हार्वर्ड के 50 से अधिक लोगों ने भारत की संवैधानिक संस्थाओं पर हमले को लेकर साझा बयान जारी किया
सारांश
मुख्य बातें
हार्वर्ड विश्वविद्यालय से जुड़े 50 से अधिक वकीलों, नीति निर्माताओं, सिविल सेवकों, वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों ने 14 अक्टूबर 2026 को एक साझा बयान जारी कर भारत की संवैधानिक संस्थाओं के विरुद्ध चल रहे कथित नकारात्मक अभियान पर गहरी चिंता व्यक्त की है। बयान में स्पष्ट किया गया है कि असहमति एक लोकतांत्रिक अधिकार है, किंतु बिना प्रमाण के संस्थागत विश्वसनीयता को कमज़ोर करना स्वीकार्य नहीं है।
बयान की पृष्ठभूमि
हस्ताक्षरकर्ताओं ने स्वयं को भारत के चिंतित नागरिकों के रूप में प्रस्तुत किया है और कहा है कि दुनिया के सबसे पुराने एवं सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रति जिम्मेदारी की गहरी भावना के साथ यह बयान लिखा गया है। उनके अनुसार ऐसे समय में चुप्पी उदासीनता का बहाना नहीं बन सकती।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत की न्यायपालिका और चुनावी संस्थाओं को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बहस तेज़ हो रही है। गौरतलब है कि हार्वर्ड जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के नाम का राजनीतिक विमर्श में उपयोग एक संवेदनशील प्रश्न बन गया है।
किन संस्थाओं की चिंता जताई गई
बयान में भारत के चुनाव आयोग (ECI), सर्वोच्च न्यायालय, भारत के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय और संसद के विरुद्ध नकारात्मक सार्वजनिक विमर्श और संगठित अभियान पर विशेष आपत्ति दर्ज की गई है। साथ ही, हार्वर्ड विश्वविद्यालय के नाम का बिना उचित अनुमति के किसी राजनीतिक अभियान को विश्वसनीयता देने के लिए उपयोग किए जाने की खबरों को भी परेशान करने वाला बताया गया है।
भाषा और अभियान पर आपत्ति
हस्ताक्षरकर्ताओं ने कहा कि भारत को 'घेराबंदी' में बताने तथा संवैधानिक अधिकारियों को 'चोर' या 'समझौता किया हुआ' जैसे शब्दों से संबोधित करने की भाषा लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के भरोसे को कमज़ोर करने के इरादे को लेकर गंभीर चिंता उत्पन्न करती है। बयान में यह भी रेखांकित किया गया कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों की कार्रवाइयों की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए, परंतु व्यापक आरोप और अपमानजनक बयानबाज़ी साक्ष्य, उचित प्रक्रिया या संस्थागत जवाबदेही का विकल्प नहीं हो सकती।
बयान में आगे जोड़ा गया कि लोक सेवकों और उनके पदों की गरिमा का सम्मान किया जाना चाहिए।
मूल प्रतिबद्धता का आह्वान
हस्ताक्षरकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि संविधान, कानून के शासन और नागरिक स्वतंत्रता का सम्मान हर परिस्थिति में होना चाहिए — न केवल तब जब यह किसी के हित में हो। उन्होंने कहा, 'हमारी प्रतिबद्धता सुविधा के लिए नहीं, बल्कि संविधान के प्रति; चुनिंदा आक्रोश के लिए नहीं, बल्कि न्याय के प्रति; और आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति के लिए नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति बनी रहनी चाहिए।'
हस्ताक्षरकर्ता कौन हैं
इस बयान पर हार्वर्ड मेडिकल स्कूल, हार्वर्ड कैनेडी स्कूल, हार्वर्ड लॉ स्कूल और हार्वर्ड बिजनेस स्कूल सहित विभिन्न विभागों के 50 से अधिक लोगों ने हस्ताक्षर किए हैं। इनमें ए के राघवन, अभिग्यान सत्यम, अभिषेक एम, अधित्य श्रीनिवासन, आदित्य कुलश्रेष्ठ, आकाश सबरवाल, अलमास लोखंडवाला और अन्य प्रमुख नाम शामिल हैं।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि भारत सरकार और राजनीतिक दल इस अंतरराष्ट्रीय बयान पर किस तरह की प्रतिक्रिया देते हैं।