16 जुलाई 2026
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कृषि ऋण 11 वर्षों में 4 गुना बढ़कर ₹32.50 लाख करोड़ पर, सरकारी फैक्टशीट में खुलासा

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कृषि ऋण 11 वर्षों में 4 गुना बढ़कर ₹32.50 लाख करोड़ पर, सरकारी फैक्टशीट में खुलासा

सारांश

भारत में कृषि ऋण 11 वर्षों में ₹8 लाख करोड़ से बढ़कर ₹32.50 लाख करोड़ पर पहुँच गया — यानी चार गुना से अधिक की छलांग। नाबार्ड, जन धन और बैंक सखी नेटवर्क मिलकर ग्रामीण वित्तीय समावेशन की तस्वीर बदल रहे हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह ऋण किसानों की जेब तक पहुँच रहा है।

मुख्य बातें

कृषि ऋण वित्त वर्ष 2025-26 में ₹32.50 लाख करोड़ पर पहुँचा, जो 2014-15 के ₹8 लाख करोड़ से 4 गुना अधिक है।
ग्रामीण ऋण इकोसिस्टम ने 2014-15 से 2023-24 के बीच करीब 13 प्रतिशत वार्षिक दर से वृद्धि दर्ज की।
ग्रामीण अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक शाखाएँ 2014 के 41,464 से बढ़कर जुलाई 2025 तक 56,193 हो गईं।
10 जुलाई 2026 तक 19.83 लाख स्वयं सहायता समूह सक्रिय; ₹13.28 लाख करोड़ का ऋण वितरित।
24 जून 2026 तक 58.63 करोड़ जन धन खाते; ₹3 लाख करोड़ से अधिक जमा; 55.7% खाते महिलाओं के नाम।
नाबार्ड सर्वेक्षण (मई 2026) के अनुसार 77.2% ग्रामीण परिवारों ने उपभोग स्तर में वृद्धि दर्ज की।

भारत में कृषि क्षेत्र को दिया जाने वाला संस्थागत ऋण बीते 11 वर्षों में चार गुना से अधिक बढ़ गया है। सरकार द्वारा 16 जुलाई 2026 को जारी फैक्टशीट के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में कृषि ऋण ₹32.50 लाख करोड़ पर पहुँच गया, जबकि वित्त वर्ष 2014-15 में यह मात्र ₹8 लाख करोड़ था। ग्रामीण ऋण इकोसिस्टम ने इस अवधि में करीब 13 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की है।

मुख्य घटनाक्रम

सरकारी फैक्टशीट में बताया गया कि नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (नाबार्ड) बैंकों को कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में अल्पकालिक तथा दीर्घकालिक ऋण देने के लिए रीफाइनेंस सहायता प्रदान करता है, जिससे जमीनी स्तर पर ऋण की उपलब्धता सुनिश्चित होती है।

नाबार्ड के ग्रामीण आर्थिक स्थिति एवं भावना सर्वेक्षण (मई 2026) के अनुसार, लगभग 77.2 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों ने अपने उपभोग स्तर में वृद्धि की सूचना दी, जो बढ़ती क्रय शक्ति का संकेत है। औपचारिक ऋण तक पहुँच में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है — लगभग 51 प्रतिशत परिवार अब केवल औपचारिक स्रोतों से ऋण ले रहे हैं, जबकि 27 प्रतिशत से अधिक परिवार संस्थागत और गैर-संस्थागत दोनों माध्यमों का उपयोग कर रहे हैं।

बैंकिंग नेटवर्क का विस्तार

ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग अवसंरचना में भी उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। वर्ष 2014 में ग्रामीण क्षेत्रों में 41,464 अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक शाखाएँ थीं, जो जुलाई 2025 तक 35 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 56,193 हो गईं। इसके अतिरिक्त, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक देश के 700 जिलों में 22,000 से अधिक शाखाओं के नेटवर्क के साथ सक्रिय हैं।

सहकारी बैंकिंग नेटवर्क में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और नाबार्ड के आँकड़ों के अनुसार 1,458 शहरी सहकारी बैंक, 34 राज्य सहकारी बैंक और 352 जिला केंद्रीय सहकारी बैंक शामिल हैं। सहकारी संस्थाओं और प्राथमिक कृषि ऋण समितियों ने दूरदराज के क्षेत्रों में बैंकिंग पहुँच बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है।

स्वयं सहायता समूह और आजीविका मिशन

सरकार की दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत ग्रामीण गरीब परिवारों को स्वयं सहायता समूहों में संगठित किया जा रहा है। 10 जुलाई 2026 तक देशभर में 19.83 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूह सक्रिय थे और योजना की शुरुआत से अब तक इनके माध्यम से ₹13.28 लाख करोड़ के ऋण का वितरण किया जा चुका है।

