हसरत मोहानी पुण्यतिथि: 'इंकलाब जिंदाबाद' के जनक, हिंदू-मुस्लिम एकता और अखंड भारत के अडिग पक्षधर
सारांश
मुख्य बातें
क्रांतिकारी शायर, स्वतंत्रता सेनानी और उर्दू साहित्य के अनमोल रत्न मौलाना हसरत मोहानी का निधन 13 मई 1951 को लखनऊ के फर्रुखाबाद महल में हुआ था। उनके जाने से उर्दू अदब की दुनिया में एक ऐसा खालीपन आया जो आज भी महसूस किया जाता है। 'इंकलाब जिंदाबाद' का अमर नारा देने वाले हसरत मोहानी महज एक शायर नहीं, बल्कि एक सच्चे विद्रोही, राष्ट्रवादी और अटूट साहस के प्रतीक थे।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
हसरत मोहानी का जन्म 1 जनवरी 1875 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के मोहान गाँव में हुआ था। उनका असली नाम सैयद फजलुल हसन था। उन्होंने 'हसरत' उपनाम अपनाया और शीघ्र ही उर्दू शायरी की दुनिया में अपनी अनोखी रोमांटिक और क्रांतिकारी शैली के लिए मशहूर हो गए। मोहान गाँव से उनका गहरा लगाव था, इसीलिए उन्होंने 'मोहानी' तखल्लुस अपनाया।
'इंकलाब जिंदाबाद' और स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा देने वाले पहले शायर हसरत मोहानी ही थे। 1921 में अहमदाबाद में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में उन्होंने यह नारा दिया, जो आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम का सबसे लोकप्रिय नारा बन गया। वे महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के प्रबल समर्थक थे, लेकिन जहाँ ज़रूरत पड़ी, वहाँ अपने विचारों पर अडिग भी रहे। 1923 में वे कानपुर से स्वराज पार्टी के टिकट पर विधायक चुने गए।
पत्रकारिता, राजनीति और बहुआयामी व्यक्तित्व
हसरत मोहानी केवल शायर ही नहीं, बल्कि एक सच्चे राष्ट्रवादी, पत्रकार, राजनीतिज्ञ और धार्मिक विद्वान भी थे। उन्होंने 'उर्दू-ए-मुअल्ला' नामक पत्र निकाला, जिसमें ब्रिटिश सरकार की नीतियों की कड़ी आलोचना की गई। इसी कारण उन्हें कई बार जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा, किंतु ब्रिटिश जेलों में भी उन्होंने अपनी कलम नहीं छोड़ी। वे मुस्लिम लीग के सदस्य भी रहे, परंतु हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल पक्षधर थे और उन्होंने 1947 के विभाजन का पुरजोर विरोध किया। उनकी सबसे बड़ी इच्छा थी कि भारत अखंड रहे।
शायरी में इश्क, क्रांति और देशभक्ति का संगम
हसरत मोहानी की शायरी में इश्क, सौंदर्य, क्रांति और देशभक्ति का अद्भुत मेल मिलता है। उनकी प्रसिद्ध ग़ज़ल 'चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है...' आज भी लोगों के दिलों में बसी है। उनकी शायरी में सूफियाना रंग के साथ-साथ विद्रोह की चिंगारी भी साफ दिखती है। लखनऊ की गलियों में आज भी उनकी याद में लोग उनकी ग़ज़लें सुनाते हैं और लखनऊ विश्वविद्यालय सहित कई साहित्यिक संस्थाओं में उनकी पुण्यतिथि पर हर साल कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
विरासत और आज की प्रासंगिकता
13 मई 1951 को हसरत मोहानी के निधन पर पूरे देश में शोक छा गया था। जवाहरलाल नेहरू समेत कई नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी थी। हसरत मोहानी मेमोरियल सोसाइटी आज भी उनकी याद को जीवित रखे हुए है। उनकी किताबें, ग़ज़लें और लेखन नई पीढ़ी के युवाओं को प्रेरणा देते रहते हैं। आज जब देश आज़ादी के दशकों बाद भी सांप्रदायिक सद्भाव और सामाजिक न्याय की राह तलाश रहा है, हसरत मोहानी का जीवन और संघर्ष उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके दौर में था।