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भारत-नेपाल कृषि सहयोग पर नौणी विश्वविद्यालय के कुलपति का जोर, ₁₀ दिवसीय प्रशिक्षण संपन्न

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भारत-नेपाल कृषि सहयोग पर नौणी विश्वविद्यालय के कुलपति का जोर, ₁₀ दिवसीय प्रशिक्षण संपन्न

सारांश

नौणी के डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय ने नेपाली किसानों और कृषि विस्तार कार्यकर्ताओं के लिए 10 दिवसीय वैज्ञानिक बागवानी प्रशिक्षण कार्यक्रम संपन्न किया। कुलपति प्रो. बावेजा ने मधुमक्खी पालन, मेवों की खेती और आधुनिक तकनीकों के ज़रिए भारत-नेपाल कृषि साझेदारी को नई ऊँचाई देने का आह्वान किया।

मुख्य बातें

वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी ने नेपाली किसानों और विस्तार कार्यकर्ताओं के लिए 10 दिवसीय बागवानी प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया।
कुलपति प्रोफेसर एचएस बावेजा ने तकनीकी आदान-प्रदान और क्षमता निर्माण के ज़रिए भारत-नेपाल कृषि सहयोग को मज़बूत करने पर बल दिया।
मधुमक्खी पालन , रॉयल जेली , मधुमक्खी विष और मेवों की फसलों को आय सृजन के आशाजनक विकल्प बताया गया।
प्रतिभागियों ने मशोबरा , कंडाघाट और सोलन के अनुसंधान केंद्रों का व्यावहारिक भ्रमण किया।
विस्तार शिक्षा निदेशक डॉ.
डीपी शर्मा ने आधुनिक बागवानी तकनीकों से ग्रामीण रोज़गार और उद्यमिता को बढ़ावा मिलने की बात कही।

नौणी स्थित डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय (UHF) के कुलपति प्रोफेसर एचएस बावेजा ने शनिवार, 17 अक्टूबर को भारत और नेपाल के बीच कृषि सहयोग को और अधिक प्रगाढ़ बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि तकनीकी आदान-प्रदान, क्षमता निर्माण और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों को अपनाकर दोनों देशों के किसानों की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार लाया जा सकता है।

प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन

यह अवसर था नेपाल के कृषि विस्तार कार्यकर्ताओं और किसानों के लिए आयोजित बागवानी फसलों की वैज्ञानिक खेती और प्रबंधन पर केंद्रित 10 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के समापन समारोह का। प्रोफेसर बावेजा ने इस मौके पर दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक कृषि साझेदारी की संभावनाओं को रेखांकित किया और कहा कि आधुनिक कृषि तकनीकें उत्पादकता, उपज की गुणवत्ता और किसानों की आमदनी — तीनों को एक साथ बेहतर बना सकती हैं।

मधुमक्खी पालन और विविध कृषि पर जोर

कुलपति ने विविध कृषि के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में मधुमक्खी पालन की संभावनाओं पर विशेष प्रकाश डाला। उन्होंने रॉयल जेली, मधुमक्खी पराग और मधुमक्खी विष जैसे उत्पादों के आर्थिक महत्व की चर्चा की और प्रतिभागियों को मधुमक्खी चिकित्सा (Apitherapy) तथा उसके संभावित उपयोगों से भी परिचित कराया। उन्होंने मेवों की फसलों — विशेष रूप से अखरोट — को उद्यम विकास, आय सृजन और सतत कृषि के लिए एक आशाजनक मार्ग बताया।

विस्तार शिक्षा निदेशक का संबोधन

विस्तार शिक्षा निदेशक डॉ. डीपी शर्मा ने फल उत्पादन में वैज्ञानिक विधियों के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आधुनिक बागवानी प्रौद्योगिकियों के प्रभावी प्रसार से न केवल रोज़गार के नए अवसर सृजित होते हैं, बल्कि उद्यमिता को भी प्रोत्साहन मिलता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मज़बूती मिलती है।

