12 अक्टूबर 2026
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हरीश साल्वे का कपिल सिब्बल पर पलटवार: सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंतिम, न्यायपालिका पर अविश्वास अलग बात

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हरीश साल्वे का कपिल सिब्बल पर पलटवार: सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंतिम, न्यायपालिका पर अविश्वास अलग बात

सारांश

पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने कपिल सिब्बल के 'न्यायपालिका से भरोसा उठ गया' वाले बयान को पेशेवर आचरण के विरुद्ध बताया। साल्वे का साफ संदेश — किसी फैसले से नाराजगी और पूरी संस्था पर अविश्वास एक नहीं है, और संवैधानिक ढाँचे को कमजोर करना किसी के भी हित में नहीं।

मुख्य बातें

पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने 12 अक्टूबर 2026 को लंदन से कपिल सिब्बल के न्यायपालिका पर अविश्वास जताने वाले बयान की आलोचना की।
साल्वे ने कहा — सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंतिम होता है , भले ही किसी को वह गलत लगे।
उन्होंने फैसले की आलोचना और न्यायपालिका पर संस्थागत अविश्वास को दो अलग-अलग बातें बताया।
साल्वे ने चुनाव आयोग और न्यायपालिका सहित संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर न करने की अपील की।
उन्होंने कहा कि 'मेरा सच — तुम्हारा सच' की सोच लोकतंत्र के लिए घातक है।

पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने 12 अक्टूबर 2026 को लंदन से वरिष्ठ अधिवक्ता एवं राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल के उस बयान की कड़ी आलोचना की, जिसमें सिब्बल ने कहा था कि उनका न्यायपालिका से भरोसा उठ गया है। साल्वे ने स्पष्ट किया कि किसी एक फैसले से निराश होना और पूरी न्यायपालिका पर अविश्वास जताना दो बिल्कुल अलग-अलग बातें हैं।

साल्वे का सीधा जवाब

साल्वे ने कहा, 'अगर मेरा न्यायपालिका पर भरोसा न हो, तो मैं खुद अदालत में पेश नहीं होऊंगा।' उन्होंने तर्क दिया कि जो वकील अदालत में जाकर फैसला माँगे और फैसला प्रतिकूल आने पर भरोसा उठ जाने की बात करे, वह पेशेवर आचरण के विपरीत है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें यही सिखाया गया था कि ऐसी सार्वजनिक टिप्पणियाँ नहीं की जानी चाहिए।

साल्वे ने संस्थागत अविश्वास और फैसले की आलोचना के बीच का फर्क रेखांकित करते हुए कहा, 'आप कह सकते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आपको निराशाजनक लगा या आपके अनुसार वह गलत है।' उन्होंने माना कि न्यायाधीशों से भी गलतियाँ हो सकती हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंतिम होता है — भले ही किसी को वह गलत लगे।

न्यायपालिका पर अविश्वास का संकेत क्यों खतरनाक

साल्वे ने चेताया कि यह कहना कि 'न्यायपालिका से भरोसा उठ गया' — इससे यह संदेश जाता है कि न्यायपालिका जानबूझकर गलत फैसले दे रही है। उन्होंने कहा कि यदि किसी का यह आशय नहीं है, तो उसे स्पष्ट करना चाहिए कि वह केवल किसी खास फैसले से नाखुश है — पूरी संस्था पर सवाल नहीं उठा रहा।

यह बयान ऐसे समय में आया है जब विपक्षी दलों — विशेषकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) — पर चुनाव आयोग और न्यायपालिका सहित संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर बार-बार सवाल उठाने के आरोप लगते रहे हैं।

संस्थाओं को कमजोर न करने की अपील

कांग्रेस द्वारा चुनाव आयोग और न्यायपालिका पर निरंतर उठाए जा रहे सवालों पर साल्वे ने कहा, 'आज भारत में एक सरकार है और भविष्य में दूसरी सरकारें भी आएंगी।' उन्होंने याद दिलाया कि पहले कांग्रेस की सरकार थी और भविष्य में भी उसके सत्ता में आने की संभावना है — ऐसे में संस्थागत ढाँचे को कमजोर करना किसी के हित में नहीं।

