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सीजेआई से मिलने की मांग 'सरासर मूर्खता': हरीश साल्वे का इंडिया ब्लॉक पर कड़ा हमला

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सीजेआई से मिलने की मांग 'सरासर मूर्खता': हरीश साल्वे का इंडिया ब्लॉक पर कड़ा हमला

सारांश

पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने लंदन से बातचीत में इंडिया ब्लॉक की सीजेआई से मिलने की मांग को 'सरासर मूर्खता' बताया। 45 वर्षों की वकालत में उन्होंने ऐसी सोच नहीं देखी। उनका आरोप — प्रदर्शनों के पीछे विदेशी फंडिंग है और यह जनता का नहीं, राजनीतिक आंदोलन है।

मुख्य बातें

पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने इंडिया ब्लॉक की सीजेआई से मिलने की मांग को 'सरासर मूर्खता' और सुप्रीम कोर्ट को राजनीतिक मोहरा बनाने की कोशिश बताया।
साल्वे ने कहा कि 45 वर्षों से अधिक की वकालत में उन्होंने इस तरह की राजनीतिक सोच पहले कभी नहीं देखी।
कपिल सिब्बल के न्यायपालिका पर अविश्वास वाले बयान पर साल्वे ने कहा — किसी फैसले से असहमति और न्यायपालिका पर भरोसा खोना दो अलग बातें हैं।
सुप्रीम कोर्ट सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त को नहीं हटा सकता — इसके लिए संवैधानिक प्रक्रिया जरूरी है।
साल्वे ने व्यक्तिगत आरोप लगाया कि प्रदर्शनों को विदेशी फंडिंग मिल रही है और यह पिछले छह से आठ महीनों से जारी पैटर्न का हिस्सा है।

पूर्व सॉलिसिटर जनरल और वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने 12 अक्टूबर 2026 को कांग्रेस नेता राहुल गांधी और इंडिया ब्लॉक के नेताओं द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) से मिलने की मांग को 'सरासर मूर्खता' करार दिया। साल्वे ने कहा कि यह प्रयास सुप्रीम कोर्ट को राजनीतिक मोहरे में बदलने की सुनियोजित कोशिश है और इससे न्यायपालिका की स्वायत्तता को नुकसान पहुँचता है। लंदन से बातचीत में उन्होंने यह विचार विस्तार से साझा किए।

सीजेआई से मिलने की मांग पर साल्वे का आकलन

साल्वे ने कहा कि शुरू में उन्हें यह खबर फर्जी लगी, लेकिन जब बेंच के सदस्यों ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट करके पुष्टि की कि नेताओं ने समय माँगा था और सीजेआई ने मिलने से इनकार किया, तो वे हैरान रह गए। उन्होंने सवाल उठाया, 'इंडिया ब्लॉक में इतने वरिष्ठ वकील हैं — क्या किसी ने उन्हें नहीं बताया कि मुख्य न्यायाधीश हर मामले की सुनवाई खुद नहीं करते?'

साल्वे के अनुसार, संवैधानिक व्यवस्था में न्यायपालिका के सामने राजनीतिक दबाव की कोई जगह नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अदालत में एक निर्धारित प्रक्रिया होती है — याचिका दायर की जाती है और बेंच सुनवाई करती है। 'संविधान की लाल किताब' की बात करने वाले नेता यदि उसी संविधान की प्रक्रिया का पालन नहीं करते, तो यह विरोधाभासी है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश और प्रदर्शन का अधिकार

साल्वे ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को विशेष सुनवाई में बेहद संतुलित आदेश दिया — जहाँ जरूरत से अधिक पाबंदियाँ थीं, उन्हें हटाने का निर्देश दिया और बाकी मामला सरकार पर छोड़ दिया। उन्होंने कहा कि विपक्ष चाहता था कि अदालत सभी बैरिकेड हटा दे और लोगों को दिल्ली में प्रवेश की अनुमति दे, जो संभव नहीं था।

उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रदर्शन का अधिकार लागू पुलिस कानून के अधीन है — यह कानून से ऊपर नहीं है। यदि पुलिस अनुमति से इनकार करे, तो उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत चुनौती दी जा सकती है, लेकिन स्वयं निर्णय लेकर पाबंदियाँ तोड़ना संवैधानिक नहीं है।

न्यायपालिका पर भरोसे का सवाल और कपिल सिब्बल प्रकरण

साल्वे ने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल के न्यायपालिका पर भरोसे उठने संबंधी बयान पर कड़ी टिप्पणी की। उनका कहना था कि किसी फैसले से असहमति और न्यायपालिका पर भरोसा खोना — ये दो बिल्कुल अलग बातें हैं। उन्होंने कहा, 'न्यायपालिका पर अविश्वास का अर्थ यह है कि न्यायाधीश जानबूझकर गलत फैसले दे रहे हैं — यदि ऐसा नहीं कहना चाहते, तो स्पष्ट करना चाहिए।'

