भारत-बांग्लादेश बिजली आपूर्ति: राजनीतिक तनाव के बावजूद 47.7 मिलियन यूनिट की अबाध सप्लाई जारी रही
सारांश
मुख्य बातें
भारत और बांग्लादेश के बीच राजनीतिक संबंधों में तनाव के बावजूद, सीमा-पार बिजली आपूर्ति बिना किसी रुकावट के जारी रही। अगस्त 2024 में बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के सत्ता से हटने और नई सरकार के गठन के बाद 'भारत-विरोधी' बयानबाजी का दौर शुरू हुआ, फिर भी वर्षों में तैयार किए गए सीमा-पार ऊर्जा ढाँचे ने दोनों देशों के बीच बिजली की आवाजाही को अप्रभावित रखा।
मुख्य घटनाक्रम
यूरेशिया रिव्यू में प्रकाशित एक विश्लेषण के अनुसार, सितंबर 2024 तक राजनीतिक संवाद कठिन दौर में पहुँचने और वीज़ा सामान्यीकरण जैसी प्रशासनिक प्रक्रियाओं के धीमा पड़ने के बावजूद, भारत से बांग्लादेश को बिजली आपूर्ति लगभग पहले जैसी ही बनी रही। भारत के नेशनल लोड डिस्पैच सेंटर के आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, 18 सितंबर 2024 को अकेले एक दिन में बांग्लादेश को 47.7 मिलियन यूनिट बिजली की आपूर्ति दर्ज की गई — जो यह दर्शाती है कि दोनों देशों के ऊर्जा तंत्र के बीच कितना गहरा परिचालन जुड़ाव बना हुआ था।
ऊर्जा साझेदारी की मज़बूत नींव
विश्लेषण के अनुसार, 2024 तक भारत-बांग्लादेश बिजली सहयोग किसी एक नेता की व्यक्तिगत सद्भावना या किसी खास कूटनीतिक माहौल पर निर्भर रहने की सीमा से कहीं आगे निकल चुका था। यह साझेदारी दीर्घकालिक समझौतों, ग्रिड ऑपरेटरों के बीच तकनीकी समन्वय और आपस में जुड़े बुनियादी ढाँचे पर टिकी थी — जिसे रोकने की स्थिति में दोनों देशों को तत्काल और गंभीर नुकसान उठाना पड़ता।
बांग्लादेश पर संभावित असर
रिपोर्ट के अनुसार, उस दौर में बांग्लादेश पहले से ही गंभीर आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा था — विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव था, ईंधन आयात महँगा हो चुका था और राजनीतिक बदलाव के बाद संस्थाओं पर जनता का भरोसा पूरी तरह बहाल नहीं हुआ था। बांग्लादेश के कारखाने, अस्पताल और शहरी बिजली नेटवर्क भारतीय बिजली आयात पर काफी हद तक निर्भर हो चुके थे। यदि बिजली आपूर्ति बाधित होती, तो औद्योगिक उत्पादन प्रभावित होता, शहरों में लोड-शेडिंग बढ़ती और नई सरकार के लिए जनता की नाराज़गी एक बड़े संकट में बदल सकती थी।
भारत की कूटनीतिक संयम की भूमिका
यूरेशिया रिव्यू के विश्लेषण में इस बात पर विशेष ज़ोर दिया गया है कि भारत ने इस स्थिति का राजनीतिक दबाव बनाने के लिए उपयोग नहीं किया। लेख में कहा गया, 'आम तौर पर ज़रूरी ऊर्जा आयात के लिए पड़ोसी पर निर्भर देश, असल में, कमज़ोर स्थिति में अपने पड़ोसी के दबाव में होता है। हालाँकि, भारत ने वह दबाव नहीं डाला। उसने संस्थागत प्रतिबद्धता को अपना काम करने दिया और ऊर्जा संबंध को दोनों सरकारों के बीच पैदा हुई राजनीतिक मुश्किलों से अलग रखा।' विश्लेषण के अनुसार, यह रोक अपने आप में एक तरह की कूटनीति थी।
क्या होगा आगे
गौरतलब है कि यह ऊर्जा संबंध दोनों देशों के बीच तनाव के बावजूद एक स्थिर कड़ी बना हुआ है। आलोचकों का कहना है कि भविष्य में द्विपक्षीय संबंधों की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि ढाका की नई सरकार ऊर्जा निर्भरता को कूटनीतिक संतुलन के साथ कैसे साधती है और क्या दोनों देश इस व्यावहारिक सहयोग को व्यापक राजनीतिक संबंधों को सुधारने की नींव बना पाते हैं।