साल्वे ने कहा कि संविधान ने न्यायपालिका, विधायिका, निर्वाचित कार्यपालिका और चुनाव आयोग जैसी अलग-अलग संस्थाएँ नियंत्रण एवं संतुलन की व्यवस्था के लिए बनाई हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि हर असहमत व्यक्ति को 'राजनीतिक रूप से प्रेरित' या 'समझौता किया हुआ' कहा जाने लगे, तो विचारों का वास्तविक आदान-प्रदान समाप्त हो जाता है।

लोकतंत्र और 'मेरा सच — तुम्हारा सच' की सोच

साल्वे ने एक तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि जिस विचारधारा में 'जो मुझसे सहमत है वह अच्छा, जो असहमत है वह बुरा' — यह सोच लोकतंत्र के लिए घातक है। उनका यह बयान राजनीतिक विमर्श में बढ़ती ध्रुवीकरण की प्रवृत्ति पर एक व्यापक टिप्पणी के रूप में भी देखा जा रहा है।

गौरतलब है कि साल्वे देश के प्रतिष्ठित विधिवेत्ताओं में गिने जाते हैं और उनकी यह प्रतिक्रिया कानूनी और संवैधानिक हलकों में व्यापक चर्चा का विषय बन गई है। आने वाले दिनों में इस बहस के और तेज होने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसकी गहरी राजनीतिक परत है। जब विपक्ष हर प्रतिकूल फैसले पर संस्था की विश्वसनीयता को कटघरे में खड़ा करे, तो यह नैरेटिव धीरे-धीरे जन-मानस में संस्थागत अविश्वास की जड़ें जमाता है। साल्वे का यह मुद्दा उठाना सही है, पर एक पहलू अनदेखा रहता है — न्यायपालिका की स्वायत्तता की रक्षा का तर्क तभी पूर्ण होता है जब संस्थाएँ स्वयं भी पारदर्शिता और जवाबदेही के मानकों पर खरी उतरें। आलोचना को 'अविश्वास' बताकर खारिज करने की प्रवृत्ति भी लोकतांत्रिक विमर्श को संकुचित कर सकती है।
RashtraPress
12 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हरीश साल्वे ने कपिल सिब्बल के बयान की आलोचना क्यों की?
हरीश साल्वे ने कपिल सिब्बल के 'न्यायपालिका से भरोसा उठ गया' वाले बयान को पेशेवर आचरण के विरुद्ध बताया। उनका तर्क है कि जो वकील अदालत में जाकर फैसला माँगे, वह प्रतिकूल फैसले पर पूरी संस्था पर अविश्वास नहीं जता सकता।
साल्वे के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के फैसले की क्या स्थिति होती है?
साल्वे के अनुसार सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंतिम होता है — भले ही किसी को वह गलत लगे। उन्होंने स्वीकार किया कि न्यायाधीशों से गलतियाँ हो सकती हैं और फैसले से असहमति जताना उचित है, लेकिन यह संस्थागत अविश्वास से अलग है।
न्यायपालिका पर भरोसा और फैसले की आलोचना में क्या अंतर है?
साल्वे के मुताबिक फैसले की आलोचना का अर्थ है कि आप किसी खास निर्णय से असहमत हैं और अपने तर्क रख सकते हैं। न्यायपालिका पर अविश्वास का अर्थ है कि संस्था जानबूझकर गलत फैसले दे रही है — यह कहीं अधिक गंभीर आरोप है।
साल्वे ने कांग्रेस के संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाने पर क्या कहा?
साल्वे ने कहा कि भविष्य में कोई भी पार्टी सत्ता में आ सकती है, इसलिए संस्थागत ढाँचे को कमजोर करना किसी के हित में नहीं। उन्होंने अपील की कि चुनाव आयोग, न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाओं में जनता का भरोसा बनाए रखना जरूरी है।
साल्वे का यह बयान किस संदर्भ में आया है?
यह बयान उस पृष्ठभूमि में आया है जब विपक्षी दल — विशेषकर कांग्रेस — चुनाव आयोग और न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर बार-बार सवाल उठाते रहे हैं। साल्वे ने 12 अक्टूबर 2026 को लंदन से यह प्रतिक्रिया दी।
राष्ट्र प्रेस
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