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आरएसएस महासचिव होसबोले का बड़ा बयान: पीएम मोदी की संघ जड़ों पर जताया गर्व, BJP से गहरे वैचारिक संबंध स्वीकारे

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आरएसएस महासचिव होसबोले का बड़ा बयान: पीएम मोदी की संघ जड़ों पर जताया गर्व, BJP से गहरे वैचारिक संबंध स्वीकारे

सारांश

आरएसएस महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने वाशिंगटन के हडसन इंस्टीट्यूट में पीएम मोदी की संघ पृष्ठभूमि पर गर्व जताया। उन्होंने BJP-RSS के अटूट संबंध को स्वीकारते हुए स्पष्ट किया कि संघ सरकार में सीधे हस्तक्षेप नहीं करता, बल्कि समाज निर्माण पर केंद्रित रहता है।

मुख्य बातें

आरएसएस महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने 24 अप्रैल को वाशिंगटन के हडसन इंस्टीट्यूट में पीएम मोदी की संघ पृष्ठभूमि पर गर्व जताया।
BJP की 1980 में स्थापना के समय से ही आरएसएस से उसका वैचारिक और संगठनात्मक संबंध अटूट रहा है।
केंद्र सरकार में कार्यरत अनेक वरिष्ठ व्यक्तियों की पृष्ठभूमि आरएसएस से जुड़ी हुई है — यह होसबोले ने स्वयं स्वीकार किया।
होसबोले ने स्पष्ट किया कि आरएसएस सरकार की राजनीति में सीधे हस्तक्षेप नहीं करता, बल्कि समाज निर्माण पर केंद्रित रहता है।
1925 में स्थापित आरएसएस आज विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में से एक है, जिसका देशभर में व्यापक नेटवर्क है।
होसबोले ने भारत को आधुनिकता के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों को बनाए रखने का संदेश दिया।

वाशिंगटन, 24 अप्रैल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संघ से दशकों पुराने जुड़ाव को गर्व के साथ स्वीकार किया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि आरएसएस और भारत की वर्तमान सरकार के बीच वैचारिक और संगठनात्मक संबंध अत्यंत गहरे हैं, जिन्हें तोड़ा नहीं जा सकता। यह बयान वाशिंगटन स्थित प्रतिष्ठित थिंक टैंक हडसन इंस्टीट्यूट में आयोजित 'न्यू इंडिया कॉन्फ्रेंस' के दौरान एक 'फायरसाइड चैट' में दिया गया।

पीएम मोदी की संघ पृष्ठभूमि पर होसबोले का स्पष्ट रुख

होसबोले ने बातचीत में बिना किसी संकोच के कहा, "यह सच है, उन्होंने (पीएम मोदी ने) खुद भी कई बार इसका जिक्र किया है और हमें इस पर बहुत गर्व है।" उन्होंने रेखांकित किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत आरएसएस प्रचारक के रूप में की थी और संघ के मूल्यों ने उनकी सोच व नेतृत्व शैली को गहराई से प्रभावित किया है।

उन्होंने यह भी बताया कि केंद्र सरकार में कार्यरत अनेक वरिष्ठ व्यक्तियों की पृष्ठभूमि आरएसएस से जुड़ी हुई है। यह तथ्य भारत की राजनीतिक संरचना में संघ की दीर्घकालिक भूमिका को रेखांकित करता है।

BJP और RSS का अटूट संबंध: स्थापना से आज तक

होसबोले ने बताया कि जब 1980 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की स्थापना हुई, तब उसके संस्थापकों ने जानबूझकर आरएसएस से संबंध बनाए रखने का निर्णय लिया था। उन्होंने कहा, "भाजपा के संस्थापक इस रिश्ते को बनाए रखना चाहते थे। यह ऐसा संबंध है जिसे तोड़ा नहीं जा सकता।"

गौरतलब है कि BJP की स्थापना अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं ने की थी, जो स्वयं आरएसएस की विचारधारा से गहराई से जुड़े थे। इस प्रकार यह वैचारिक धारा 44 वर्षों से निरंतर प्रवाहित हो रही है।

आरएसएस की भूमिका: सरकार में हस्तक्षेप नहीं, समाज निर्माण पर जोर

हालांकि होसबोले ने एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण भी दिया। उन्होंने कहा, "आरएसएस भारत सरकार की राजनीति में सीधे शामिल नहीं होता।" संगठन की भूमिका राजनीतिक हस्तक्षेप की नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन लाने की है।

