19 अक्टूबर 2026
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'स्पेयर इंडिया फ्रॉम एनार्की': 27 देशों के 402 भारतीय मूल के विद्वानों ने संवैधानिक संस्थाओं पर हमले के खिलाफ आवाज़ उठाई

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'स्पेयर इंडिया फ्रॉम एनार्की': 27 देशों के 402 भारतीय मूल के विद्वानों ने संवैधानिक संस्थाओं पर हमले के खिलाफ आवाज़ उठाई

सारांश

दुनिया के 27 देशों में बसे 402 भारतीय मूल के विद्वानों ने 'स्पेयर इंडिया फ्रॉम एनार्की' बयान जारी कर संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास फैलाने और सड़क-आधारित आंदोलनों के ज़रिये लोकतंत्र को कमज़ोर करने के प्रयासों पर गहरी चिंता जताई है। MIT, ऑक्सफोर्ड, हार्वर्ड जैसे शीर्ष संस्थानों से जुड़े इन विद्वानों ने डॉ. अंबेडकर की चेतावनी को याद दिलाते हुए संवैधानिक तरीकों से मतभेद सुलझाने की अपील की।

मुख्य बातें

27 देशों के 402 भारतीय मूल के छात्रों, शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों ने 19 अक्टूबर 2026 को 'स्पेयर इंडिया फ्रॉम एनार्की' शीर्षक से संयुक्त बयान जारी किया।
बयान में संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास फैलाने और सड़क-आधारित आंदोलनों के ज़रिये लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमज़ोर करने पर चिंता जताई गई।
हस्ताक्षरकर्ताओं में MIT, ऑक्सफोर्ड, हार्वर्ड, येल, स्टैनफोर्ड, कैम्ब्रिज, प्रिंसटन और LSE सहित दर्जनों प्रतिष्ठित संस्थानों के विद्वान शामिल हैं।
बयान में सशस्त्र सेनाओं को राजनीतिक विमर्श में खींचे जाने को 'अनुचित' बताया गया।
भीमराव अंबेडकर की उस चेतावनी का उल्लेख किया गया जिसमें उन्होंने संवैधानिक तरीकों को अपनाने और अराजकता से बचने का आह्वान किया था।
सभी राजनीतिक-सामाजिक शक्तियों से अपील की गई कि मतभेद संवाद, बहस और संवैधानिक माध्यमों से सुलझाए जाएँ।

27 देशों में अध्ययन और शोध कर रहे 402 भारतीय मूल के छात्रों, शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों और पूर्व छात्रों ने 19 अक्टूबर 2026 को 'स्पेयर इंडिया फ्रॉम एनार्की' (भारत को अराजकता से बचाइए) शीर्षक से एक संयुक्त बयान जारी किया। इस बयान में भारत की लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास उत्पन्न करने के प्रयासों तथा लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमज़ोर करने के लिए सड़क-आधारित आंदोलनों के इस्तेमाल पर गंभीर चिंता जताई गई है।

बयान की मुख्य बातें

हस्ताक्षरकर्ताओं ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद से भारतीय लोकतंत्र ने बार-बार अपनी मज़बूती और स्थिरता साबित की है। उनके अनुसार, संवैधानिक संस्थाएँ लगातार सशक्त हुई हैं, नियंत्रण एवं संतुलन की व्यवस्था प्रभावी रही है और सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण भारतीय लोकतंत्र की प्रमुख पहचान बनी हुई है।

बयान में आरोप लगाया गया है कि हाल के वर्षों में चुनावी परिणामों को नकारने, संवैधानिक संस्थाओं पर निरंतर सवाल उठाने और संसद की बजाय सड़क को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति कुछ वर्गों में बढ़ी है। हस्ताक्षरकर्ताओं के अनुसार, प्रतिकूल चुनावी नतीजों के बाद चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर और न्यायालयों के प्रतिकूल फैसलों के बाद न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठाए जाते हैं।

सशस्त्र सेनाओं का राजनीतिकरण — एक अलग चिंता

बयान में विशेष रूप से उल्लेख किया गया कि देश की सबसे गैर-राजनीतिक संस्था मानी जाने वाली सशस्त्र सेनाओं को भी कथित तौर पर अनुचित ढंग से राजनीतिक विमर्श में खींचा जा रहा है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने चेतावनी दी कि 'लोकतंत्र बचाने' के नाम पर भारतीय संस्थाओं के प्रति संदेह की भावना फैलाना और लंबित न्यायिक मामलों का राजनीतिक उपयोग करना, दोनों ही संवैधानिक व्यवस्था के लिए हानिकारक हैं।

डॉ. अंबेडकर की चेतावनी का संदर्भ

छात्रों और शिक्षाविदों ने संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी थी — भारत को एक संवैधानिक गणतंत्र के रूप में बनाए रखने के लिए संवैधानिक तरीकों को अपनाना होगा और अराजकता की राह से बचना होगा। बयान में यह भी रेखांकित किया गया कि असहमति लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा है, लेकिन लोकतंत्र के नाम पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को ही कमज़ोर करना स्वीकार्य नहीं है।

