कृषि ऋण 11 वर्षों में 4 गुना बढ़कर ₹32.50 लाख करोड़ पर, सरकारी फैक्टशीट में खुलासा
सारांश
मुख्य बातें
भारत में कृषि क्षेत्र को दिया जाने वाला संस्थागत ऋण बीते 11 वर्षों में चार गुना से अधिक बढ़ गया है। सरकार द्वारा 16 जुलाई 2026 को जारी फैक्टशीट के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में कृषि ऋण ₹32.50 लाख करोड़ पर पहुँच गया, जबकि वित्त वर्ष 2014-15 में यह मात्र ₹8 लाख करोड़ था। ग्रामीण ऋण इकोसिस्टम ने इस अवधि में करीब 13 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की है।
मुख्य घटनाक्रम
सरकारी फैक्टशीट में बताया गया कि नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (नाबार्ड) बैंकों को कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में अल्पकालिक तथा दीर्घकालिक ऋण देने के लिए रीफाइनेंस सहायता प्रदान करता है, जिससे जमीनी स्तर पर ऋण की उपलब्धता सुनिश्चित होती है।
नाबार्ड के ग्रामीण आर्थिक स्थिति एवं भावना सर्वेक्षण (मई 2026) के अनुसार, लगभग 77.2 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों ने अपने उपभोग स्तर में वृद्धि की सूचना दी, जो बढ़ती क्रय शक्ति का संकेत है। औपचारिक ऋण तक पहुँच में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है — लगभग 51 प्रतिशत परिवार अब केवल औपचारिक स्रोतों से ऋण ले रहे हैं, जबकि 27 प्रतिशत से अधिक परिवार संस्थागत और गैर-संस्थागत दोनों माध्यमों का उपयोग कर रहे हैं।
बैंकिंग नेटवर्क का विस्तार
ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग अवसंरचना में भी उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। वर्ष 2014 में ग्रामीण क्षेत्रों में 41,464 अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक शाखाएँ थीं, जो जुलाई 2025 तक 35 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 56,193 हो गईं। इसके अतिरिक्त, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक देश के 700 जिलों में 22,000 से अधिक शाखाओं के नेटवर्क के साथ सक्रिय हैं।
सहकारी बैंकिंग नेटवर्क में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और नाबार्ड के आँकड़ों के अनुसार 1,458 शहरी सहकारी बैंक, 34 राज्य सहकारी बैंक और 352 जिला केंद्रीय सहकारी बैंक शामिल हैं। सहकारी संस्थाओं और प्राथमिक कृषि ऋण समितियों ने दूरदराज के क्षेत्रों में बैंकिंग पहुँच बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है।
स्वयं सहायता समूह और आजीविका मिशन
सरकार की दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत ग्रामीण गरीब परिवारों को स्वयं सहायता समूहों में संगठित किया जा रहा है। 10 जुलाई 2026 तक देशभर में 19.83 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूह सक्रिय थे और योजना की शुरुआत से अब तक इनके माध्यम से ₹13.28 लाख करोड़ के ऋण का वितरण किया जा चुका है।
फरवरी 2026 तक 50,548 'बैंक सखी' तैनात की जा चुकी थीं, जिन्होंने 2013-14 से अब तक स्वयं सहायता समूहों को ₹12.18 लाख करोड़ से अधिक का बैंक ऋण उपलब्ध कराने में सहयोग दिया है।
जन धन योजना की भूमिका
प्रधानमंत्री जन धन योजना वित्तीय समावेशन का आधार बनकर उभरी है। 24 जून 2026 तक 58.63 करोड़ से अधिक जन धन खाते खोले जा चुके थे, जिनमें ₹3 लाख करोड़ से अधिक की जमा राशि है। इनमें से 32.68 करोड़ खाते (55.7 प्रतिशत) महिलाओं के नाम पर हैं, जबकि 45.62 करोड़ खाते (77.8 प्रतिशत) ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में हैं।
आगे की राह
आँकड़ों के अनुसार, कृषि ऋण में यह तेज वृद्धि ग्रामीण भारत में वित्तीय समावेशन की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाती है। यह ऐसे समय में आई है जब सरकार किसानों की आय दोगुनी करने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लक्ष्य पर काम कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऋण वितरण की यह रफ्तार तभी सार्थक होगी जब इसका सीधा असर किसानों की वास्तविक आय और कृषि उत्पादकता पर दिखे।