उन्होंने प्रसिद्ध कहावत उद्धृत की: 'वे सही होने के कारण अंतिम नहीं हैं, बल्कि अंतिम होने के कारण सही हैं।' साल्वे ने कहा कि 45 वर्षों से अधिक की वकालत में उन्होंने कभी ऐसी सोच नहीं देखी जिसमें नेता इस तरह मुख्य न्यायाधीश से मिलने की माँग करते हों।

मुख्य चुनाव आयुक्त और संवैधानिक प्रक्रिया

साल्वे ने कहा कि अखबार की एक रिपोर्ट के आधार पर इतना हंगामा खड़ा किया गया, जबकि लगभग 10 दिनों में अदालत में मामला आने वाला है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) को पद से नहीं हटा सकता — इसके लिए संवैधानिक प्रक्रिया, जिसमें महाभियोग भी शामिल है, का पालन करना होगा। त्योहारी मौसम में दिल्ली के दुकानदारों और आम नागरिकों को परेशान करने पर उन्होंने चिंता जताई।

विदेशी फंडिंग और व्यापक पैटर्न पर साल्वे का आरोप

साल्वे ने यह आरोप लगाया — और इसे अपना व्यक्तिगत मत बताया — कि इन प्रदर्शनों को विदेशी धन और बाहरी प्रेरणा मिल रही है। उन्होंने नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश की राजनीतिक उथल-पुथल का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत में भी पिछले छह से आठ महीनों में एक स्पष्ट पैटर्न दिखा है। उनके अनुसार, यूट्यूबर और विदेशों में रहने वाले कुछ व्यक्ति इन आंदोलनों के लिए वित्त पोषण कर रहे हैं।

साल्वे ने कहा कि वे इसे जनता का वास्तविक आंदोलन नहीं मानते और उन्हें विश्वास है कि यह अधिक समय तक नहीं चलेगा। उन्होंने सरकार से इन गतिविधियों की जाँच और कानूनी कार्रवाई की अपेक्षा व्यक्त की। संस्थाओं की रक्षा करना और उन्हें राजनीतिक दुरुपयोग से बचाना — यही लोकतंत्र की असली कसौटी है, यह उनका अंतिम संदेश था।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह एकतरफा है — वे सरकार की ओर से न्यायपालिका के इस्तेमाल के इतिहास पर चुप्पी साधते हैं। विदेशी फंडिंग का आरोप उनका व्यक्तिगत मत है, जिसका कोई सत्यापित साक्ष्य इस बातचीत में प्रस्तुत नहीं किया गया। असली सवाल यह है कि जब संस्थाएं राजनीतिक दलों के अनुकूल फैसले देती हैं तो सभी चुप रहते हैं, और जब प्रतिकूल फैसले आते हैं तो भरोसे का संकट उठता है — यह प्रवृत्ति सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों में समान रूप से दिखती है।
RashtraPress
12 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हरीश साल्वे ने इंडिया ब्लॉक की सीजेआई से मिलने की मांग को क्यों गलत बताया?
साल्वे के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश हर मामले की सुनवाई स्वयं नहीं करते — वे मामला संबंधित बेंच को सौंपते हैं। उनका कहना था कि इतने वरिष्ठ वकीलों वाली पार्टी को यह बुनियादी तथ्य पता होना चाहिए और न्यायपालिका के सामने इस तरह की राजनीतिक मांग रखना संवैधानिक प्रक्रिया के विरुद्ध है।
साल्वे ने कपिल सिब्बल के न्यायपालिका पर अविश्वास वाले बयान पर क्या कहा?
साल्वे ने स्पष्ट किया कि किसी फैसले से असहमति और न्यायपालिका पर भरोसा खोना दो बिल्कुल अलग बातें हैं। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका पर अविश्वास का अर्थ है कि न्यायाधीश जानबूझकर गलत फैसले दे रहे हैं, और यदि ऐसा नहीं कहना है तो स्पष्टीकरण देना जरूरी है।
क्या सुप्रीम कोर्ट मुख्य चुनाव आयुक्त को सीधे हटा सकता है?
नहीं। साल्वे ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से नहीं हटा सकता। इसके लिए संवैधानिक प्रक्रिया, जिसमें महाभियोग भी शामिल है, अपनानी होगी। अदालत सीईसी के फैसलों और प्रक्रिया की वैधता की जाँच कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शनकारियों के संबंध में क्या आदेश दिया?
साल्वे के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने रविवार की विशेष सुनवाई में संतुलित आदेश दिया — जहाँ अनावश्यक पाबंदियाँ थीं वहाँ राहत दी, और स्पष्ट किया कि प्रदर्शन का अधिकार किसी को कानून से ऊपर नहीं बनाता।
साल्वे ने विदेशी फंडिंग के आरोप के बारे में क्या कहा?
साल्वे ने इसे अपना व्यक्तिगत मत बताते हुए आरोप लगाया कि प्रदर्शनों को विदेशी धन और बाहरी प्रेरणा मिल रही है। उन्होंने कहा कि पिछले छह से आठ महीनों में एक स्पष्ट पैटर्न दिखा है और उन्हें उम्मीद है कि इसकी जाँच होगी। हालाँकि, इस बातचीत में उन्होंने कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया।
राष्ट्र प्रेस
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