हसरत मोहानी पुण्यतिथि: 'इंकलाब जिंदाबाद' के जनक, हिंदू-मुस्लिम एकता और अखंड भारत के अडिग पक्षधर

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हसरत मोहानी पुण्यतिथि: 'इंकलाब जिंदाबाद' के जनक, हिंदू-मुस्लिम एकता और अखंड भारत के अडिग पक्षधर

सारांश

'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा देने वाले मौलाना हसरत मोहानी की 13 मई को पुण्यतिथि है। शायर, पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी — हसरत मोहानी ने 1947 के विभाजन का विरोध किया और हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए जीवन भर संघर्ष किया। उनकी ग़ज़लें और विचार आज भी नई पीढ़ी को प्रेरित करते हैं।

मुख्य बातें

मौलाना हसरत मोहानी का निधन 13 मई 1951 को लखनऊ के फर्रुखाबाद महल में हुआ था।
उनका जन्म 1 जनवरी 1875 को उन्नाव जिले के मोहान गाँव , उत्तर प्रदेश में हुआ; असली नाम सैयद फजलुल हसन था।
1921 में अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने 'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा दिया, जो स्वतंत्रता संग्राम का सबसे लोकप्रिय नारा बना।
उन्होंने 'उर्दू-ए-मुअल्ला' पत्र के ज़रिए ब्रिटिश नीतियों की आलोचना की और कई बार जेल गए।
1947 के विभाजन का विरोध किया; हिंदू-मुस्लिम एकता और अखंड भारत उनकी सबसे बड़ी इच्छा थी।
उनकी ग़ज़ल 'चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है...' आज भी उर्दू साहित्य की अमर रचनाओं में गिनी जाती है।

क्रांतिकारी शायर, स्वतंत्रता सेनानी और उर्दू साहित्य के अनमोल रत्न मौलाना हसरत मोहानी का निधन 13 मई 1951 को लखनऊ के फर्रुखाबाद महल में हुआ था। उनके जाने से उर्दू अदब की दुनिया में एक ऐसा खालीपन आया जो आज भी महसूस किया जाता है। 'इंकलाब जिंदाबाद' का अमर नारा देने वाले हसरत मोहानी महज एक शायर नहीं, बल्कि एक सच्चे विद्रोही, राष्ट्रवादी और अटूट साहस के प्रतीक थे।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

हसरत मोहानी का जन्म 1 जनवरी 1875 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के मोहान गाँव में हुआ था। उनका असली नाम सैयद फजलुल हसन था। उन्होंने 'हसरत' उपनाम अपनाया और शीघ्र ही उर्दू शायरी की दुनिया में अपनी अनोखी रोमांटिक और क्रांतिकारी शैली के लिए मशहूर हो गए। मोहान गाँव से उनका गहरा लगाव था, इसीलिए उन्होंने 'मोहानी' तखल्लुस अपनाया।

'इंकलाब जिंदाबाद' और स्वतंत्रता संग्राम में योगदान

'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा देने वाले पहले शायर हसरत मोहानी ही थे। 1921 में अहमदाबाद में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में उन्होंने यह नारा दिया, जो आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम का सबसे लोकप्रिय नारा बन गया। वे महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के प्रबल समर्थक थे, लेकिन जहाँ ज़रूरत पड़ी, वहाँ अपने विचारों पर अडिग भी रहे। 1923 में वे कानपुर से स्वराज पार्टी के टिकट पर विधायक चुने गए।

पत्रकारिता, राजनीति और बहुआयामी व्यक्तित्व

हसरत मोहानी केवल शायर ही नहीं, बल्कि एक सच्चे राष्ट्रवादी, पत्रकार, राजनीतिज्ञ और धार्मिक विद्वान भी थे। उन्होंने 'उर्दू-ए-मुअल्ला' नामक पत्र निकाला, जिसमें ब्रिटिश सरकार की नीतियों की कड़ी आलोचना की गई। इसी कारण उन्हें कई बार जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा, किंतु ब्रिटिश जेलों में भी उन्होंने अपनी कलम नहीं छोड़ी। वे मुस्लिम लीग के सदस्य भी रहे, परंतु हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल पक्षधर थे और उन्होंने 1947 के विभाजन का पुरजोर विरोध किया। उनकी सबसे बड़ी इच्छा थी कि भारत अखंड रहे।

शायरी में इश्क, क्रांति और देशभक्ति का संगम

हसरत मोहानी की शायरी में इश्क, सौंदर्य, क्रांति और देशभक्ति का अद्भुत मेल मिलता है। उनकी प्रसिद्ध ग़ज़ल 'चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है...' आज भी लोगों के दिलों में बसी है। उनकी शायरी में सूफियाना रंग के साथ-साथ विद्रोह की चिंगारी भी साफ दिखती है। लखनऊ की गलियों में आज भी उनकी याद में लोग उनकी ग़ज़लें सुनाते हैं और लखनऊ विश्वविद्यालय सहित कई साहित्यिक संस्थाओं में उनकी पुण्यतिथि पर हर साल कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

विरासत और आज की प्रासंगिकता

13 मई 1951 को हसरत मोहानी के निधन पर पूरे देश में शोक छा गया था। जवाहरलाल नेहरू समेत कई नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी थी। हसरत मोहानी मेमोरियल सोसाइटी आज भी उनकी याद को जीवित रखे हुए है। उनकी किताबें, ग़ज़लें और लेखन नई पीढ़ी के युवाओं को प्रेरणा देते रहते हैं। आज जब देश आज़ादी के दशकों बाद भी सांप्रदायिक सद्भाव और सामाजिक न्याय की राह तलाश रहा है, हसरत मोहानी का जीवन और संघर्ष उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके दौर में था।

संपादकीय दृष्टिकोण

एक धार्मिक विद्वान जिसने सांप्रदायिक सद्भाव की वकालत की। उनकी विरासत को केवल साहित्यिक उत्सव तक सीमित रखना उनके राजनीतिक साहस के साथ न्याय नहीं है। आज जब 'इंकलाब जिंदाबाद' नारे की वैचारिक स्वामित्व को लेकर राजनीतिक दावेदारी होती है, तब यह याद दिलाना ज़रूरी है कि यह नारा एक ऐसे शख्स ने दिया था जो न किसी एक विचारधारा में बंधे थे, न किसी एक पहचान में।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा किसने और कब दिया था?
यह नारा हसरत मोहानी ने 1921 में अहमदाबाद में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में दिया था। यह नारा बाद में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे लोकप्रिय नारा बन गया।
हसरत मोहानी ने 1947 के विभाजन का विरोध क्यों किया?
हसरत मोहानी हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल पक्षधर थे और अखंड भारत उनकी सबसे बड़ी इच्छा थी। वे मानते थे कि धर्म के आधार पर देश का बँटवारा राष्ट्रीय एकता और सांप्रदायिक सद्भाव के विरुद्ध है।
हसरत मोहानी की सबसे प्रसिद्ध रचना कौन सी है?
उनकी ग़ज़ल 'चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है...' उनकी सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय रचनाओं में से एक है, जो आज भी उर्दू साहित्य प्रेमियों के दिलों में बसी है।
हसरत मोहानी की पुण्यतिथि कब मनाई जाती है?
हसरत मोहानी की पुण्यतिथि 13 मई को मनाई जाती है। उनका निधन 13 मई 1951 को लखनऊ के फर्रुखाबाद महल में हुआ था। लखनऊ विश्वविद्यालय और कई साहित्यिक संस्थाओं में हर साल इस अवसर पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
राष्ट्र प्रेस