सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर को वैध ठहराया, एनडीए नेताओं ने कहा — विपक्ष फैला रहा था भ्रम
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 28 मई 2025 को भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के निर्णय को संवैधानिक रूप से वैध करार दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि एसआईआर चुनाव निकाय की संवैधानिक और वैधानिक शक्तियों के दायरे में है तथा इसका उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया की अखंडता सुनिश्चित करना है। इस फैसले के बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के नेताओं ने एकस्वर में प्रतिक्रिया दी और विपक्ष पर भ्रम फैलाने का आरोप लगाया।
मुख्य घटनाक्रम
BJP के वरिष्ठ नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा, 'एसआईआर कोई नई योजना नहीं है जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरू किया हो। यह एक सतत प्रक्रिया है। यह सच्चे और निष्ठावान नागरिकों के लिए 100 फीसदी सुरक्षित है।' उन्होंने जोड़ा कि कुछ लोग हर मुद्दे पर भ्रम की स्थिति पैदा करते हैं और अदालत बार-बार ऐसे लोगों को आगाह करती रही है।
केंद्रीय मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने कहा कि चुनाव आयोग स्वतंत्र संस्था है और सर्वोच्च न्यायालय ने उसके अधिकार को अपनी स्वीकृति दे दी है। उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाया कि उनकी कमज़ोरी यह है कि वे फर्जी मतदान में लिप्त थे — यहाँ तक कि मृत व्यक्तियों के नाम पर भी मत डाले गए।
राज्य मंत्रियों की प्रतिक्रिया
उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री दानिश आज़ाद अंसारी ने एसआईआर को लोकतांत्रिक ढाँचे को मज़बूत करने का सुधारात्मक प्रयास बताया। उन्होंने कहा, 'इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को संशोधित और अद्यतन करना है — जिसमें डुप्लिकेट प्रविष्टियाँ, स्थानांतरित या मृत मतदाताओं के नाम हटाना और त्रुटियाँ सुधारना शामिल है।' उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष ने राजनीतिक लाभ के लिए इस मुद्दे पर भ्रम फैलाने की कोशिश की, जो दुर्भाग्यपूर्ण है।
बिहार सरकार के मंत्री दीपक प्रकाश ने कहा कि मतदाता सूची में संशोधन पूरी तरह नियमित कार्य है। उन्होंने कहा कि विपक्ष ने बिहार में भी इसे चुनावी मुद्दा बनाने की बार-बार कोशिश की, लेकिन 'परिणाम सबके सामने हैं।'
धार्मिक संगठन की राय
अखिल भारतीय शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने कहा कि वे एसआईआर पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का सम्मान करते हैं और सभी को इस फैसले का स्वागत करना चाहिए।
एसआईआर का उद्देश्य और विपक्ष का रुख
गौरतलब है कि एसआईआर प्रक्रिया के तहत मतदाता सूचियों से फर्जी, दोहरी और मृत व्यक्तियों की प्रविष्टियाँ हटाई जाती हैं। विपक्षी दलों ने इस प्रक्रिया को लेकर न्यायालय में याचिकाएँ दायर की थीं, जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया। आलोचकों का कहना है कि एसआईआर की समय-सीमा और क्रियान्वयन को लेकर पारदर्शिता की माँग उचित है, जबकि सत्तापक्ष इसे राजनीति से प्रेरित बताता है।
आगे की राह
सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद भारत निर्वाचन आयोग को एसआईआर जारी रखने का स्पष्ट कानूनी आधार मिल गया है। अब देखना यह होगा कि विपक्ष इस फैसले के बाद अपनी रणनीति में क्या बदलाव लाता है और आगामी चुनावों में मतदाता सूची की शुद्धता किस हद तक सुनिश्चित हो पाती है।