क्षेत्रीय भ्रमण और व्यावहारिक अनुभव

प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों ने क्षेत्रीय बागवानी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र, मशोबरा; कृषि विज्ञान केंद्र, कंडाघाट; और मशरूम अनुसंधान निदेशालय, सोलन का भ्रमण किया। इन दौरों ने उन्हें उन्नत उत्पादन तकनीकों, चल रहे अनुसंधान कार्यों और वैज्ञानिक नवाचारों के व्यावहारिक अनुप्रयोग को प्रत्यक्ष रूप से समझने का अवसर दिया।

प्रतिभागियों की प्रतिक्रिया और आगे की राह

नेपाली प्रतिभागियों ने विश्वविद्यालय के प्रयासों की सराहना करते हुए विशेषज्ञों द्वारा प्रदान किए गए तकनीकी मार्गदर्शन और व्यावहारिक प्रशिक्षण को अत्यंत उपयोगी बताया। उन्होंने शीतोष्ण जलवायु में उगने वाली फसलों — विशेष रूप से सेब और अखरोट — की वैज्ञानिक खेती पर आधारित सत्रों को विशेष महत्व दिया। यह कार्यक्रम भारत-नेपाल कृषि सहयोग की दिशा में एक ठोस कदम माना जा रहा है, और भविष्य में इस तरह के और आदान-प्रदान की संभावना बताई जा रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि 10 दिनों का प्रशिक्षण नेपाल की कृषि संरचना में कितना स्थायी बदलाव ला सकता है, जब तक कि इसे नियमित और संस्थागत आदान-प्रदान का स्वरूप न दिया जाए। मधुमक्खी पालन और मेवों की खेती पर जोर सराहनीय है, लेकिन इन तकनीकों की नेपाल के विविध कृषि-जलवायु क्षेत्रों में अनुकूलनीयता का मूल्यांकन ज़रूरी है। दीर्घकालिक प्रभाव के लिए इस तरह के कार्यक्रमों को एकबारगी आयोजन से आगे बढ़कर द्विपक्षीय कृषि नीति का हिस्सा बनाना होगा।
RashtraPress
18 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नौणी विश्वविद्यालय में नेपाल के लिए आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम क्या था?
यह डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी द्वारा नेपाल के कृषि विस्तार कार्यकर्ताओं और किसानों के लिए आयोजित 10 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम था, जो बागवानी फसलों की वैज्ञानिक खेती और प्रबंधन पर केंद्रित था। कार्यक्रम का समापन 17 अक्टूबर को हुआ।
प्रोफेसर बावेजा ने भारत-नेपाल सहयोग पर क्या कहा?
कुलपति प्रोफेसर एचएस बावेजा ने तकनीकी आदान-प्रदान, क्षमता निर्माण और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों के माध्यम से भारत-नेपाल कृषि सहयोग को मज़बूत करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीकें उत्पादकता, उपज की गुणवत्ता और किसानों की आय तीनों में सुधार ला सकती हैं।
इस प्रशिक्षण में मधुमक्खी पालन को क्यों महत्व दिया गया?
कुलपति ने मधुमक्खी पालन को विविध कृषि का एक महत्वपूर्ण घटक बताया। रॉयल जेली , मधुमक्खी पराग और मधुमक्खी विष जैसे उत्पादों की आर्थिक संभावनाओं के साथ-साथ मधुमक्खी चिकित्सा (Apitherapy) के अनुप्रयोगों पर भी चर्चा की गई।
प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों ने किन केंद्रों का भ्रमण किया?
प्रतिभागियों ने क्षेत्रीय बागवानी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र, मशोबरा ; कृषि विज्ञान केंद्र, कंडाघाट ; और मशरूम अनुसंधान निदेशालय, सोलन का दौरा किया। इन भ्रमणों से उन्हें उन्नत उत्पादन तकनीकों और वैज्ञानिक नवाचारों का प्रत्यक्ष अनुभव मिला।
इस प्रशिक्षण से नेपाली किसानों को क्या लाभ होगा?
प्रशिक्षण में सेब और अखरोट जैसी शीतोष्ण फसलों की वैज्ञानिक खेती, मधुमक्खी पालन और मेवों की खेती पर व्यावहारिक ज्ञान दिया गया। विस्तार शिक्षा निदेशक डॉ. डीपी शर्मा के अनुसार, इन तकनीकों के प्रसार से रोज़गार सृजन, उद्यमिता और ग्रामीण आर्थिक विकास को बल मिलेगा।
राष्ट्र प्रेस
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