हस्ताक्षरकर्ताओं की पृष्ठभूमि

इस संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर करने वाले विद्वान अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड, आयरलैंड, इटली, स्पेन, स्वीडन, नॉर्वे, पोलैंड, यूक्रेन, रूस, दक्षिण कोरिया, जापान, सिंगापुर, मलेशिया, इज़राइल, यूएई, कज़ाकिस्तान, जॉर्जिया और फिलीपींस सहित 27 देशों से जुड़े हैं।

हस्ताक्षरकर्ताओं में MIT, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, प्रिंसटन विश्वविद्यालय, हार्वर्ड विश्वविद्यालय, येल विश्वविद्यालय, स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय, कोलंबिया विश्वविद्यालय, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर, सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी, मैनचेस्टर विश्वविद्यालय और टोरंटो विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़े लोग शामिल हैं।

अपील और आगे की राह

बयान में सभी सामाजिक और राजनीतिक शक्तियों से अपील की गई है कि मतभेदों को संवाद, बहस, चर्चा और संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से सुलझाया जाए। हस्ताक्षरकर्ताओं ने उम्मीद जताई कि भारत दुनिया के सामने सही कारणों से एक सकारात्मक लोकतांत्रिक उदाहरण प्रस्तुत करेगा। यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को लेकर व्यापक बहस जारी है, और प्रवासी भारतीय समुदाय की यह सामूहिक आवाज़ भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में एक नई बहस को जन्म दे सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

इसमें जिन प्रवृत्तियों की आलोचना की गई है — चुनावी नतीजे नकारना, न्यायपालिका पर हमले, सड़क की राजनीति — वे किसी एक पक्ष तक सीमित नहीं हैं। लेकिन मुख्यधारा की कवरेज जो चूक जाती है वह यह है: MIT से LSE तक के इन विद्वानों की साख उनकी बात को एक अलग वज़न देती है, और यह बयान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि से जुड़े सवाल उठाता है। असली परीक्षण यह है कि क्या देश के भीतर राजनीतिक वर्ग इस आवाज़ को गंभीरता से लेगा या इसे 'बाहरी हस्तक्षेप' कहकर खारिज करेगा।
RashtraPress
19 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'स्पेयर इंडिया फ्रॉम एनार्की' बयान क्या है?
यह 19 अक्टूबर 2026 को जारी एक संयुक्त बयान है जिस पर 27 देशों के 402 भारतीय मूल के छात्रों, शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों ने हस्ताक्षर किए हैं। इसमें भारत की संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास फैलाने और सड़क-आधारित आंदोलनों के ज़रिये लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमज़ोर करने के प्रयासों पर चिंता व्यक्त की गई है।
इस बयान पर हस्ताक्षर करने वाले विद्वान किन संस्थानों से जुड़े हैं?
हस्ताक्षरकर्ताओं में MIT, ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज, हार्वर्ड, येल, स्टैनफोर्ड, प्रिंसटन, कोलंबिया, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर, सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी, मैनचेस्टर विश्वविद्यालय और टोरंटो विश्वविद्यालय जैसे शीर्ष संस्थानों के लोग शामिल हैं। ये सभी 27 देशों में कार्यरत या अध्ययनरत हैं।
बयान में किन प्रवृत्तियों की आलोचना की गई है?
बयान में चुनावी परिणामों को नकारने, न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठाने, सशस्त्र सेनाओं को राजनीतिक विमर्श में खींचने और लंबित न्यायिक मामलों के राजनीतिक इस्तेमाल की आलोचना की गई है। हस्ताक्षरकर्ताओं का कहना है कि संसद की बजाय सड़क को प्राथमिकता देना संवैधानिक व्यवस्था के लिए हानिकारक है।
डॉ. अंबेडकर का इस बयान में उल्लेख क्यों किया गया?
हस्ताक्षरकर्ताओं ने संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर की उस ऐतिहासिक चेतावनी को उद्धृत किया जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत को संवैधानिक गणतंत्र बनाए रखने के लिए संवैधानिक तरीके अपनाने होंगे और अराजकता से बचना होगा। यह संदर्भ बयान को वैचारिक आधार देता है।
इस बयान में सभी पक्षों से क्या अपील की गई है?
बयान में सभी सामाजिक और राजनीतिक शक्तियों से अपील की गई है कि मतभेदों को संवाद, बहस, चर्चा और संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से सुलझाया जाए। हस्ताक्षरकर्ताओं ने उम्मीद जताई कि सभी पक्ष विवेकपूर्ण मार्ग अपनाएंगे और भारत दुनिया के सामने एक सकारात्मक लोकतांत्रिक उदाहरण बनकर उभरेगा।
राष्ट्र प्रेस
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