उन्होंने बताया कि आरएसएस सेवा, अनुशासन और सामाजिक एकता के मूल्यों पर आधारित निस्वार्थ स्वयंसेवकों का एक विशाल नेटवर्क तैयार करता है। यह नेटवर्क समाज के हर वर्ग तक पहुंचकर राष्ट्रनिर्माण में योगदान देता है। साथ ही संगठन उन्हीं नीतियों का समर्थन करता है जो देशहित में हों।

विनम्रता और सांस्कृतिक जड़ों पर होसबोले का संदेश

चर्चा में आरएसएस के विस्तार का भी उल्लेख हुआ — कैसे यह संगठन 1925 में एक छोटे से समूह से शुरू होकर आज विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में से एक बन चुका है। इस पर होसबोले ने विनम्रता का संदेश देते हुए कहा, "हम पूर्ण नहीं हैं… और नहीं बनेंगे… ताकत के साथ विनम्रता भी जरूरी है।"

उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत को आधुनिकता की राह पर चलते हुए अपनी सांस्कृतिक जड़ों को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। यह संदेश विशेष रूप से वैश्विक मंच पर भारत की पहचान और सॉफ्ट पावर के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।

वैश्विक मंच पर आरएसएस की उपस्थिति और व्यापक निहितार्थ

'न्यू इंडिया कॉन्फ्रेंस' में नीति निर्माता, विद्वान और रणनीतिक विशेषज्ञ एकत्रित हुए थे। इस मंच पर होसबोले का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पश्चिमी देशों में अक्सर आरएसएस-BJP संबंधों को लेकर भ्रम की स्थिति रहती है। इस खुलासे से अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भारत की राजनीतिक संरचना की स्पष्ट समझ मिलती है।

यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत वैश्विक कूटनीतिक मंचों पर अपनी उपस्थिति तेजी से बढ़ा रहा है और 2024 के आम चुनावों में BJP की लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी के बाद संघ-सरकार संबंधों पर अंतरराष्ट्रीय जिज्ञासा और भी बढ़ी है। आगे भी ऐसे वैश्विक मंचों पर आरएसएस की सक्रिय भागीदारी भारत की वैचारिक कूटनीति का हिस्सा बन सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक सुनियोजित वैचारिक कूटनीति है — वैश्विक मंच पर RSS-BJP-सरकार के त्रिकोण को पारदर्शी रूप से प्रस्तुत करने की रणनीति। विरोधाभास यह है कि एक ओर संघ 'सरकार में सीधे हस्तक्षेप न करने' का दावा करता है, दूसरी ओर स्वीकार करता है कि सरकार के अधिकांश लोगों की पृष्ठभूमि संघ से है — यह 'सॉफ्ट कंट्रोल' का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। पश्चिमी थिंक टैंक में यह संदेश देना कि भारत की सत्ता संरचना वैचारिक रूप से एकजुट है, भारत की 'सभ्यतागत राज्य' की छवि को मजबूत करता है — जो वैश्विक कूटनीति में एक नई भाषा है।
RashtraPress
2 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दत्तात्रेय होसबोले ने पीएम मोदी और आरएसएस के बारे में क्या कहा?
आरएसएस महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने वाशिंगटन में कहा कि पीएम मोदी की जड़ें आरएसएस में हैं और संगठन को इस पर गर्व है। उन्होंने कहा कि मोदी ने खुद भी कई बार इसका सार्वजनिक रूप से उल्लेख किया है।
आरएसएस और BJP का रिश्ता कैसा है?
होसबोले के अनुसार BJP की स्थापना 1980 में हुई थी और तब से ही इसके संस्थापकों ने आरएसएस से संबंध बनाए रखने का निर्णय लिया था। यह वैचारिक और संगठनात्मक रिश्ता अटूट बताया गया है।
क्या आरएसएस सरकार के फैसलों में दखल देता है?
होसबोले ने स्पष्ट किया कि आरएसएस भारत सरकार की राजनीति में सीधे शामिल नहीं होता। संगठन की भूमिका समाज निर्माण, सेवा और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रसार तक सीमित है, हालांकि वह देशहित की नीतियों का समर्थन करता है।
पीएम मोदी का आरएसएस से क्या पुराना संबंध है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत आरएसएस प्रचारक के रूप में की थी। उन्होंने कई अवसरों पर माना है कि उनकी सोच और राजनीतिक प्रशिक्षण पर संघ का गहरा प्रभाव रहा है।
होसबोले ने यह बयान कहां और किस कार्यक्रम में दिया?
यह बयान वाशिंगटन स्थित हडसन इंस्टीट्यूट में आयोजित 'न्यू इंडिया कॉन्फ्रेंस' के दौरान एक 'फायरसाइड चैट' में दिया गया। इस सम्मेलन में नीति निर्माता, विद्वान और रणनीतिक विशेषज्ञ शामिल थे।
राष्ट्र प्रेस
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