फरवरी 2026 तक 50,548 'बैंक सखी' तैनात की जा चुकी थीं, जिन्होंने 2013-14 से अब तक स्वयं सहायता समूहों को ₹12.18 लाख करोड़ से अधिक का बैंक ऋण उपलब्ध कराने में सहयोग दिया है।

जन धन योजना की भूमिका

प्रधानमंत्री जन धन योजना वित्तीय समावेशन का आधार बनकर उभरी है। 24 जून 2026 तक 58.63 करोड़ से अधिक जन धन खाते खोले जा चुके थे, जिनमें ₹3 लाख करोड़ से अधिक की जमा राशि है। इनमें से 32.68 करोड़ खाते (55.7 प्रतिशत) महिलाओं के नाम पर हैं, जबकि 45.62 करोड़ खाते (77.8 प्रतिशत) ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में हैं।

आगे की राह

आँकड़ों के अनुसार, कृषि ऋण में यह तेज वृद्धि ग्रामीण भारत में वित्तीय समावेशन की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाती है। यह ऐसे समय में आई है जब सरकार किसानों की आय दोगुनी करने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लक्ष्य पर काम कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऋण वितरण की यह रफ्तार तभी सार्थक होगी जब इसका सीधा असर किसानों की वास्तविक आय और कृषि उत्पादकता पर दिखे।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन कृषि ऋण की मात्रा और किसानों की वास्तविक आय के बीच की खाई अभी भी चिंता का विषय बनी हुई है। बड़े ऋण प्रवाह का अर्थ यह नहीं कि छोटे और सीमांत किसानों को उचित हिस्सा मिल रहा है — ऐतिहासिक रूप से संस्थागत ऋण का बड़ा हिस्सा बड़े किसानों और कृषि-व्यापार इकाइयों तक पहुँचता रहा है। 51 प्रतिशत परिवारों का औपचारिक ऋण तक पहुँचना सकारात्मक संकेत है, लेकिन शेष 49 प्रतिशत अभी भी साहूकारों या मिश्रित स्रोतों पर निर्भर हैं। असली कसौटी यह है कि क्या यह ऋण कृषि उत्पादकता और किसान आय में मापनीय सुधार ला रहा है — जो अकेले ऋण-वितरण के आँकड़े नहीं बता सकते।
RashtraPress
16 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत में कृषि ऋण कितना बढ़ा है और अभी कितना है?
सरकारी फैक्टशीट के अनुसार, कृषि ऋण वित्त वर्ष 2025-26 में ₹32.50 लाख करोड़ पर पहुँच गया है, जो वित्त वर्ष 2014-15 के ₹8 लाख करोड़ से चार गुना से अधिक है। यह वृद्धि 11 वर्षों में करीब 13 प्रतिशत वार्षिक दर से हुई है।
नाबार्ड कृषि ऋण में क्या भूमिका निभाता है?
नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (नाबार्ड) बैंकों को कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में अल्पकालिक व दीर्घकालिक ऋण देने के लिए रीफाइनेंस सहायता प्रदान करता है। इससे बैंकों के संसाधन बढ़ते हैं और जमीनी स्तर पर ऋण की उपलब्धता सुनिश्चित होती है।
प्रधानमंत्री जन धन योजना ग्रामीण वित्तीय समावेशन में कैसे मदद कर रही है?
24 जून 2026 तक 58.63 करोड़ से अधिक जन धन खाते खोले जा चुके हैं, जिनमें ₹3 लाख करोड़ से अधिक जमा है। इनमें 55.7 प्रतिशत खाते महिलाओं के नाम पर हैं और 77.8 प्रतिशत ग्रामीण व अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में हैं, जो वंचित समुदायों तक बैंकिंग पहुँच का विस्तार दर्शाता है।
स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से कितना ऋण वितरित हुआ है?
10 जुलाई 2026 तक देशभर में 19.83 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूह सक्रिय थे और योजना की शुरुआत से अब तक ₹13.28 लाख करोड़ का ऋण वितरित किया जा चुका है। फरवरी 2026 तक 50,548 'बैंक सखी' भी तैनात हैं, जिन्होंने ₹12.18 लाख करोड़ से अधिक के ऋण में सहयोग दिया।
ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक शाखाओं की संख्या में कितना बदलाव आया है?
2014 में ग्रामीण क्षेत्रों में 41,464 अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक शाखाएँ थीं, जो जुलाई 2025 तक 35 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 56,193 हो गईं। इसके अलावा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक 700 जिलों में 22,000 से अधिक शाखाओं के साथ सक्रिय हैं।
राष्ट्र प्रेस
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