवैधानिक व्यवस्था में न्यायपालिका के सामने राजनीतिक दबाव की कोई जगह नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अदालत में एक निर्धारित प्रक्रिया होती है — याचिका दायर की जाती है और बेंच सुनवाई करती है। 'संविधान की लाल किताब' की बात करने वाले नेता यदि उसी संविधान की प्रक्रिया का पालन नहीं करते, तो यह विरोधाभासी है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश और प्रदर्शन का अधिकार
साल्वे ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को विशेष सुनवाई में बेहद संतुलित आदेश दिया — जहाँ जरूरत से अधिक पाबंदियाँ थीं, उन्हें हटाने का निर्देश दिया और बाकी मामला सरकार पर छोड़ दिया। उन्होंने कहा कि विपक्ष चाहता था कि अदालत सभी बैरिकेड हटा दे और लोगों को दिल्ली में प्रवेश की अनुमति दे, जो संभव नहीं था।
उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रदर्शन का अधिकार लागू पुलिस कानून के अधीन है — यह कानून से ऊपर नहीं है। यदि पुलिस अनुमति से इनकार करे, तो उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत चुनौती दी जा सकती है, लेकिन स्वयं निर्णय लेकर पाबंदियाँ तोड़ना संवैधानिक नहीं है।
न्यायपालिका पर भरोसे का सवाल और कपिल सिब्बल प्रकरण
साल्वे ने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल के न्यायपालिका पर भरोसे उठने संबंधी बयान पर कड़ी टिप्पणी की। उनका कहना था कि किसी फैसले से असहमति और न्यायपालिका पर भरोसा खोना — ये दो बिल्कुल अलग बातें हैं। उन्होंने कहा, 'न्यायपालिका पर अविश्वास का अर्थ यह है कि न्यायाधीश जानबूझकर गलत फैसले दे रहे हैं — यदि ऐसा नहीं कहना चाहते, तो स्पष्ट करना चाहिए।'
उन्होंने प्रसिद्ध कहावत उद्धृत की: 'वे सही होने के कारण अंतिम नहीं हैं, बल्कि अंतिम होने के कारण सही हैं।' साल्वे ने कहा कि 45 वर्षों से अधिक की वकालत में उन्होंने कभी ऐसी सोच नहीं देखी जिसमें नेता इस तरह मुख्य न्यायाधीश से मिलने की माँग करते हों।
मुख्य चुनाव आयुक्त और संवैधानिक प्रक्रिया
साल्वे ने कहा कि अखबार की एक रिपोर्ट के आधार पर इतना हंगामा खड़ा किया गया, जबकि लगभग 10 दिनों में अदालत में मामला आने वाला है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) को पद से नहीं हटा सकता — इसके लिए संवैधानिक प्रक्रिया, जिसमें महाभियोग भी शामिल है, का पालन करना होगा। त्योहारी मौसम में दिल्ली के दुकानदारों और आम नागरिकों को परेशान करने पर उन्होंने चिंता जताई।
विदेशी फंडिंग और व्यापक पैटर्न पर साल्वे का आरोप
साल्वे ने यह आरोप लगाया — और इसे अपना व्यक्तिगत मत बताया — कि इन प्रदर्शनों को विदेशी धन और बाहरी प्रेरणा मिल रही है। उन्होंने नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश की राजनीतिक उथल-पुथल का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत में भी पिछले छह से आठ महीनों में एक स्पष्ट पैटर्न दिखा है। उनके अनुसार, यूट्यूबर और विदेशों में रहने वाले कुछ व्यक्ति इन आंदोलनों के लिए वित्त पोषण कर रहे हैं।
साल्वे ने कहा कि वे इसे जनता का वास्तविक आंदोलन नहीं मानते और उन्हें विश्वास है कि यह अधिक समय तक नहीं चलेगा। उन्होंने सरकार से इन गतिविधियों की जाँच और कानूनी कार्रवाई की अपेक्षा व्यक्त की। संस्थाओं की रक्षा करना और उन्हें राजनीतिक दुरुपयोग से बचाना — यही लोकतंत्र की असली कसौटी है, यह उनका अंतिम संदेश था।